नई दिल्ली: उत्तराखंड के राज्यपाल ने धामी सरकार के दो अहम संशोधन विधेयकों को पुनर्विचार के लिए वापस भेज दिया है. इनमें एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) से जुड़ा है और दूसरा और सख्त धर्मांतरण विरोधी कानून से संबंधित है. दिप्रिंट क इस बारे में जानकारी मिली है.
सरकार के सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह (रिटायर्ड) के कार्यालय ने इन दोनों संशोधन विधेयकों को तकनीकी कारणों से लौटाया है, जिनमें ड्राफ्टिंग की गलतियां भी शामिल हैं.
उत्तराखंड देश का पहला और अब तक एकमात्र राज्य है जहां यूसीसी लागू किया गया है. अगस्त में प्रक्रियात्मक दिक्कतों को दूर करने और दंड प्रावधानों को आधुनिक बनाने आदि के लिए यूसीसी में बदलाव किए गए थे.
बीजेपी शासित राज्य की कैबिनेट द्वारा अगस्त में मंजूर उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता (संशोधन) विधेयक में जबरन या धोखाधड़ी से कराए जाने वाले धर्मांतरण के खिलाफ सख्त प्रावधान जोड़े गए थे.
यूसीसी और धर्मांतरण विरोधी कानून—दोनों को ही विरोध का सामना करना पड़ा है और ये काफी विवादों में रहे हैं.
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “कुछ तकनीकी समस्याएं, व्याकरण से जुड़ी दिक्कतें और ड्राफ्टिंग की गलतियां थीं, जिस वजह से (धर्मांतरण विरोधी) विधेयक इस महीने की शुरुआत में वापस कर दिया गया.”
दिप्रिंट से बात करते हुए एक अन्य अधिकारी ने कहा कि इस मुद्दे पर काम किया जा रहा है. हालांकि, सरकार के पास कानून को तुरंत लागू करने के लिए अध्यादेश लाने का विकल्प भी है.
अगस्त में जब कैबिनेट ने इस विधेयक को मंजूरी दी थी, तब उत्तराखंड सरकार ने एक प्रेस बयान जारी किया था. इसमें कहा गया था कि संशोधन में “लालच” की परिभाषा को व्यापक किया गया है. इसके तहत पैसे, तोहफे या नौकरी का ऑफर देकर, मुफ्त शिक्षा का वादा करके, शादी का झांसा देकर धोखा देने या सोशल मीडिया के जरिए प्रचार कर धर्मांतरण की कोशिश को अपराध माना गया है. शादी के इरादे से अपनी धर्म पहचान छिपाना भी अपराध होगा, जिसकी सजा तीन से 10 साल की जेल और 3 लाख रुपये जुर्माना होगी.
उत्तराखंड धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम, 2018 में जबरन, दबाव, उकसावे या लालच के जरिए “जबरन या धोखाधड़ी से” कराए गए धर्मांतरण के दोषी को अधिकतम पांच साल की जेल का प्रावधान था.
2022 के संशोधन में कम से कम दो साल और अधिकतम सात साल की जेल तथा कम से कम 25,000 रुपये जुर्माने का प्रावधान किया गया. इसके अलावा, अगर “जबरन” धर्मांतरण का शिकार कोई नाबालिग, महिला या अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से संबंधित व्यक्ति हो, तो सजा दो से 10 साल की जेल और कम से कम 25,000 रुपये जुर्माना तय की गई.
2025 के संशोधन के तहत, धोखाधड़ी से किए गए धर्मांतरण पर तीन से 10 साल की जेल और कम से कम 50,000 रुपये जुर्माना होगा. अगर पीड़ित नाबालिग, महिला, एससी/एसटी से संबंधित व्यक्ति या दिव्यांग है, तो सजा पांच से 14 साल की जेल और कम से कम 1 लाख रुपये जुर्माना होगी.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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