मुंबई: 2017 के मुंबई नगर निगम चुनावों में राज्य के दो सहयोगी दलों—भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और तब की एकजुट शिवसेना, के बीच शहर में कड़ी लड़ाई देखने को मिली थी.
इस बार भी ऐसा ही नज़ारा पुणे और पिंपरी चिंचवड में दिख रहा है, जहां दो सहयोगी बीजेपी और अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी)—एक-दूसरे के खिलाफ तीखे अभियान चला रहे हैं.
2017 में शिवसेना के आक्रामक रुख के पीछे एक रणनीति थी—खुद को अपने राज्य सहयोगी बीजेपी से अलग और स्वतंत्र दिखाना और ज़रूरत पड़ने पर अपने लिए विकल्प तैयार करना.
नौ साल बाद, राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अजित पवार की रणनीति भी कुछ अलग नहीं दिखती.
पिछले पखवाड़े से महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री अजित पवार लगभग पुणे जिले में ही डेरा डाले हुए हैं. वह पुणे और पिंपरी चिंचवड नगर निगमों की चुनावी प्रक्रिया के हर कदम पर ध्यान दे रहे हैं—शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ गठबंधन कराने से लेकर उम्मीदवारों के चयन तक और दोनों स्थानीय निकायों में अभियान का चेहरा बनने तक.
पवार ने बीजेपी पर हर कदम पर हमला बोला है. 2017 में बीजेपी ने तब की एकजुट एनसीपी को दोनों स्थानीय निकायों में हराया था. पवार ने खराब शासन, दोनों शहरों की अनदेखी और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगाए हैं. इसके अलावा, अलग-अलग मीडिया बातचीत में उन्होंने एनसीपी के दोनों गुटों के स्थायी रूप से फिर से एक होने की संभावना से इनकार नहीं किया है. यह कहते हुए कि उन्होंने स्थायी एकीकरण के बारे में नहीं सोचा है, पवार ने रहस्यमय तरीके से कहा कि पुणे और पिंपरी चिंचवड के लिए गठबंधन बनने के बाद से दोनों दलों के कार्यकर्ता बहुत खुश हैं और राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन नहीं होता.
राजनीतिक टिप्पणीकार हेमंत देसाई ने दिप्रिंट से कहा, “अजित पवार की कुल राजनीति को देखें तो वह अपनी पार्टी को उसी तरह बढ़ाना चाहते हैं, जैसे शरद पवार ने किया था. महायुति के भीतर उन्हें एकनाथ शिंदे से प्रतिस्पर्धा है और अगर वह पूरी तरह बीजेपी की लाइन पर चलते हैं, तो उनकी पार्टी की अलग पहचान नहीं बचेगी.”
महायुति में बीजेपी, शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना और अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी शामिल हैं.
देसाई ने कहा, “महाराष्ट्र के बड़े शहरों में कांग्रेस का असर कम होता जा रहा है और अगर इस बार भी उद्धव ठाकरे को ज्यादा सफलता नहीं मिलती, तो विपक्ष में एक बड़ा खाली स्थान बन जाएगा, जिसे भरने का इंतज़ार होगा.”
उन्होंने यह भी कहा कि 2017 से 2019 के बीच उद्धव ठाकरे ने जो किया था और जो अजित पवार अब कर रहे हैं, उनमें साफ समानताएं हैं.
यानी, सभी विकल्प खुले रखना.
अजित पवार के सत्ता केंद्र में बीजेपी बनाम एनसीपी
अजित पवार ने 1991 में बारामती से सांसद बनकर मुख्यधारा की राजनीति में कदम रखा, लेकिन जल्द ही उन्होंने उपचुनाव के जरिए अपने चाचा शरद पवार के लिए रास्ता बनाने के लिए इस्तीफा दे दिया. उसी साल वह पुणे जिले की बारामती सीट से विधायक बने और तब से यह सीट उनके पास ही है. जैसे-जैसे पार्टी और राज्य की राजनीति में उनकी अहमियत बढ़ी, पवार ने पिंपरी और चिंचवड पर सक्रिय रूप से ध्यान देना शुरू किया. 1999 में एनसीपी बनी और 2002 में अजित पवार के नेतृत्व में पिंपरी चिंचवड नगर निगम में सत्ता स्थापित की.
2007 में अजित पवार ने कांग्रेस के सुरेश कलमाड़ी की पुणे पर मजबूत पकड़ भी तोड़ दी और पुणे नगर निगम में भी एनसीपी का शासन स्थापित किया. पार्टी ने इन दोनों शहरी गढ़ों को 2017 तक अपने पास रखा, जब बीजेपी ने दोनों स्थानीय निकायों पर कब्ज़ा कर लिया.
तब से अब तक, यह पहली बार है जब इन दोनों स्थानीय निकायों में चुनाव हो रहे हैं. अजित पवार अपनी खोई हुई दोनों मजबूत सीटों को वापस पाने के लिए पूरी ताकत लगा रहे हैं. सिर्फ इसलिए नहीं कि ये पुराने गढ़ हैं, बल्कि इसलिए भी कि अगर उनकी पार्टी दो बड़े शहरों में सत्ता में आती है, तो महायुति सरकार में उनकी स्थिति और उनका कद काफी मजबूत होगा. पुणे जिला अजित पवार के लिए वही है, जो ठाकरे परिवार के लिए मुंबई है.
पुणे जिले के एक वरिष्ठ एनसीपी नेता ने दिप्रिंट से कहा, “यह चुनाव हमारे लिए एक परीक्षा है. अगर हम असफल रहे, तो राजनीतिक क्रम में एनसीपी की स्थिति काफी नीचे चली जाएगी. अजित दादा यह बात जानते हैं और इसलिए उन्होंने इस चुनाव में पूरी ताकत झोंक दी है. वह शायद ही कोई जिम्मेदारी दूसरों को दे रहे हों. वह सब कुछ खुद ही कर रहे हैं और चुनाव से पहले 50-60 से ज्यादा जनसभाओं को संबोधित कर चुके हैं.”
पिछले दस दिनों के प्रचार के दौरान, उपमुख्यमंत्री अजित पवार ने कई बार बीजेपी पर हमला बोला और पार्टी को “सत्ता की भूखी” बताया. उन्होंने यह भी कहा कि पुणे और पिंपरी चिंचवड में पार्टी द्वारा “खुली लूट” की जा रही है और लक्ष्य “भ्रष्टाचार के दानव को मारना” है.
अपनी बाद की सभाओं में अजित पवार ने स्थानीय राजनीति, राज्य और राष्ट्रीय राजनीति के बीच फर्क बताया. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र और महाराष्ट्र सरकार विकास कार्यों के लिए पर्याप्त धन दे रही हैं और कोई भी परियोजना लंबित नहीं रखी गई है. हालांकि, उन्होंने कहा कि स्थानीय चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं और स्थानीय नेतृत्व का प्रदर्शन ही मायने रखता है.
बीजेपी नेताओं ने भी पलटवार किया. राज्य बीजेपी अध्यक्ष रविंद्र चव्हाण ने कहा कि पार्टी को अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के साथ गठबंधन पर अफसोस है और उन्होंने पहले ही इसके खिलाफ चेतावनी दी थी. बाद में, राज्य के बीजेपी मंत्री आशीष शेलार ने हिंदुत्व विचारक विनायक दामोदर सावरकर का हवाला देते हुए अजित पवार पर तंज कसा और कहा कि बीजेपी के गठबंधन सहयोगियों को भी उनके प्रति सम्मान दिखाना चाहिए. इसके जवाब में अजित पवार की एनसीपी ने शाही-फुले-आंबेडकर विचारधारा (छत्रपति शाहू महाराज, ज्योतिराव फुले और डॉ. बी.आर. आंबेडकर) के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई.
मुंबई में भी, जहां अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी की मौजूदगी बहुत कम है, पवार ने शहर में पार्टी के प्रचार की जिम्मेदारी पूर्व विधायक नवाब मलिक को सौंपी. उन्हें अच्छी तरह पता था कि बीजेपी मलिक का विरोध करती है और अगर मलिक प्रभारी होंगे तो मुंबई में एनसीपी के साथ गठबंधन से इनकार कर देगी.
अजित पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के एक दूसरे नेता, जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “सच्चाई यह है कि 2023 में शरद पवार के नेतृत्व वाली पार्टी से अलग होने के बाद अजित पवार अपने नेताओं को दिए गए आश्वासन पूरे नहीं कर पाए. उन्होंने मंत्री पद, निगमों की अध्यक्षता की बात कही थी. लेकिन यह उनके हाथ में नहीं था. आखिर में हर चीज का फैसला बीजेपी और मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ही करते हैं.”
एनसीपी के फिर से एक होने की चर्चा
पुणे और पिंपरी चिंचवड में चुनावी अभियान के ज्यादातर समय तक सिर्फ अजित पवार ही वार्ड से वार्ड घूमते दिखे. वह मतदाताओं से मिलते रहे और भाषण देते रहे. शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के वरिष्ठ नेता अभियान से साफ तौर पर गायब रहे. यह स्थिति पिछले हफ्ते के आखिर तक रही, जब शरद पवार गुट की एनसीपी से करजत-जामखेड के विधायक रोहित पवार ने अजित पवार के साथ मंच साझा किया.
इसके एक दिन बाद, बारामती की सांसद सुप्रिया सुले, जो अजित पवार की चचेरी बहन और शरद पवार की बेटी हैं, उन्होंने अजित पवार के साथ, दोनों दलों के अन्य नेताओं के साथ मिलकर, पुणे के लिए दोनों एनसीपी का संयुक्त घोषणा पत्र जारी किया.
अजित पवार के भतीजे रोहित पवार ने बताया कि वह महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के चुनाव से पहले चल रही अलग-अलग प्रक्रियाओं में व्यस्त थे, जिन्हें अब बॉम्बे हाई कोर्ट ने रोक दिया है.
पिंपरी चिंचवड में प्रचार करते हुए, रोहित पवार ने अपने चाचा अजित को “केजीएफ के रॉकी भाई” बताया, जो दो “गरुड़ों” से लड़ रहे हैं. यह बात उन्होंने इशारों में वहां के दो बीजेपी विधायकों—महेश लांडे और शंकर जगताप, पर तंज कसते हुए कही. ‘रॉकी भाई’ फिल्म का नायक है, जबकि ‘गरुड़ा’ खलनायक है.
पुणे और पिंपरी चिंचवड में दोनों एनसीपी के अभियान में अजित पवार ही बिना किसी विवाद के मुख्य चेहरा और गठबंधन का चेहरा हैं. नेताओं और जानकारों का कहना है कि अगर दोनों एनसीपी का फिर से मिलन होता भी है, तो इसमें भी ज्यादा फर्क होने की संभावना नहीं है.
पार्टी नेताओं का कहना है कि अगर दोनों एनसीपी फिर से एक होती हैं, तो इससे अजित पवार को राष्ट्रीय स्तर पर अपनी एनसीपी मजबूत करने में मदद मिलेगी, क्योंकि 2024 के लोकसभा चुनाव में शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी के चुने गए आठ सांसद पार्टी को मिल जाएंगे.
इसके अलावा, शरद पवार का राज्यसभा कार्यकाल इस साल अप्रैल में खत्म हो रहा है. अगर दोनों एनसीपी साथ आ जाती हैं, तो उनकी पार्टी के लिए दोबारा नामांकन आसान हो जाएगा.
हालांकि, अभी भी कई अगर-मगर बाकी हैं. फिलहाल, अजित पवार की ओर से दोनों एनसीपी के फिर से एक होने के संकेत महज दिखावा भर हैं.
राजनीतिक विश्लेषक प्रताप आसबे, जो पवार परिवार को करीब से जानते हैं, उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “अजित पवार दोनों एनसीपी के बीच समझौते के संकेत सिर्फ चुनाव के लिए दे रहे हैं. अगर दोनों गुट सच में एक साथ आते हैं, तो यह साफ नहीं है कि अजित पवार महायुति छोड़ेंगे या शरद पवार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल होंगे.”
उन्होंने आगे कहा, “शरद पवार एनडीए में सक्रिय सहयोगी नहीं बनेंगे और जिला परिषद चुनावों को छोड़ दें, तो अगला चुनाव सीधा 2029 में है. ऐसे में अजित पवार सत्ता छोड़कर महायुति से बाहर नहीं आएंगे. जो कुछ अभी हो रहा है, वह सिर्फ राजनीतिक दिखावा है.”
2017 में अविभाजित शिवसेना ने अपने लिए बनाए गए विकल्पों का इस्तेमाल किया था. अजित पवार क्या करेंगे, यह अभी देखना बाकी है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
