Sunday, 3 July, 2022
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झारखंड विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिली हार के पांच कारण

एंटी-इनकंबेंसी से जूझ रही भाजपा ने एक अलोकप्रिय मुख्यमंत्री का समर्थन किया और जानकारी होने के बावजूद सुधार करने का थोड़ा ही काम किया था.

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नई दिल्ली : सोमवार को आए झारखंड विधानसभा चुनाव के नतीजे के बाद भाजपा ने एक और राज्य गंवा दिया. झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन के मुकाबले भाजपा को कम सीटें मिलीं.

यह हार पिछले साल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में पार्टी की हार के बाद हुई है. हालांकि, महाराष्ट्र में भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, लेकिन वह सरकार बनाने में विफल रही.

चुनाव आयोग (ईसी) की वेबसाइट के अनुसार 7 बजकर 45 मिनट तक भाजपा ने 11 सीटें जीती थीं और 15 अन्य सीटों पर आगे चल रही थी, भाजपा अब भी 81 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत के आंकड़े से 25 सीट कम है. इस बीच, झामुमो-कांग्रेस-आरजेडी गठबंधन ने 20 सीटें जीतीं और 26 पर आगे रही और अच्छी तरह से सरकार की स्थिति में हैं.

झारखंड में भाजपा के खिलाफ कई कारकों ने काम किया है, जिनमें से प्रमुख एंटी-इनकंबेंसी है, इस तथ्य से स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री रघुवर दास, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह द्वारा समर्थन प्राप्त माना जाता है वे भी जमशेदपुर पूर्वी निर्वाचन क्षेत्र में 16,000 वोटों से पीछे चल रहे हैं.

रघुवर दास भाजपा के बागी सरयू राय से चुनाव हार गए हैं जिन्होंने चुनाव से पहले मुख्यमंत्री को चुनौती दी थी. उन्होंने 2014 के चुनावों में 70,157 वोटों से चुनाव जीता था.

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भाजपा के एक अन्य बड़े नेता झारखंड राज्य इकाई के अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा चक्रधरपुर में 11,000 से अधिक वोटों से पीछे हैं, जबकि निवर्तमान अध्यक्ष दिनेश उरांव सिसई विधानसभा क्षेत्र में 34,000 से अधिक वोटों से पीछे हैं.

भाजपा इस बात से वाकिफ थी कि उसका मुख्यमंत्री बेहद अलोकप्रिय था, लेकिन पार्टी आलाकमान मोदी-शाह की जोड़ी ने उनका समर्थन करने का फैसला किया, यह रणनीति उलटी पड़ गयी.

रघुवर दास ने अपनी नीतियों से राज्य में न केवल आदिवासियों को नाराज किया था, बल्कि उनकी अपनी पार्टी में भी नाराजगी थी, जो उन्हें एक ‘घमंडी अनुशासनवादी’ के रूप में देखती थी. इन सभी मुद्दों ने चुनाव में एक माहौल तैयार किया था.

यह पांच कारण जिसकी वजह से भाजपा को झारखंड चुनावों में हारना पड़ा.


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आदिवासियों की नाराज़गी

रघुवर दास के प्रति गुस्से के मुख्य कारक में से एक झारखंड के आदिवासी थे, जो राज्य की आबादी का लगभग 26.3 प्रतिशत हैं. मुख्यमंत्री के रूप में दास का उत्थान स्वयं भाजपा की इस पद के लिए एक गैर-आदिवासी को वापस लेने की रणनीति का हिस्सा था.

लेकिन, उनकी नीतियां जिससे आदिवासियों में नाराजगी थी. मुख्यमंत्री ने राज्य के किरायेदारी अधिनियम को डायलूट किया और 2018 में भूमि अधिग्रहण अधिनियम को कमजोर किया, इससे यह डर बढ़ गया कि आदिवासी भूमि का अधिग्रहण करना आसान हो जाएगा.

हालांकि, व्यापक विरोध के बाद मुख्यमंत्री ने अपने निर्णय को बदल दिया.

भाजपा के एक नेता ने कहा, ‘भूमि भारत में एक बहुत ही भावनात्मक मुद्दा है और आदिवासी अपने जमीन के अधिकार के बारे में बहुत ही संवेदनशील हैं. कानून ने आदिवासियों में भय पैदा किया और यह हम पर हावी हो गया. विपक्ष ने भी इस मुद्दे को खूब भुनाया.

यह उनकी अलोकप्रियता का शुरुआती समय था, जो कि आदिवासी गुट का मुकाबला करने के लिए 14 प्रतिशत के ओबीसी आरक्षण का वादा करने के बाद ही बढ़ा. हालांकि, कांग्रेस ने 27 प्रतिशत आरक्षण का वादा करके उसे पीछे छोड़ दिया, यह एक रणनीति थी जो कि काम आयी.

इस कदम ने राज्य के आदिवासियों को और भी नाराज कर दिया. भाजपा के लिए एक रास्ता था, लेकिन पार्टी ने नीति को बदलने से इनकार कर दिया.

चुनाव के दौरान भाजपा के एक वरिष्ठ महासचिव ने भी यह स्वीकार करते हुए कहा था कि रघुवर दास राज्य में अलोकप्रिय थे हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री बहुत अलोकप्रिय हैं, लेकिन इस समय पार्टी कुछ नहीं कर सकती है.

भाजपा रघुवर दास को वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के साथ बदल सकती थी, लेकिन इसके खिलाफ फैसला किया.

ऐसा प्रतीत होता है कि चुनाव में सभी एक साथ आए हैं. हालांकि, अनुसूचित जनजातियों के लिए 28 निर्वाचन क्षेत्र आरक्षित हैं, लेकिन कम से कम तीन और जनजातीय बहुल हैं.

31 आदिवासी बहुल सीटों में से, झामुमो और कांग्रेस 22 सीटों में और भाजपा केवल नौ सीटों पर आगे हैं.


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स्थानीय स्तर पर पार्टी में असंतोष, कलह

पार्टी अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रघुवर दास के समर्थन के बावजूद राज्य इकाई में उनके नेतृत्व के खिलाफ असंतोष था.

विद्रोहियों में प्रमुख थे, अनुभवी नेता और राज्य मंत्री सरयू राय, जो जमशेदपुर पूर्व में दास को हराने के लिए तैयार थे.

पार्टी में सबसे ज्यादा असंतोष टिकट वितरण को लेकर था. रघुवर दास पर पार्टी में अपने प्रतिद्वंदी पूर्व सीएम अर्जुन मुंडा के सहयोगियों को कमजोर करने का आरोप था और साथ ही सरयू रॉय के समर्थकों को भी दरकिनार कर दिया गया था.
राज्य के एक भाजपा नेता ने दिप्रिंट को बताया कि संगठन को नियंत्रित करने के लिए, रघुवर दास ने व्यवस्थित रूप से तीन बार के मुख्यमंत्री मुंडा और उनके सहयोगियों को कमजोर करने की कोशिश की.

भाजपा नेता ने कहा, ‘एक समय में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि मुंडा को राज्य सरकार के समारोह में न बुलाया जाए. इस आक्रोश और गुटबाजी से पार्टी को नुकसान हुआ.’

एक अन्य भाजपा नेता ने कहा कि पार्टी गलत टिकट वितरण और वरिष्ठ नेताओं के अलगाव के कारण कम से कम पांच सीटें हार गई.

पार्टी को बहुस्तरीय प्रतियोगिता से मदद मिलने की उम्मीद थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ

भाजपा ने अपने सहयोगियों, लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) और जेडीयू को भी नजरंदाज कर दिया, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि झारखंड में अपना वर्चस्व रखने वाली ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) को छोड़ दिया.

भाजपा को उम्मीद थी कि आजसू अकेले चुनाव लड़ेगी और सत्ता विरोधी मतों का विभाजन करेगी. आजसू ने दो सीटें जीती और 7.96 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया. हालांकि, इसने विपक्षी गठबंधन को आगे बढ़ने से नहीं रोका.

एक राजनीतिक विश्लेषक ने दिप्रिंट को बताया कि आजसू और उसके नेता सुदेश महतो का राज्य में कुर्मी वोट बैंक पर पकड़ है और भाजपा की मदद कर सकते थे.

विश्लेषक ने कहा, ‘यदि दोनों आपस में लड़ते, तो वे 2014 के प्रदर्शन को दोहराते.’

राज्य और लोकसभा चुनावों में अलग-अलग वोटिंग पैटर्न

महाराष्ट्र और हरियाणा के बाद झारखंड का परिणाम एक बार फिर दिखाता है कि मतदाता अब स्थानीय और राष्ट्रीय मुद्दों के बीच अंतर कर रहे हैं. राज्य की 14 लोकसभा सीटों में से 12 सीटें जीतने के छह महीने बाद ही भाजपा ने झारखंड को खो दिया है.

मोदी ने आठ और शाह ने 11 रैलियां कीं आयोजित की और नागरिकता संशोधन अधिनियम, राम मंदिर मुद्दे को उठाया. बेरोजगारी, ग्रामीण संकट और भूमि और वन अधिकारों की अनदेखी करते हुए अन्य लोगों के बीच अभियान किया, यह सभी झारखंड के प्रमुख मुद्दे में से एक थे.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, संदेश स्पष्ट है कि मोदी हर राज्य का चुनाव नहीं जीत सकते. भाजपा को केंद्र द्वारा नियुक्त किए गए नेताओं पर नहीं राज्यों में बड़े नेताओं पर भरोसा करना चाहिए.


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आर्थिक मंदी, गरीबी

झारखंड देश का दूसरा सबसे गरीब राज्य है और भारत के गरीब आदिवासियों का 46 प्रतिशत राष्ट्रीय औसत का 28 प्रतिशत है. राज्य की अर्थव्यवस्था जमशेदपुर में इस्पात संयंत्रों, खानों और ऑटो उद्योग द्वारा संचालित होती है.

हालांकि, आर्थिक मंदी ने खनन और उत्खनन क्षेत्रों को व्यापक रूप से प्रभावित किया है. 2018-19 में निवेश और भूमि की कमी के कारण, झारखंड में 44 प्रतिशत विकास परियोजनाएं ठप हो गईं, जो भारत में सबसे अधिक हैं.

2014 में भाजपा सरकार ने अधिक निवेश और नौकरियों का वादा किया था, लेकिन एनएसएसओ के आंकड़ों के मुताबिक, झारखंड में ग्रामीण बेरोजगारी राष्ट्रीय औसत से अधिक है.

यह एक ऐसा चुनाव है, जिसमें आर्थिक मंदी का प्रभाव महसूस किया गया है क्योंकि छोटानागपुर और संथाल परगना डिवीजनों में भाजपा अधिकांश ग्रामीण सीटों पर पीछे चल रही है.

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

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