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Wednesday, 11 February, 2026
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MVA का क्या होगा? सेना-यूबीटी से दूरी और NCP समीकरण ने बढ़ाई कांग्रेस की चिंता

चंद्रपुर नगर निगम में मेयर चुनाव ताज़ा विवाद है. कांग्रेस और सेना-यूबीटी के बीच दरारें कुछ समय से बढ़ रही हैं.

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मुंबई: महाराष्ट्र में स्थानीय निकाय चुनावों के बाद महा विकास अघाड़ी (एमवीए) टूटने की कगार पर दिखाई दे रही है. उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और कांग्रेस के बीच बढ़ती दूरी और शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के कुछ नेताओं का अजित पवार गुट में विलय के लिए उत्सुक होना, इस स्थिति को और गंभीर बना रहा है.

दोनों दलों के रिश्तों में ताज़ा तनाव चंद्रपुर नगर निगम चुनाव को लेकर है. यहां कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, फिर भी वह अपना मेयर नहीं चुन सकी क्योंकि शिवसेना-यूबीटी की स्थानीय इकाई ने भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार का समर्थन कर दिया.

महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष हर्षवर्धन सपकाल ने मीडिया से कहा, “सेना-यूबीटी एमवीए और इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, इसलिए उनसे चंद्रपुर में हमारा समर्थन करने की उम्मीद थी. उन्होंने जो फैसला लिया है, उसकी कीमत उन्हें पूरे राज्य में चुकानी पड़ेगी. क्या कांग्रेस को भी परभणी में ऐसा ही फैसला लेना चाहिए?”

सपकाल का इशारा परभणी नगर निगम की ओर था, जहां कांग्रेस ने सेना-यूबीटी को समर्थन दिया था और दोनों मिलकर सत्ता में आए थे.

मंगलवार सुबह तक शिवसेना-यूबीटी के नेता कह रहे थे कि वे चंद्रपुर में बीजेपी की मदद नहीं करेंगे, लेकिन स्थानीय इकाई ने अलग फैसला लिया. सेना-यूबीटी सूत्रों के अनुसार, पार्टी नेतृत्व स्थानीय इकाई के खिलाफ कार्रवाई कर सकता है क्योंकि उसने पार्टी लाइन का पालन नहीं किया.

एमएलसी और वरिष्ठ सेना-यूबीटी नेता अनिल परब ने मंगलवार को मीडिया से कहा, “ये फैसले स्थानीय इकाई लेती है. यह एमवीए या हमारी पार्टी का फैसला नहीं है.”

लेकिन चंद्रपुर की घटना केवल ताजा विवाद है. कांग्रेस और सेना-यूबीटी के बीच दूरी कुछ समय से बढ़ती जा रही है.

बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) चुनाव के लिए सेना-यूबीटी चाहती थी कि वह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़े, लेकिन कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. कांग्रेस ने इसके पीछे राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) की गठबंधन में मौजूदगी का कारण बताया.

सेना-यूबीटी के एक नेता ने दिप्रिंट से कहा, “कांग्रेस लंबे समय से कह रही थी कि उन्हें हमारी ज़रूरत नहीं है. चंद्रपुर में भी उनके दो गुट हैं और धनोरकर गुट ने कहा कि उन्हें हमारी ज़रूरत नहीं है. ऐसे में हम क्या करते?”

चंद्रपुर से सांसद प्रतिभा धनोरकर, कांग्रेस विधायक दल के नेता और क्षेत्र के विधायक विजय वडेट्टीवार से जूनियर हैं. कुछ समय से चंद्रपुर में स्थानीय इकाई पर नियंत्रण को लेकर अंदरूनी खींचतान चल रही है.

नेता ने आगे कहा, “चंद्रपुर में जो हुआ, उस पर फैसला उद्धव साहेब लेंगे. अभी कोई चुनाव नहीं है…देखते हैं कि नेतृत्व भविष्य को लेकर क्या निर्णय करता है.”

इस बीच, राज्य में बन रही स्थिति पर चर्चा के लिए कांग्रेस हाईकमान ने हर्षवर्धन सपकाल को दिल्ली बुलाया है.

क्या कांग्रेस अपने रिश्तों पर फिर से सोच रही है?

महा विकास अघाड़ी (एमवीए) 2019 में खास हालात में बनी थी. कांग्रेस ने पहली बार अविभाजित शिवसेना के साथ हाथ मिलाया था—एक ऐसी पार्टी, जिसका वह पहले अलग विचारधारा के कारण विरोध करती रही थी.

2022 में शिवसेना में टूट के बाद भी एमवीए बना रहा और ठाकरे गुट उसका हिस्सा रहा. कांग्रेस और सेना-यूबीटी ने 2024 लोकसभा चुनाव साथ मिलकर लड़ा, लेकिन सीट बंटवारे की बातचीत के दौरान दरारें दिखने लगी थीं.

उदाहरण के लिए, सेना-यूबीटी सांगली लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहती थी—जो परंपरागत रूप से कांग्रेस का मजबूत गढ़ रही है. उस समय भी कांग्रेस की स्थानीय इकाई इस बात से नाराज़ थी कि सेना-यूबीटी ने इस मामले को कैसे संभाला.

कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट से कहा, “वह सीट कभी उनकी थी ही नहीं, क्योंकि वहां उनकी जीत की कोई संभावना नहीं थी, लेकिन गठबंधन धर्म के कारण हमने उन्हें सीट दी. वे ज़मीनी हकीकत समझे बिना उस सीट से चुनाव लड़ने पर अड़े रहे. हुआ क्या…आखिर में वे हार गए और कांग्रेस उम्मीदवार ने निर्दलीय के रूप में जीत हासिल की.”

हालांकि, कुछ महीनों बाद विधानसभा चुनाव के लिए दोनों दलों ने साझेदारी जारी रखी, लेकिन गठबंधन के खराब प्रदर्शन के बाद दरारें और बढ़ गईं.

स्थानीय निकाय चुनाव में दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा.

शिवसेना-यूबीटी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “बीएमसी के लिए हमने कांग्रेस को साथ आने का निमंत्रण दिया था, लेकिन उनकी स्थानीय इकाई हमारे साथ नहीं आना चाहती थी. वे इस पर अड़े रहे. इसलिए चंद्रपुर में हमारी स्थानीय इकाई ने वही फैसला लिया जो उसे सही लगा.”

पिछले महीने बीएमसी चुनाव में महायुति (बीजेपी और एकनाथ शिंदे की शिवसेना) ने 118 सीटें जीतीं—जो बहुमत से चार ज्यादा थीं. उम्मीद थी कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनकर उभरी सेना-यूबीटी मेयर पद के लिए बीजेपी के खिलाफ उम्मीदवार उतारेगी, लेकिन बीजेपी का मेयर उम्मीदवार बिना मुकाबले के जीत गया, जिससे कांग्रेस नाराज़ हो गई.

इसके अलावा, शिंदे की शिवसेना और दोनों एनसीपी गुट बीएमसी में एक साथ रहेंगे, जो एमवीए के कमजोर होने का एक और संकेत है. शरद पवार की एनसीपी का केवल एक पार्षद है, जिसने शिंदे की शिवसेना को समर्थन दिया है.

दोनों एनसीपी के विलय की संभावना की चर्चा ने भी कांग्रेस को सोचने पर मजबूर कर दिया है. कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी 2029 का चुनाव अकेले लड़ने के लिए अपने ज़मीनी कार्यकर्ताओं को तैयार कर रही है.

कांग्रेस के एक अन्य वरिष्ठ नेता ने दिप्रिंट से कहा, “शिवसेना (यूबीटी) ने जो किया, वह सही नहीं था. इससे लगता है कि नेतृत्व का अपने स्थानीय नेताओं पर नियंत्रण नहीं है. जब चंद्रपुर में हमसे बातचीत चल रही थी, तब उन्हें खुलकर बात करनी चाहिए थी. ऐसा लगता है कि 2029 में राज्य में मुकाबला बीजेपी बनाम कांग्रेस होगा.”

सोमवार को मीडिया से बात करते हुए सपकाल ने कहा कि 2029 में अभी समय है और उस समय की राजनीतिक स्थिति के आधार पर पार्टी फैसला करेगी.

उन्होंने कहा, “एमवीए 2019 में खास हालात में बना था. स्थानीय निकाय चुनाव में हमने कहीं अकेले तो कहीं गठबंधन में चुनाव लड़ा, जैसा स्थानीय स्थिति थी. कांग्रेस राज्य में सबसे बड़ा विपक्ष बनकर उभरी है.”

ताजा घटनाक्रम और फिलहाल कोई चुनाव सामने न होने के कारण एमवीए का भविष्य अधर में है. कांग्रेस जहां गठबंधन के भविष्य का आकलन करना चाहती है, वहीं शिवसेना-यूबीटी अब भी एमवीए को लेकर उम्मीद बनाए हुए है.

उक्त शिवसेना-यूबीटी के वरिष्ठ नेता ने कहा, “सिर्फ चंद्रपुर की घटना से यह नहीं कहा जा सकता कि एमवीए टूट गया है. ऐसे फैसले शीर्ष नेतृत्व लेता है. सपकाल या कोई भी अभी कुछ भी कह सकता है…फैसला बाद में होगा. फिलहाल एमवीए साथ है.”

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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