Friday, 12 August, 2022
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उद्धव ठाकरे की धर्मनिरपेक्ष-हिंदुत्व वाली राजनीतिक की नाकामी दूसरी पार्टियों के लिए सबक है

शिवसेना का संकट आज भारतीय राजनीति की पहेली जैसा लगता है, बीजेपी से मुकाबले के लिए हिंदुत्व की राह पकडि़ए या आप जैसे नरम हिंदुत्व या टीमएमसी की तरह जीरो हिंदुत्व बनाए रखिए.

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शिवसेना किसी और नहीं, हिंदुत्व की मीठी फांस में फंस गई है. महाराष्ट्र में ‘हिंदुत्व’ का कौन असली पैरोकार है, ठाकरे और एकनाथ शिंदे के बीच टकराव शिवसेना को बीजेपी के बॉक्सिंग रिंग में ले आई है. उसका नॉकआउट हो जाना तय है.

यह सवाल मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की रातों की नींद जरूर उड़ा रहा होगा कि सत्ता के लिए हिंदुत्व की राह छोडक़र एनसीपी और कांग्रेस से हाथ मिलाना अच्छी सोच थी या नहीं.

आज शिवसेना के संकट को ज्यादातर राजनैतिक पार्टियों की दुविधा की तरह देखा जा सकता है. नहीं, यह सिर्फ खानदानशाही का मामला नहीं है. सवाल यह है कि क्या उन्हें बीजेपी से मुकाबले के लिए हिंदुत्व की राह पकड़नी चाहिए, या फिर आप की तरह नरम हिंदुत्व या टीएमसी की तरह जीरो हिंदुत्व की बात करनी चाहिए. शिवसेना ने नरम हिंदुत्व की राह कुछ समय के लिए पकड़ी, कई बार तो उसे जीरो भी किया.


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धर्मनिरपेक्ष मुखौटा

एमपी-एमएलए दंपती नवनीत और रवि राणा ने उद्धव के निवास मातोश्री के सामने जब हुनमान चालीसा पढ़ा, तभी वे अपनी हिंदुत्व की साख को साबित करने के फंदे में फंस गए. एमएनएस प्रमुख राज ठाकरे की मुख्यमंत्री को चेतावनी कि मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाएं, वरना वे हनुमान चालीसा पढ़ेंगे, उसी से जुड़ी थी जो राणा दंपती कर रहे थे. उद्धव इस सिलसिले को समझने के बदले शह-मात की बाजी में लग गए.

शिवसेना ने सेक्युलर पार्टियों से हाथ मिलाने के लिए हिंदुत्व को किनारे होने दिया और नया मुखौटा पहन लिया. अब वह विकास और प्रगतिवाद में दिलचस्पी रखने वाली पार्टी बन गई और साथ में मराठी गौरव की झंडाबरदार बनी रही.
दक्षिणपंथ की हीरोइन कंगना रनौत से टक्कर लेने के लिए कुणाल कामरा का साथ देकर और बीजेपी के निशाने पर मुनव्वर फारूकी का मुंबई में शो न रद्द करके शिवसेना अपनी हिंदुत्व की विचारधारा से कुछ कदम और आगे बढ़ गई.

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इस सबके पीछे मंशा साफ-साफ अपने युवा और तेजतर्रार नेता आदित्य ठाकरे के हाथों पार्टी और अंतत: महाराष्ट्र की कमान सौंपने के लिए था. आदित्य की आरे फारेस्ट को बचाने वाले और मुंबई को मियामी में बदलने की कोशिश करने वाले नेता की छवि बड़े करीने से ऐसी बनाई गई, ताकि वे आधुनिक, नए दौर के महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की तरह उभरें.

उदार वोटरों ने सुविधानुसार शिवसेना के कट्टर दक्षिणपंथ को भुला दिया और इस नए चमकती शिवसेना को गले लगा लिया, लेकिन सैनिक ऐसा नहीं कर पाए, जिनके कंधों पर ठाकरे भरोसा करते हैं. फिर, उद्धव हिंदुत्व पर दोबारा दावा ठोकने की तैयारी में हैं.

नए राजनीतिक ड्रामा के बाद अपने भाषणों में उद्धव ठाकरे लगातार जोर देते रहे कि वे ‘गदाधारी हिंदुत्ववादी’ हैं. सीधे शब्दों में वे उस भीड़ को खींचने की कोशिश कर रहे हैं जिसने बीजेपी को वोट दिया था.


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हिंदुत्व की कदमचाल

शिवसेना को अपने आधुनिक मुखौटे को बेझिझक धारण करना चाहिए था. इसके बदले, उद्धव बेमानी-से राणा दंपती और राज ठाकरे की चाल में फंस गए और खुद के लिए गड्ढा खोद लिया. आज, वे अपनी पार्टी के भीतर से ही ‘विचारधारा’ पर विरोध झेल रहे हैं. हालांकि विचारधारा तो आज की राजनीति में मजाक बनकर रह गई है. जो पार्टी उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में गोमांस पर बंदिश लगाती है, गोवा और मेघालय में उसे ‘भोजन’ मान लेती है.

विडंबना यह है कि बागी विधायकों के अगुआ एकनाथ शिंदे हैं, जिनके गुरु आनंद दीघे के शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे से रिश्ते कटु थे. बाल ठाकरे पार्टी में दीघे की बढ़ती लोकप्रियता से चिंतित थे और उन्हें दरकिनार कर दिया. जाहिर है, उद्धव अपने पिता की तरह चतुर नहीं हैं. उन्होंने शिंदे को शहर विकास मंत्रालय दे दिया, जो राज्य में सबसे खास मंत्रालय माना जाता है और जो हमेशा मुख्यमंत्री के पास ही रहता आया है.

उद्धव ने अपने ‘हिंदुत्ववाद’ को साबित करने की उतावली में अपने बेटे को अयोध्या भेजा और बाबरी मस्जिद को ढहाने में शिवसेना की भूमिका की याद दिलाई. इससे एकनाथ शिंदे को वह करने का मौका मिल गया, जो उनके गुरु नहीं कर सके थे यानी उद्धव ठाकरे को अपनी ही पार्टी में दरकिनार कर दिया. वह भी हिंदुत्व के पैमाने पर, जिस पर उद्धव को बीजेपी के अलावा और कोई नहीं तौल रहा था.

अब शिवसेना के नेता सांप-छछूंदर की स्थिति में फंस गए हैं. शुरू में बागियों को वापस बुलाने के लिए भावुक अपील से कमजोर दिखे. अब कोई नहीं जानता कि उद्धव और शिवसेना की आगे की राह क्या है.

इससे देश भर की क्षेत्रीय पार्टियों को सबक लेना चाहिए. जैसे ही कोई पार्टी धर्म-और खासकर हिंदुत्व-को पहचान या उपलब्धि के तौर पर लेने लगती है, तो तय है कि वह बीजेपी से हार जाएगी. बीजेपी का काडर तैयार करने में आरएसएस की अहम भूमिका रही है. देश भर में 57,000 शाखाओं और लाखों स्वयंसेवकों की वजह से किसी पार्टी या आंदोलन के लिए आरएसएस-बीजेपी की विचारधारा में सेंध लगाना असंभव-सा है, जिसके मुल में हिंदुत्व है.

हिंदुत्व का विरोध करने का एक ही तरीका है कि उससे होड़ न की जाए. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे बखूबी समझा और सत्ता में बने रहने में कामयाब हुईं. बीजेपी जब बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठियों की बात करती है तो तृणमूल कांग्रेस अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर जोर देती रहती है और इसका फायदा भी खूब मिला.

(लेखक राजनैतिक टिप्पणीकार हैं. उनका ट्विटर हैंडल @zainabsikander है. विचार निजी हैं.)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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