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Thursday, 11 July, 2024
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अगले साल UP में चुनाव लड़ना चाहता है बिहार NDA का यह सहयोगी, लेकिन BJP ने रख दी है एक अहम शर्त

पिछले कुछ दिनों में, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के नेता संतोष मांझी ने बीजेपी आलाकमान के नेताओं और यूपी के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ से मुलाकात की है. रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (ए) के रामदास अठावले ने भी ऐसा ही किया है.

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नई दिल्ली: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के नेतृत्व वाला हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (हम), जो बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) का एक घटक है, अब 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में मैदान में उतरने की तैयारी कर रहे हैं. लेकिन बिहार के हीं इसके अन्य सहयोगी मुकेश साहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के विपरीत, यह भाजपा, जो फिर से चुन कर सत्ता में आने की फिराक में है, के हाथों को मजबूत करने के लिए मैदान में आना चाहता है.

भाजपा के सूत्रों ने बताया कि इसके पीछे की योजना दलितों को पार्टी की ओर आकर्षित करना है क्योंकि यूपी में इस समुदाय का सबसे प्रमुख राजनीतिक ठिकाना – मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) – लगातार अपनी जमीन खो रही है.

पिछले कुछ दिनों में, हम नेता संतोष मांझी, जो जीतन राम मांझी के बेटे और बिहार सरकार में मंत्री है, के साथ-साथ मुंबई स्थित रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के रामदास अठावले ने भी भाजपा नेतृत्व और उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की और आगामी विधानसभा चुनाव लड़ने की अपनी इच्छा व्यक्त की है.

भाजपा के सूत्रों का कहना है कि पार्टी के आलाकमान ने इन दोनों दलों के सामने एक शर्त रखी है कि वे भाजपा के समर्थन में दलितों को लामबंद करें, और उनके प्रयासों से संतुष्ट होने के बाद ही पार्टी सीट बंटवारे की चर्चा होने पर उनका ध्यान रखेगी.
उत्तर प्रदेश में दलित राज्य की आबादी का लगभग 21.5 प्रतिशत हिस्सा हैं और पश्चिमी यूपी की कई सीटों में वे निर्णायक भूमिका निभाने के लिए जाने जाते हैं. यूपी की कुल 403 विधानसभा सीटों में से 85 दलितों के लिए आरक्षित हैं.

पहले इस समुदाय को बसपा के एकमुश्त वोट बैंक के रूप में देखा जाता था, लेकिन पिछले दो विधानसभा चुनावों में दलितों के बीच अपना आकर्षण खोने के बाद अब इस पार्टी को केवल जाटव दलितों पर पकड़ रखने वाला दल माना जाता है.

बसपा द्वारा खाली की गयी राजनैतिक जमीन को हथियाने के लिए अन्य दलों में मची होड़ के बीच भाजपा को डर है कि दलित अधिकारों पर एक मजबूत आवाज के रूप में उभरने वाले चंद्रशेखर आज़ाद की भीम आर्मी को इस समुदाय के युवा मतदाताओं के बीच अच्छा समर्थन मिल सकता है.

पिछले साल अक्टूबर में बिहार की एक अन्य पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान के निधन के बाद से एनडीए के पास कोई प्रमुख दलित चेहरा नहीं बचा है. उनके निधन के बाद से हीं लोजपा एक विभाजित घर बनी हुई है और पासवान के उत्तराधिकारी के रूप में भाजपा जिस दलित नेता, पासवान के भाई पशुपति कुमार पारस, को आगे बढ़ा रही है उनका उतना प्रभाव नहीं है.

इस राजनैतिक शून्य को भरने के लिए हीं भाजपा महादलित मुसहर समुदाय से ताल्लुक रखने वाले जीतन मांझी और अम्बेडकरवादी नेता अठावले पर भरोसा कर रही है.

उत्तर प्रदेश भाजपा के एक नेता ने कहा, ‘भाजपा इन पार्टियों के साथ कुछ सीटें साझा करने के खिलाफ नहीं है. हालांकि, यह सारा कुछ केवल सीटों के बारे में नहीं है. दोनों पार्टियां एनडीए की गठबंधन सहयोगी हैं और राज्य में भाजपा की मदद करना उनका कर्तव्य है.’

उनका कहना है, ‘भाजपा ने हमेशा सत्ता को साझा करने में दलितों को उचित प्रतिनिधित्व दिया है और वे जानते हैं कि यह भाजपा हीं है जो उनके हितों की रक्षा कर रही है. राजनीति लेन-देन से चलती है. अगर अठावले और मांझी भाजपा की मदद करना चाहते हैं, तो यह एक स्वागत योग्य प्रयास है.”

राजनैतिक खेल का नया मैदान

सोमवार को दिप्रिंट से बात करते हुए संतोष मांझी, जो आदित्यनाथ से लखनऊ में मिले थे, ने कहा कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी की ताकत का आकलन करने के लिए लखनऊ आये थे. उन्होंने यह भी बताया कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के साथ उनकी बातचीत एक ‘प्रारंभिक दौर की बैठक’ थी.

उन्होंने कहा, ‘मैंने योगी जी को अपनी पार्टी, उसकी गतिविधियों और बिहार में हम क्या-क्या कर रहे हैं, इस सब के बारे में जानकारी दी है. हमने अभी यह तय नहीं किया है कि हम यहां कितनी सीटों पर चुनाव लड़ेंगे. लखनऊ में अपने नेताओं की बैठक के दौरान हमने अपनी ताकत का आकलन किया. अगले स्तर की बातचीत हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष करेंगे, लेकिन हम यह चुनाव लड़ना चाहते हैं क्योंकि दोनों राज्यों में दलितों के मुद्दे एक समान ही हैं.’

संतोष मांझी ने कहा कि वे भाजपा से साथ चुनाव लड़ेंगे या उससे अलग इस सवाल पर फैसला बाद में किया जाएगा, लेकिन उनके अनुसार योगी जी ने उनके विचार सुने और उनके काम की तारीफ भी की.

हालांकि मांझी के बारे में माना जा रहा है कि वे भाजपा की योजना से सहमत हैं, फिर भी उत्तर प्रदेश में भाजपा के एक उपाध्यक्ष ने कहा कि उनके इरादे कुछ और भी हो सकते हैं.


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वे आगे कहते हैं, ‘मांझी के पैर दो नावों में सवार हैं. वह नीतीश (बिहार के सीएम नीतीश कुमार) के काफी करीबी हैं और वे नरेंद्र मोदी से भी मिलते रहते हैं. अभी यह निश्चित नहीं है कि वह नीतीश की ओर से काम कर रहे हैं या वे वास्तव में यूपी में भाजपा की मदद करना चाहते हैं.‘

पिछले हफ्ते योगी आदित्यनाथ से मुलाकात करने वाले अठावले ने बाद में लखनऊ में मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि यूपी के दलित अब मायावती के नहीं बल्कि बीजेपी के साथ हैं.

उन्होंने 26 सितंबर से 18 दिसंबर तक चलने वाली ‘बहुजन समाज कल्याण यात्रा’ की भी घोषणा की है, जिसका समापन लखनऊ के अंबेडकर पार्क में एक रैली के रूप में होगा, जिसे अठावले के अलावा भाजपा के राष्टीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा और योगी आदित्यनाथ भी संबोधित करेंगे.

माना जा रहा है कि केंद्रीय मंत्री और सांसद आठवले ने यूपी में बीजेपी से 8-10 सीटों की मांग की थी. बिहार एनडीए का एक और सहयोगी दल जो यूपी चुनाव लड़ना चाहता है, वह है मुकेश साहनी- जो बिहार के मंत्री भी हैं – की वीआईपी. हालाँकि, इस बारे में कहा जाता है कि वह आदित्यनाथ से तब से नाराज़ हैं जब से उत्तर प्रदेश में निषाद समुदाय की नेता और डाकू से सांसद बनी दिवंगत नेत्री फूलन देवी की पुण्यतिथि (25 जुलाई) पर उनकी प्रतिमाओं को स्थापित करने की साहनी की कोशिश को कथित तौर पर विफल कर दिया गया था.

यूपी पुलिस ने न केवल वाराणसी और मिर्जापुर में रखी गयी मूर्तियों को जब्त कर लिया, बल्कि साहनी को बैठक करने के लिए वाराणसी हवाई अड्डे से बाहर निकलने भी नहीं दिया. कहा जाता है कि आदित्यनाथ ने भी कथित तौर पर उन्हें मुलाकात के लिए समय नहीं दिया.

एक भाजपा नेता ने दिप्रिंट को बताया, ‘चूंकि पार्टी यूपी में पहले से हीं निषाद पार्टी के साथ गठबंधन में शामिल है और इस समुदाय के वोटों में विभाजन नहीं चाहती है, इसलिए हम साहनी के साथ किसी तरह की सुलह-सफाई करने के प्रति कतई इच्छुक नहीं हैं.’

साहनी ने पिछले हफ्ते मीडिया की बताया था कि वे यूपी की 165 सीटों पर चुनाव लड़ना चाहते हैं.

दलित वोट की चाहत

उत्तर प्रदेश में दलित मतदाता अपने समुदाय को प्रभावित करने वाले मुद्दों को उठाने के प्रति मायावती के गैर-जुझारू रवैये और हिंदुत्व में पार्टी की बढ़ती हुई दिलचस्पी के कारण बसपा से एक प्रकार का मोहभंग हुआ महसूस कर रहे हैं.

2012 के चुनाव में, बसपा ने दलितों के लिए आरक्षित 85 सीटों में से केवल 15 जीती थी और राज्य में डाले गए कुल मतों का सिर्फ 27 प्रतिशत पाया था, जबकि समाजवादी पार्टी (सपा) को आरक्षित सीटों में से 58 और 31.5 प्रतिशत वोट मिले.
2017 में भाजपा को 85 आरक्षित सीटों में से 69 सीटें और 39 फीसदी वोट मिले थे, जबकि सपा को इनमें से सात सीटें मिली थीं. बसपा को सिर्फ दो सीटें हीं मिल पाई थी

इस सब ने उत्तर प्रदेश, जहां अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने है, में दलित वोट के लिए एक नई लड़ाई शुरू कर दी है, .
पश्चिमी यूपी में आक्रामक रूप से दलितों को लुभाने में लगी समाजवादी पार्टी 5 अगस्त से एक साइकिल यात्रा शुरू कर रही है जो हर तहसील में 5 से 10 किलोमीटर की दूरी तय करेगी.

कृषि कानूनों से नाराज चल रहे जाट किसानों के समर्थन से उत्साहित राष्ट्रीय लोक दल भी पश्चिमी यूपी में दलित समर्थन हासिल करने पर भरोसा कर रही है. इसी आशय से रालोद 5 अगस्त से ‘न्याय यात्रा’ शुरू कर रहा है.

इस बीच आजाद ने पिछले महीने हीं दलित वोट इकठ्ठा करने के लिए साइकिल यात्रा शुरू की थी.

भाजपा भी दलित वोट को आकर्षित करने के लिए लगातार कई प्रयास कर रही है. पिछले महीने हुई केन्दीय कैबिनेट की फेरबदल में मोदी सरकार ने यूपी के गैर-जाटव दलित समुदाय के तीन मंत्रियों- कौशल किशोर (जाति से पासी), एसपीएस बघेल (गडेरिया-धनगर) और भानु प्रताप वर्मा (कोरी)- को शामिल किया था.

इससे पहले, भाजपा ने जाटव दलित नेता कांता कर्दम को यूपी में पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया और एक अन्य नेता अशोक जाटव को योगी कैबिनेट में मंत्री के रूप में जगह दी थी. इसके अलावा उसने मायावती के कार्यकाल के दौरान डीजीपी रहे पूर्व आईपीएस अधिकारी बृज लाल को राज्यसभा भेजा था.

बीजेपी ने यूपी से केंद्रीय कैबिनेट में नए शामिल किए गए अपने ओबीसी/दलित सांसद-मंत्रियों को पार्टी के लिए इन समुदायों के समर्थन को और मजबूत करने के लिए 16 अगस्त से अपने-अपने जिलों में ‘जनआशीर्वाद यात्रा’ शुरू करने का निर्देश दिया है.
हालांकि यूपी में दलित मतदाताओं के रुख के बारे में बात करते हुए लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर कमल कुमार ने कहा कि मायावती अभी भी उनके बीच सबसे बड़ी ताकत हैं.

उन्होंने कहा कि भीम आर्मी को केवल एक निर्वाचन क्षेत्र विशेष में हीं उनका सामर्थन मिलेगा, राज्य भर में नहीं, क्योंकि उनका जमीनी सांगठनिक तंत्र बसपा जितना मजबूत नहीं है. उनका मानना है पूरे राज्य में, दलितों द्वारा मायावती को हीं अपने मुद्दों को उठाने वाली एक मजबूत ताकत के रूप में देखा जाता है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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