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Saturday, 11 April, 2026
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तमिलनाडु चुनाव 2026: जाति, फ्रीबीज़ और द्रविड़ राजनीति के बीच DMK-AIADMK मुकाबले में TVK की एंट्री

2026 का चुनाव अब शासन से जुड़े मुद्दों, सामाजिक बंटवारे और विचारधारात्मक टकराव के मिश्रण से तय हो रहा है. इस माहौल में टीवीके के रूप में एक नए खिलाड़ी का उभरना चर्चा और बढ़ा रहा है.

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चेन्नई: तारीख तय हो चुकी है, राजनीतिक मुकाबले की रेखाएं खींची जा चुकी हैं और तमिलनाडु में चुनावी लड़ाई के लिए सभी राजनीतिक पार्टियां पूरी तरह तैयार हैं, जहां राजनीतिक माहौल में आज भी द्रविड़ विचारधारा का दबदबा है.

मतदान 23 अप्रैल को होगा, जबकि नतीजे 4 मई को घोषित किए जाएंगे. नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख 6 अप्रैल है, इसके बाद 7 अप्रैल को नामांकन की जांच होगी. उम्मीदवारों के नाम वापस लेने की आखिरी तारीख 9 अप्रैल है.

हालांकि, बड़ी राजनीतिक पार्टियां अभी भी द्रविड़ विचारधारा से जुड़ी हुई हैं, लेकिन असलियत, केंद्र के साथ गठबंधन और लोकलुभावन राजनीति को लेकर उनके बीच पहले से ज्यादा मतभेद हैं. 2021 से सत्ता में मौजूद सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) और उसके सहयोगी कल्याण योजनाओं, धर्मनिरपेक्षता और तेज़ आर्थिक विकास के दावों के जरिए एंटी-इंकंबेंसी का जवाब दे रहे हैं. हालांकि, सत्तारूढ़ पार्टी पर भाई-भतीजावाद और वंशवादी राजनीति के आरोप भी लगते रहे हैं.

दूसरी ओर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआईएडीएमके) ने भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) और छोटे सहयोगियों जैसे पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) के साथ गठबंधन किया है. इसलिए द्रविड़ प्रतिद्वंद्वी डीएमके उस पर हिंदुत्व ताकतों के साथ हाथ मिलाने का आरोप लगा रही है.

अब तीसरा विकल्प भी सामने आया है, अभिनेता विजय की तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) के रूप में, जो सभी 234 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़कर खुद को एक मजबूत स्वतंत्र ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है.

2026 का चुनाव शासन से जुड़े मुद्दों, सामाजिक बंटवारे और विचारधारात्मक टकराव के मिश्रण से तय हो रहा है. बढ़ती अपराध दर, कुछ इलाकों में ग्रामीण संकट, महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तिकरण जैसे मुद्दों के साथ-साथ हिंदुत्व के खिलाफ व्यापक वैचारिक लड़ाई पर भी बड़ी राजनीतिक पार्टियां चर्चा कर रही हैं.

राजनीतिक विश्लेषक रामू मणिवन्नन ने कहा कि बीजेपी और विपक्षी पार्टियां कानून-व्यवस्था और महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे को सरकार के कामकाज के आकलन के रूप में उठा रही हैं.

फ्रीबीज़ संस्कृति की स्थिरता भी एक बड़ा मुद्दा बनी हुई है. डीएमके की लोकप्रिय योजनाएं, जैसे महिलाओं को आर्थिक सहायता, स्कूलों में मुफ्त नाश्ता और मुफ्त बस पास, ने उसे काफी समर्थन दिलाया है, लेकिन प्रतिद्वंद्वी कहते हैं कि इससे सरकारी वित्त पर निर्भरता बढ़ती है, उत्पादक खर्च कम होता है और इन योजनाओं को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया जाता. विपक्षी पार्टियां “जिम्मेदार कल्याण” और विकास-केंद्रित शासन का वादा कर रही हैं.

मणिवन्नन ने दिप्रिंट से कहा, “हमने नान मुदलवन, मुफ्त बस यात्रा और मुफ्त नाश्ता जैसी योजनाओं को अच्छा समर्थन मिलते देखा है. यह पूरी तरह नहीं कहा जा सकता कि ये कार्यक्रम काम नहीं करते. इन योजनाओं की आलोचना हो सकती है, लेकिन लोगों को फायदा भी होता है क्योंकि यह एक कल्याण पहल है.”

उन्होंने कहा, “एक सीमा तय करनी होगी ताकि वही लोग इन लाभों के पात्र हों जिन्हें वास्तव में इसकी ज़रूरत है. विपक्षी पार्टियां भी सत्ता में आने पर इन सभी योजनाओं को पूरी तरह खत्म नहीं करतीं; यह ज्यादा राजनीतिक खेल है.”

एआईएडीएमके और बीजेपी दोनों बुनियादी ढांचे और आर्थिक विकास पर जोर दे रही हैं. डीएमके ‘द्रविड़ मॉडल’ को आक्रामक तरीके से सामने रख रही है, जिसके बारे में उसका दावा है कि इससे बड़े औद्योगिक निवेश आए, आईटी सेक्टर का विस्तार हुआ और शहरों व गांवों में सैकड़ों परियोजनाओं का उद्घाटन हुआ. पार्टी कहती है कि कल्याण और रोज़गार साथ-साथ चल सकते हैं.

बीजेपी के साथ गठबंधन से मजबूत हुई एआईएडीएमके वादा कर रही है कि वह ग्रामीण-केंद्रित विकास के अपने पुराने मॉडल को बेहतर तरीके से लागू करेगी. उसका कहना है कि केंद्र के साथ गठबंधन से ही असली विकास संभव है.

मणिवन्नन ने कहा, “हमने देखा है कि कई योजनाओं के लिए फंड गुजरात जा रहे हैं और निवेश भी वहीं हो रहा है. जब हम दूसरे राज्यों से तुलना करते हैं, खासकर दक्षिण में, तो यह खालीपन साफ दिखाई देता है.”

उन्होंने कहा, “डीएमके यही मुद्दा उठा रही है और एआईएडीएमके को अपने हितों की रक्षा करनी होगी और राज्य के अधिकार बनाए रखने होंगे. उसके पास ऐसा नेता नहीं है जो मजबूती से खड़ा हो सके और वह बीजेपी के विचार के सामने झुक गई है, जिससे उसकी वैचारिक स्थिति कमजोर हुई है.”

सच्चा द्रविड़ कौन

जब छोटे खिलाड़ी जैसे देशिया मुरपोक्कु द्रविड़ कषगम (डीएमडीके) और विदुथलाई चिरुथाइगल काची (वीसीके) वोटों के बंटवारे का खतरा पैदा कर रहे हैं, तो “असली द्रविड़ कौन है” की बहस चुनाव के नतीजे तय कर सकती है.

हर बड़ा खिलाड़ी खुद को द्रविड़ विचारक पेरियार की जाति-विरोधी, तर्कवादी, धर्मनिरपेक्ष और हिंदी-विरोधी विरासत का असली वारिस बताता है. तमिल और द्रविड़ गौरव मजबूत हिंदुत्व-विरोधी रुख दिखाते हैं और मुकाबले को अक्सर ‘द्रविड़ बनाम आर्य’ या ‘राज्य की स्वायत्तता बनाम केंद्र का हस्तक्षेप’ के रूप में पेश किया जाता है.

1967 से डीएमके और एआईएडीएमके बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं और दोनों ने फ्रीबी योजनाओं के साथ द्रविड़ सामाजिक न्याय का मॉडल पेश किया है. डीएमके को अल्पसंख्यकों और शहरी इलाकों में मजबूत समर्थन मिलता है. पार्टी सामाजिक न्याय, संघीय ढांचे और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित द्रविड़ विचारधारा पर चलती है और शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में कल्याण योजनाओं को बढ़ावा देती है.

डीएमके अध्यक्ष एम.के. स्टालिन अभी भी सबसे बड़े खिलाड़ी बने हुए हैं. उनकी राजनीतिक यात्रा चेन्नई के मेयर, विधायक, पार्टी अध्यक्ष से लेकर अब मुख्यमंत्री तक रही है. हालांकि, उनके बेटे उदयनिधि उपमुख्यमंत्री और संभावित उत्तराधिकारी हैं, फिर भी समर्थकों के बीच स्टालिन की लोकप्रियता काफी मजबूत है.

एआईएडीएमके खुद को अन्नादुरई और मरुथुर गोपालन रामचंद्रन (एमजीआर) की असली जनवादी विरासत का वारिस बताती है, जिसे वह “ज्यादा शुद्ध द्रविड़वाद” कहती है और जिसे परिवारवादी राजनीति से मुक्त बताती है. पार्टी द्रविड़ सामाजिक न्याय को सब्सिडी, गोल्ड स्कीम और ग्रामीण फोकस के जरिए जनता से जोड़ती है, जबकि केंद्र के खिलाफ राजनीतिक रुख भी बनाए रखती है.

लेकिन 2016 में जयललिता की मौत के बाद एआईएडीएमके एडप्पाडी के पलनीस्वामी और ओट्टाकाराथेवर पन्नीरसेल्वम (EPS-OPS) के बीच अंदरूनी संघर्ष से कमजोर हो गई है. उसके वरिष्ठ और निष्कासित नेता तथा तीन बार के मुख्यमंत्री ओपीएस के डीएमके में शामिल होने से पार्टी को थेवर वोटों और कार्यकर्ताओं की वफादारी में बंटवारे की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है.

जहां तक टीवीके की बात है, विजय पेरियार, आंबेडकर और कामराज से प्रेरणा लेते हुए समावेशी सामाजिक न्याय और तर्कवाद की बात करते हैं. यह नई पार्टी धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय, समावेशिता, राज्य की स्वायत्तता, महिलाओं के सशक्तिकरण, तर्कवाद और भ्रष्टाचार-विरोधी कदमों की बात करती है और पिछड़ी राजनीति को खारिज करती है.

विजय टीवीके को पारंपरिक दो-पार्टी मुकाबले से अलग रखने की कोशिश कर रहे हैं. वह बीजेपी को वैचारिक प्रतिद्वंद्वी बताते हैं, क्योंकि उनके मुताबिक वह विभाजनकारी और सांप्रदायिक ताकतों का प्रतिनिधित्व करती है. वहीं डीएमके को वह राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बताते हैं और उस पर भ्रष्टाचार, वंशवाद और कल्याण योजनाओं से किए गए वादों को पूरा न करने का आरोप लगाते हैं.

अन्य पार्टियों में वैको की मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके) खुद को कट्टर तमिल राष्ट्रवादी के रूप में पेश करती है. इसी तरह नाम तमिलर काची (एनटीके) सिर्फ तमिल पहचान को बढ़ावा देती है.

यह लड़ाई सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं है; यही तय करती है कि गठबंधन कैसे बनेंगे, चुनावी नारे क्या होंगे और पार्टियां धर्मनिरपेक्षता व संघीय ढांचे के मुद्दों पर एक-दूसरे पर कैसे हमला करेंगी.

BJP: तीसरा फैक्टर?

कभी हाशिये पर रही बीजेपी ने एआईएडीएमके के साथ गठबंधन, डीएमके के खिलाफ एकजुटता और शहरी मध्यम वर्ग व कारोबारी समुदायों के बीच केंद्र की योजनाओं के जरिए धीरे-धीरे शहरों में अपनी मौजूदगी बनाई है.

पार्टी ने हिंदुत्व रणनीति को बुनियादी ढांचा विकास, आर्थिक सुधार और केंद्र की कल्याण योजनाओं के साथ जोड़ा है. इसके लिए पार्टी राष्ट्रीय राजमार्ग और हवाई अड्डों के विस्तार जैसी अपनी केंद्रीय योजनाओं को सामने रखती है और कहती है कि असली गति और बड़े पैमाने पर विकास केवल मजबूत केंद्र-राज्य साझेदारी से ही संभव है.

वैचारिक रूप से बीजेपी आर्थिक उदारीकरण, बड़े पैमाने के बुनियादी ढांचे और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को आगे रखती है और खुद को ऐसी पार्टी के रूप में पेश करती है जो तमिल इतिहास और गौरव का सम्मान करती है.

ऐसा करते हुए वह गहरी जड़ें जमा चुकी द्रविड़ धर्मनिरपेक्षता और हिंदी-विरोधी विरासत से सीधे टकराव से बचती है, जिससे ग्रामीण इलाकों में उसकी पकड़ सीमित रहती है. पार्टी के पास अभी भी कोई मजबूत स्वतंत्र समर्थन समूह नहीं है.

फिर भी बीजेपी सिर्फ कुछ सीटों पर नहीं बल्कि कोयंबटूर, चेन्नई, तिरुप्पुर, इरोड और मदुरै के कुछ हिस्सों में शहर और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में मजबूत पकड़ बनाने की कोशिश कर रही है. पार्टी तेज राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं, औद्योगिक कॉरिडोर, बंदरगाह उन्नयन, हवाई अड्डों के विस्तार और बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्कों का वादा कर रही है, ताकि डीएमके पर लगाए जा रहे देरी के आरोपों के मुकाबले खुद को बेहतर दिखा सके.

हालांकि, वह डीएमके के खिलाफ मुख्य विपक्षी आवाज के रूप में एआईएडीएमके की जगह लेना चाहती है, लेकिन बीजेपी को अभी भी द्रविड़ राज्य में “बाहरी पार्टी” का टैग झेलना पड़ रहा है. पार्टी उम्मीद कर रही है कि गठबंधन की गणित और बुनियादी ढांचे के वादे आखिरकार द्रविड़ गढ़ को तोड़ पाएंगे.

पूर्व बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई, जो युवाओं से जुड़ाव के लिए जाने जाते हैं, अपने तेज़ डीएमके-विरोधी बयानों के लिए प्रसिद्ध हैं. उनके उत्तराधिकारी और पूर्व एआईएडीएमके मंत्री नैनार नागेंद्रन, जो तिरुनेलवेली से आते हैं, 2017 में बीजेपी में शामिल हुए थे. अप्रैल 2025 में उन्हें यह जिम्मेदारी दी गई, जब एआईएडीएमके के साथ गठबंधन की घोषणा हुई थी, ताकि क्षेत्रीय संबंध मजबूत किए जा सकें और रणनीति को फिर से तय किया जा सके.

‘कॉमन दुश्मन’

डीएमके और उसके सहयोगी बार-बार बीजेपी-नेतृत्व वाले केंद्र पर हिंदी थोपने, हिंदुत्व विचारधारा फैलाने और केंद्रीय फंड रोकने का आरोप लगाते हैं. इसके जवाब में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (एनडीए) के सहयोगी स्टालिन पर राज्य के कल्याण और बुनियादी ढांचा फंड का इस्तेमाल वंशवादी फायदे के लिए करने का आरोप लगाते हैं.

डीएमके अपने ‘द्रविड़ मॉडल’ का जोरदार बचाव करती है और कहती है कि राज्य की कल्याण योजनाएं सीधे गरीबों तक पहुंचती हैं, बिना केंद्र के हस्तक्षेप के.

सत्तारूढ़ पार्टी कहती है कि उसने हजारों करोड़ रुपये की सैकड़ों परियोजनाओं के जरिए शहर और गांव दोनों जगह बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाया है और इसे इस बात के सबूत के रूप में पेश करती है कि केवल द्रविड़ सरकार ही फ्रीबीज़ और असली विकास के बीच संतुलन बना सकती है.

पार्टी कांग्रेस के साथ भी गठबंधन में है और बीजेपी-विरोधी भावनाओं को मजबूत करती है. के. सेल्वापेरुंथगई के नेतृत्व में कांग्रेस कन्याकुमारी, रामनाथपुरम और अन्य दक्षिणी जिलों में वोट गणित के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई है.

दूसरी ओर डीएमके-विरोधी गठबंधन देरी से या अधूरी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, बढ़ती लागत, खराब सड़कों और रुके हुए औद्योगिक पार्कों को भ्रष्टाचार और अक्षमता का सबूत बताता है.

त्रिची की एक रैली में ईपीएस ने कहा कि डीएमके के सिर्फ एक चौथाई वादे ही पूरे हुए हैं. एआईएडीएमके नेता ने कहा, “तमिलनाडु की जनता सत्तारूढ़ डीएमके के झूठे और बड़े-बड़े वादों से तंग आ चुकी है. लोग अब स्टालिन पर भरोसा नहीं करेंगे क्योंकि उनके पिछले चुनावी वादे पूरे नहीं हुए.”

गठबंधन के मामले में “कॉमन दुश्मन” की रणनीति ही तय करती है कि पार्टियां किसके साथ हाथ मिलाएंगी.

राजनीतिक विश्लेषक ए. रामासामी ने दिप्रिंट से कहा, “युवा और शहरी मतदाता, डिजिटल प्रचार और महिलाओं पर केंद्रित पहुंच अब नए ट्रेंड बन गए हैं. डीएमके अब युवाओं को भी अपनी ओर आकर्षित करने और कल्याण योजनाओं के जरिए महिला वोट बैंक को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.”

उन्होंने कहा, “महिला मतदाता अब सभी राजनीतिक पार्टियों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं और उसी हिसाब से रणनीतियां बनाई जा रही हैं. डीएमके और एआईएडीएमके के पास पहुंच का मजबूत तंत्र है, लेकिन अन्य पार्टियों को भी इसी दिशा में काम करना होगा.”

विजय और टीवीके की रणनीति

सभी 234 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ते हुए विजय अपने बड़े युवा फैनबेस और एंटी-एस्टैब्लिशमेंट छवि पर भरोसा कर रहे हैं. करूर भगदड़ और चल रही सीबीआई जांच के बावजूद टीवीके को उसके बड़े फैनबेस से युवाओं का समर्थन मिल रहा है.

पार्टी खुद को डीएमके-एआईएडीएमके के पारंपरिक मुकाबले से अलग बताती है और दोनों को भ्रष्ट और बीजेपी से समझौता करने वाला कहती है, हालांकि सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के मुद्दे पर वह द्रविड़ पार्टियों के साथ ही खड़ी दिखाई देती है.

लेकिन विजय के निजी मामलों पर ज्यादा ध्यान जाने से पार्टी की जमीनी मौजूदगी प्रभावित हो रही है. राजनीतिक विश्लेषक रविंद्रन थुरैसामी ने दिप्रिंट से कहा, “तमिल थ्रिलर ‘जना नायकन’ की रिलीज में देरी, करूर मामले में सीबीआई जांच और उनके निजी मामलों से जुड़े अन्य मुद्दे विजय के चुनावी फोकस को प्रभावित करेंगे.”

उन्होंने कहा, “अगर 2026 में वह अच्छा वोट बैंक साबित करते हैं तो 2029 में इसका इस्तेमाल राहुल गांधी के लिए करेंगे. टीवीके पर हर तरफ से दबाव है और उन्हें ससिकला जैसा व्यवहार झेलना पड़ सकता है. वोट बैंक फैनबेस से अलग तरीके से काम करता है.”

जाति आधारित लामबंदी

तमिलनाडु की राजनीति में वन्नियार, थेवर/मुक्कुलथोर, कोंगु, दलित और मुस्लिम जैसे पारंपरिक जातीय वोटर अभी भी मजबूत आधार बने हुए हैं, भले ही युवाओं और डिजिटल ट्रेंड का प्रभाव बढ़ रहा हो. शहरों में युवाओं, महिलाओं और डिजिटल प्रचार के कारण कठोर जातीय गणित थोड़ा ढीला पड़ा है, लेकिन ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में अब भी वोट काफी हद तक समुदाय के आधार पर पड़ते हैं.

उत्तरी जिलों में केंद्रित वन्नियार, जो सबसे बड़ा मोस्ट बैकवर्ड क्लास (एमबीसी) समूह है, पीएमके के समर्थन का मुख्य आधार हैं. मदुरै, थेनी, रामनाथपुरम, तिरुनेलवेली और तंजावुर जैसे दक्षिणी जिलों में थेवर या मुक्कुलथोर समुदाय ऐतिहासिक रूप से एआईडीएमके के समर्थक रहे हैं, लेकिन ओपीएस के बाहर जाने के बाद अब उनमें बंटवारा हो गया है. ससिकला के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया पुराची थलाइवर मक्कल मुनेत्र कड़गम (AIPTMMK) भी उन्हें अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रही है.

कोयंबटूर, इरोड, तिरुप्पुर और नमक्कल के पश्चिमी क्षेत्र में कोंगु वेल्लाला गौंडर और वेल्लालर एआईएडीएमके और केएमडीके का मजबूत आधार बने हुए हैं. दलित, खासकर अरुंथथियार और परैयार समुदाय, आरक्षित सीटों और जाति-विरोधी भूमि सुधार के मुद्दे पर डीएमके गठबंधन के भीतर वीसीके के जरिए लामबंद किए जाते हैं. तटीय इलाकों और रामनाथपुरम में मुस्लिम मतदाता इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) और डीएमके के धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के पीछे एकजुट रहते हैं. नादर और अन्य एमबीसी समुदाय दक्षिण और मध्य क्षेत्रों में क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाते हैं.

राजनीतिक विश्लेषक सुनीलकुमार वी.एम. कहते हैं, “समुदाय आधारित राजनीति अब भी मजबूत रणनीति बनी हुई है, क्योंकि पारंपरिक वोट बैंक, खासकर तमिलनाडु के दक्षिणी हिस्सों में, अभी भी कायम हैं. वन्नियार, थेवर/मुक्कुलथोर, कोंगु और अन्य समुदाय अपने नेताओं के प्रति वफादार रहते हैं, खासकर उन नेताओं के प्रति जो उनके ही समुदाय से आते हैं.”

उन्होंने कहा कि यही वफादारी एआईएडीएमके को दक्षिणी जिलों में अभी भी कुछ मजबूती देती है, हालांकि, पार्टी टीटीवी दिनाकरन (एएमएमके) के साथ गठबंधन के जरिए अपनी ताकत फिर से बढ़ाने की कोशिश कर रही है.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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