Monday, 27 June, 2022
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पंजाब चुनावों में ‘चौकोना’ मुक़ाबला नहीं होगा, उनसे एक पीढ़ीगत बदलाव आएगा: मनप्रीत बादल

दिप्रिंट से एक ख़ास इंटरव्यू में, पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल सूबे की राजनीति में एक नए दौर की बात करते हैं, क़र्ज़ से उबरने और उर्दू शायरी से अपने प्यार की बात करते हैं.

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चंडीगढ़: पंजाब के वित्त मंत्री मनप्रीत सिंह बादल को विश्वास है कि आगामी असेम्बली चुनाव सूबे की राजनीति में एक ‘पीढ़ीगत बदलाव’ लेकर आएंगे. बुधवार को दिप्रिंट से बात करते हुए मनप्रीत ने कहा, ‘राज्य के इतिहास में पहली बार होगा कि आगामी असेम्बली चुनावों में ऐसे नेताओं का दबदबा रहेगा जो स्वतंत्र भारत में पैदा हुए’.

कांग्रेस नेता ने कहा कि बदलाव पहले ही शुरू हो चुका है. उन्होंने इस ओर ध्यान दिलाया कि मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के पहले सीएम हैं जो आज़ादी के बाद के भारत में पैदा हुए हैं. उन्होंने कहा, ‘ये बदलाव हवा के ताजा झोंके की तरह है. ये स्फूर्ति लाने वाला है और इसने सरकार और पार्टी काडर में एक नई ऊर्जा का संचार किया है. नया नेतृत्व नई पीढ़ी की नुमाइंदगी करता है, ज़्यादा ऊर्जावान है और इससे प्रक्रिया को एक झटके से शुरू करने में मदद मिली है’.

अपने चुनाव क्षेत्र बठिंडा और अपने चंडीगढ़ ऑफिस के बीच चक्कर काटते हुए जहां चन्नी हर समय उन्हें अपने साथ रखना चाहते हैं. पंजाब के 57 वर्षीय ‘बुद्धिजीवी राजनेता’- वो अभिजात दून स्कूल, सेंट स्टीफन कॉलेज और लंदन यूनिवर्सिटी के पूर्व छात्र हैं- आगामी चुनावों में कांग्रेस की भारी जीत की अपेक्षा कर रहे हैं. उनके अनुसार सूबे चार-कोणीय मुक़ाबले की बात शुद्ध सैद्धांतिक है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘पंजाब के इतिहास में पहली बार चौकोने मुक़ाबले की बात हो रही है. हालांकि मेरे विचार में ‘चौकोना मुक़ाबला’ शब्द ही बुनियादी रूप से सैद्धांतिक हैं. फिर दशकों में पहली बार शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) और बीजेपी एक साथ चुनाव नहीं लड़ रहे होंगे. आम आदमी पार्टी (आप) के पास उस तरह का स्वभाव नहीं है कि वो एक संवेदनशील सीमावर्त्ती राज्य को चला सके जिसके लिए एक ख़ास परिपक्वता चाहिए. उन्होंने तो सीएम के लिए कोई चेहरा तक नहीं दिया है’.


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कांग्रेस की अंदरूनी कलह का मुद्दा

दिप्रिंट ने मनप्रीत से पूछा कि क्या अधिकारिक नियुक्तियों जैसे मामलों पर कांग्रेस की अंदरूनी कलह चुनावों से पहले पार्टी को नुक़सान पहुंचा सकती है. सितंबर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू इस हद तक चले गए कि पंजाब महाधिवक्ता (एजी) और पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्तियों को लेकर उन्होंने अपने पद से ही इस्तीफा दे दिया. जब तक कि आख़िरकार सीएम चन्नी इसी महीने उनकी मांगों के आगे नहीं झुक गए.

मनप्रीत ने दिप्रिंट को बताया कि उस मामले को संतोषजनक रूप से सुलझा लिया गया है. उन्होंने कहा, ‘एजी और डीजीपी जैसे सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति सीएम का विशेषाधिकार होता है. मतदाता सीएम और उनकी मंत्री परिषद को उनके कार्यों के लिए जवाबदेह मानते हैं. बतौर सीएम, वो सिर्फ अपनी पार्टी नहीं, बल्कि पूरे राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं. इसी तरह पार्टी अध्यक्ष पार्टी के भीतर नियुक्तियां करता है. एक परामर्श तंत्र होता है जिसके ज़रिए सरकार और पार्टी, एक दूसरे के विचारों से अवगत होते हैं और जहां तक संभव हो सके, एक दूसरे को समायोजित करते हैं. एजी मामले को सुलझा लिया गया है और मुझे यक़ीन है कि दूसरे मुद्दे भी जल्द सुलझा लिए जाएंगे’.

अलग अलग शासन, अलग अलग अनुभव

पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के भतीजे मनप्रीत कभी पक्के अकाली हुआ करते थे लेकिन छह साल पहले पाला बदलकर कांग्रेस में आ गए. वो अकाली-बीजेपी सरकार में भी वित्त मंत्री थे. दोनों शासनों में क्या अंतर था?

मनप्रीत ने कहा, ‘मुझे अब बतौर मंत्री नौ साल हो गए हैं और मैंने तीन मुख्यमंत्रियों के अंतर्गत काम किया है और इसके अलावा पांच बार विधायक भी रहा हूं. मैंने नौ बजट पेश किए हैं जो पंजाब में किसी भी दूसरे मंत्री से ज़्यादा है. मुझसे पहले सर मनोहर लाल ने, अविभाजित पंजाब के वित्त मंत्री के नाते, 1937 से 1947 तक आठ बजट पेश किए थे.’ उन्होंने आगे कहा कि अलग अलग शासनों में उनका अनुभव भी अलग अलग रहा है.

उन्होंने कहा, ‘मेरे पहले कार्यकाल में विवशताएं थीं. सीएम (प्रकाश सिह बादल) और एफएम के बीच एक पीढ़ी का अंतर था, जो नीतियों, सोचने के तरीको, प्रशासन और शासन के तरीको और लगभग हर चीज में ज़ाहिर होता था. उसके अलावा एक मंत्री के नाते सरकार के साथ वो मेरा पहला अनुभव था. एक अलग सीएम (कैप्टन अमरिंदर सिंह) के अंतर्गत दूसरा कार्यकाल उपलब्धियों के मामले में बहुत संतोषजनक रहा है. हम जीएसटी काउंसिल और वित्त आयोग दोनों से अतिरिक्त संसाधन लाने में कामयाब रहे हैं और हमारी पहलकदमियां भी फलीभूत हुई हैं. हालांकि मेरे विचारों को अकसर ख़ारिज कर दिया जाता था, लेकिन सीएम मेरे विचारों को सुनते और पसंद करते थे. चन्नी साहब एक बहुत ही उदार व्यक्ति हैं. राज्य की वित्तीय स्थिति पर असर डालने वाले तमाम फैसले वित्त विभाग से उचित परामर्श के बाद ही घोषित किए जा रहे हैं’.


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पंजाब का पतन और उसे पलटना

पंजाब भारत का सबसे समृद्ध प्रांत हुआ करता था, लेकिन पिछले कुछ दशकों में आर्थिक और सामाजिक दोनों सूचकों पर इसका ग्राफ नीचे की ओर आया है. ऐसे कैसे हुआ? मनप्रीत के अनुसार पंजाब की मौजूदा समस्याओं की जड़ें इसके इतिहास में छिपी हैं.

मनप्रीत ने कहा, ‘हां, पंजाब की कहानी दुखद हो गई है. मेरी पैदाइश और परवरिश पंजाब के गौरवपूर्ण दिनों में हुई थी, लेकिन कॉलेज के दिन बरसों चले आतंकवाद और उग्रवाद से भरे थे. आतंकवाद के बाद के दौर में पहले मैं विधायक और बाद में मंत्री बन गया. उससे मुझे पंजाब में तीन अवधियों की समीक्षा करने में मदद मिलती है. हमारे सूबे ने पांच लड़ाईयों और संघर्षों की मार झेली- पहली 1948 में थी जब कश्मीर पर चढ़ाई की गई थी. फिर आए 1962, 1965 और 1971 के युद्ध, जिनके बाद आतंकवाद और उग्रवाद के वर्षों के कलह और संघर्ष रहे’. उन्होंने आगे कहा कि क्रमिक केंद्र सरकारों की उपेक्षा के कारण राज्य की समस्याएं और बढ़ गईं.

‘मेरे विचार में केंद्र सरकार ने इन घटनाओं के लिए पंजाब को जितना उचित था उतना नहीं दिया. पंजाब के सैनिकों ने 1971 की महान विजय दिलाने में सहायता की लेकिन उसके नुक़सान का ख़ामियाज़ा राज्य को भुगतना पड़ा. पंजाब के ख़ज़ाने पर भारी दबाव आ गया. उसके अलावा साल 2000 के बाद से उद्योगों ने पंजाब से पलायन शुरू कर दिया क्योंकि पर्वतीय राज्यों में उन्हें ज़्यादा प्रोत्साहन दिए गए. वो एक वित्तीय मार थी’. उन्होंने आगे कहा कि कुछ सबसे ‘कड़ी चुनौतियों’ का सामना करने के बावजूद, राज्य अभी भी बना हुआ है.

उनका मानना है कि पंजाब को इसके लोगों के ‘चरित्र’ के हिसाब से आंका जाना चाहिए

उन्होंने कहा, ‘भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में पंजाब की एक अनोखी भूमिका रही है. ये भूमिका इसके आकार और आबादी के अनुपात से कहीं अधिक रही है. कोई भी ज़मीन अपने भौगोलिक स्थिति से परिभाषित नहीं होती. ये उसके लोगों के चरित्र से परिभाषित होती है. इतिहास के पन्नों में बेशुमार शहर और सूबे भुलाए जा चुके हैं, लेकिन पंजाब- पांच नदियों की धरती- मानवता के सामने आईं कुछ सबसे कड़ी चुनौतियों के बीच, अभी भी बना हुआ है. बड़े ख़तरों से सामना होने पर पंजाब सदियों से अपने सुपुत्रों को भारत की सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए भेजता रहा है. उसके एवज़ में हमने बस इतना मांगा है, कि जो लोग ज़िंदा लौटकर नहीं आ सके उन्हें दफ्नाने के लिए पर्याप्त जगह मिल जाए. भारत द्वारा लड़ी गई लड़ाइयों में पंजाब वीरता के लिए सबसे अधिक सम्मानित किया जाने वाला राज्य है और उससे अगले राज्य के पास पंजाब के वीरता पुरस्कारों का 50 प्रतिशत भी नहीं है’.

ये सवाल पूछने पर कि राज्य अपने पुराने अच्छे दिन किस तरह वापस ला सकता है, मनप्रीत ने कहा कि इस मामले काफी प्रगति हो रही है लेकिन केंद्र से और अधिक सहायता की ज़रूरत है.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘एक ख़ुशहाल भविष्य बनाने के लिए पंजाब को अपनी मौजूदा ताक़त में और सुधार करना होगा. उसके अलावा, उसे केंद्रीय पूल से एक उचित हिस्से की ज़रूरत है, जिसमें जीएसटी के सुस्त कार्यान्वयन की वजह से नाकामी हाथ लगी है. उसके लिए उद्योग और व्यापार में मज़बूत भागीदारों की ज़रूरत है. चाहे वो राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय. राज्य की अर्थव्यवस्था स्थिर हो गई है और अब ये उड़ान भरने को तैयार है. हमारे प्रोफेश्नल्स को नए हुनर सिखाकर उनके कौशल में सुधार किया जा रहा है और हमारे लोग राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार के लिए तैयार हैं. फार्म-टु-फोर्क  प्रोजेक्ट के लिए पंजाब बिल्कुल सही जगह स्थित है और अमृसर एयरपोर्ट यूरोपीय बाज़ारों के लिए भारत में सबसे नज़दीक है.

कर्ज़ की चुनौती से निपटने का रोडमैप

मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी चुनावी मोड में हैं और चुनावों से पहले नई नई स्कीमों और परियोजनाओं का ऐलान करने में व्यस्त हैं. वित्त मंत्री के नाते मनप्रीत ही एक तरह से ड्राइवर सीट में हैं, लेकिन वो 3 लाख रुपए के भारी कर्ज़ के साथ कैसे काम करेंगे जिसका सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) से अनुपात देश में सबसे अधिक है?

आगे के रोडमैप का ख़ाका खींचते हुए उन्होंने दिप्रिंट से कहा, ‘मैं कर्ज़ की स्थिति को लेकर चिंतित हूं, हालांकि ये एफआरबीएम (राजवित्तीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंध) अधिनियम के अंतर्गत निर्धारित सीमा के बिल्कुल अंदर है और व्यवसायों तथा राजस्व पर कोविड की मार के बावजूद पंजाब ने एक दिन भी ओवरड्राफ्ट नहीं किया. मैं कहूंगा कि हम एक अच्छी वित्तीय स्थिति में हैं और हमारे ख़ज़ाने सुरक्षित हैं’.

‘भविष्य के लिए हमें कई मोर्चों पर काम करना होगा. आगे के रोडमैप के लिए पांच चीज़ों की ज़रूरत है. पहली, निवेश में बढ़ोतरी. अपने कार्यकाल में हम पहले ही एक लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित कर चुके हैं. लेकिन पंजाब को और ज़रूरत है. दूसरी, पंजाब को संघीय करों में से उचित हिस्सा मिलना चाहिए. बीजेपी के जीएसटी के सुस्त कार्यान्वयन और उचित हिस्से की समझ न होने से बहुत से राज्य बरबाद हो जाएंगे. तीसरी, केंद्र सरकार की ओर से यहां बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने की ज़रूरत है. मैं पहले ही केंद्रीय वित्त मंत्री के साथ कई प्रस्ताव साझा कर चुका हूं. इन प्रस्तावों में एक फार्मास्यूटिकल और टेक्सटाइल पार्क बनाना और सड़क तथा रेल संपर्क में सुधार करना शामिल है, जिससे हमारी रक्षा को भी मज़बूती मिलेगी.

उन्होंने आगे कहा, ‘चौथी, हम अपने उत्पाद ख़ासकर कृषि उत्पाद, यूरोपीय और मध्य एशियाई बाज़ारों में भेजने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. पूर्वी एशिया और दक्षिणपूर्व एशिया को लक्ष्य बनाने में पूर्वी राज्यों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, जबकि पंजाब जैसे प्रांतों को अमृतसर को एक कार्गो हब बनाते हुए पश्चिमी बाज़ारों को लक्ष्य बनाने में प्राथमिकता दी जानी चाहिए और अंत में, स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज़्यादा ज़ोर देना. पंजाब अपने स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए मशहूर है, इसलिए उम्मीद है कि हम पंजाब को एक स्वास्थ्य की मंज़िल बना सकते हैं. शिक्षा के क्षेत्र में हम सक्रियता के साथ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा संस्थों से बातचीत कर रहे हैं. हमारे प्रांत में पहले से ही एक आईआईटी, एक एम्स, एक आईएसबी, और एक प्लक्ष यूनिवर्सिटी है, जो यूसी बर्कले और पर्ड्यू की विशेषज्ञता को पंजाब में ला रही है’.


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काव्य संवेदनशीलता

मनप्रीत ने दिप्रिंट से कहा कि पंजाब की कामयाबी की कुंजी उसके लोगों के अंदर है. ‘पंजाब के लोगों की ज़बर्दस्त ऊर्जा और क्षमता आग की एक ऐसी लौ है, जो छिपाई तो जा सकती है लेकिन कभी बुझाई नहीं जा सकती. मेरी सरकार का फर्ज़ है कि इस असाधारण लौ को बाक़ी दुनिया के सामने लाया जाए. मुझे मशहूर शायर अल्लामा मोहम्मद इक़बाल की जवाब-ए- शिकवा से कुछ लाइनें याद आती हैं, जो मैं मूल रूप में पेश कर रहा हूं:

कोई क़ाबिल हो तो हम शान कई देते हैं;

ढूंढने वालों को दुनिया भी नई देते हैं.

उनकी प्रभावशाली योग्यताओं को देखते हुए जिनमें लंदन यूनिवर्सिटी से क़ानून की डिग्री भी शामिल है अगर वो राजनीति में न आते तो कौन सा दूसरा रास्ता अपनाते? मनप्रीत ने कहा, ‘मैं भारतीय सेना में एक ऑफिसर के तौर पर कमीशन लेना पसंद करता जो पंजाब के अंदरूनी इलाक़ों में बहुत लोकप्रिय हुआ करता था…हमने बादल गांव में पहली बार सिट्रस की खेती शुरू की और हमने उस समय प्रमाणित ऑर्गेनिक खाद्य पदार्थ पैदा किए जब ये शब्द उतना प्रचलित भी नहीं हुआ था. ख़ाली समय में मुझे कविताएं पढ़ना बहुत पसंद है. अगर मैं राजनेता न बनता तो शायद कभी कभी पंजाब की नुमाइंदगी के लिए, वकालत का चोग़ा पहन सकता था’.

उन्होंने आगे कहा, ‘पंजाब के किसी अज्ञात कवि की बेहद ख़ूबसूरत पंक्तियां याद आती हैं. उन्हें मूल रूप में पेश करता हूं:

न रहा चांद सितारों का मैं मोहताज कभी

अपनी मेहनत के सदा मैंने उजाले देखे

तज़करा उसने लकीरों का वहीं छोड़ दिया

जब नजूमी ने मेरे हाथ के छाले देखे.

उन्हें उर्दू के कितने शेर ज़बानी याद हैं?

मनप्रीत ने दिप्रिंट को बताया, ‘बहुत ज़्यादा नहीं. बल्कि बहुत ज़्यादा कोई चीज नहीं है. बुल्ले शाह हमेशा से मेरी पसंद रहे हैं और उनकी ज़्यादातर कविताएं उर्दू नहीं बल्कि पंजाबी में हैं. कविताओं के ज़रिए डॉ मोहम्मद इक़बाल के राजनीतिक दर्शन ने मुझपर हमेशा से जादू बिखेरा है और यही काम फैज़ अहमद फैज़ ने किया है- एक अकेले पंजाबी जाट जिन्होंने उर्दू कविताएं लिखीं. आपको ये जानकर ताज्जुब हो सकता है कि बटवारे से पहले के पंजाब में असेम्बली के अंदर बहस के दौरान विधायक अकसर फारसी शेरों के हवाले दिया करते थे. आज बहुत सारे लोग, जिनमें मैं भी शामिल हूं फारसी नहीं समझ सकते’.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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