नई दिल्ली: लोकसभा ने मंगलवार को स्पीकर ओम बिरला को हटाने की मांग वाले प्रस्ताव पर चर्चा शुरू की. यह एक दुर्लभ कदम है, जो इससे पहले सदन में केवल दो बार ही उठाया गया है.
बहस की शुरुआत कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई ने की. उन्होंने कहा कि विपक्ष को यह असाधारण कदम किसी व्यक्तिगत दुश्मनी की वजह से नहीं, बल्कि संसद की मर्यादा और गरिमा को बनाए रखने के लिए उठाना पड़ा है.
जैसे ही प्रस्ताव पेश करने की सूचना पर चर्चा शुरू हुई, माहौल काफी विवादित हो गया. यह प्रस्ताव भाजपा सांसद जगदंबिका पाल ने लिया, जो इस बहस की अध्यक्षता कर रहे हैं. इस दौरान ओम बिरला ने स्वेच्छा से खुद को कार्यवाही से अलग रखा है, जब तक कि सदन इस मामले पर कोई फैसला नहीं कर लेता.
अपने नोटिस में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने ओम बिरला पर चार आरोप लगाए हैं. इनमें विपक्ष के नेता को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान अपना भाषण पूरा नहीं करने देना, आठ कांग्रेस सांसदों को निलंबित करना, एक भाजपा सांसद को जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने की अनुमति देना, और कांग्रेस सांसदों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमले की योजना बनाने का आरोप लगाना शामिल है.
विपक्षी सांसदों ने इस मौके पर उपसभापति के पद की लंबे समय से खाली स्थिति पर भी सवाल उठाए. परंपरा के अनुसार यह पद आमतौर पर विपक्ष को दिया जाता है.
उपसभापति का पद जून 2019 से खाली है, जब इस पद पर मौजूद एम. थंबीदुरई का कार्यकाल 16वीं लोकसभा के भंग होने के साथ खत्म हो गया था. इसके बाद पूरी 17वीं लोकसभा के दौरान भी यह पद खाली रहा—जो स्वतंत्र भारत में पहली बार हुआ. 18वीं लोकसभा में भी अब तक इस पद पर किसी की नियुक्ति नहीं हुई है.
असदुद्दीन ओवैसी ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 95 का हवाला देते हुए कहा कि जगदंबिका पाल को कार्यवाही की अध्यक्षता करने का अधिकार नहीं है.
ओवैसी ने कहा कि यह तय करने के लिए सदन की राय नहीं ली गई कि संविधान के अनुच्छेद 95(2) के तहत पाल इस बहस की अध्यक्षता कर सकते हैं या नहीं.
संविधान का अनुच्छेद 95(1) कहता है कि जब स्पीकर का पद खाली हो, तो उस पद की जिम्मेदारियां उपसभापति निभाएंगे. अगर उपसभापति का पद भी खाली हो, तो राष्ट्रपति लोकसभा के किसी सदस्य को यह जिम्मेदारी दे सकते हैं.
वहीं अनुच्छेद 95(2) कहता है कि जब स्पीकर किसी बैठक में मौजूद न हों, तो उपसभापति उनकी जगह अध्यक्षता करेंगे. अगर उपसभापति भी मौजूद न हों, तो सदन के नियमों के अनुसार किसी अन्य सदस्य को अध्यक्षता के लिए चुना जाएगा.
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे और रविशंकर प्रसाद ने कहा कि पाल को अनुच्छेद 95(2) से अधिकार मिलता है, लेकिन विपक्ष का तर्क था कि यह अनुच्छेद इस स्थिति पर लागू नहीं होता, क्योंकि इसमें स्पीकर और उपसभापति के “अनुपस्थित” होने की बात है, जबकि यहां मामला स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव और उपसभापति के पद के खाली होने का है.
कांग्रेस सांसद के. सी. वेणुगोपाल ने सरकार पर आरोप लगाया कि उसने उपसभापति का पद वर्षों तक खाली रखकर “संवैधानिक शून्य” पैदा कर दिया है.
आखिर में जगदंबिका पाल ने विपक्ष की आपत्तियों को खारिज करते हुए प्रस्ताव को मतदान के लिए रख दिया. उन्होंने कम से कम 50 सांसदों से समर्थन में खड़े होने को कहा—और जरूरी संख्या से ज्यादा सांसदों ने समर्थन दिया.
अपनी शुरुआती टिप्पणी में गौरव गोगोई ने उन मुद्दों का भी जिक्र किया जिन्हें विपक्ष के नेता राहुल गांधी फरवरी में बजट सत्र के पहले हिस्से के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा में उठाना चाहते थे.
इनमें पूर्व सेना प्रमुख मनोज मुकुंद नरवणे के अप्रकाशित संस्मरण के अंश, अमेरिका में एक भारतीय कारोबारी समूह के खिलाफ लंबित जांच और एपस्टीन फाइल्स से जुड़े मुद्दे शामिल थे.
गोगोई ने कहा, “फरवरी में जब विपक्ष के नेता राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान बोलने की कोशिश कर रहे थे, तो उन्हें 20 बार रोका गया. स्पीकर, गृह मंत्री और रक्षा मंत्री ने मिलकर ऐसा किया, क्योंकि वे यह कहना चाहते थे कि जब देश के प्रमुख को एक अहम फैसला लेना था, तब उन्होंने कहा कि जो ठीक लगे वही करें. लेकिन भारत सेना के नेतृत्व से नहीं चलता. हमारी सेना राजनीतिक नेतृत्व के निर्देशों का इंतजार करती है. उनके बयान का मतलब यह था कि या तो आत्मसमर्पण करो, या युद्ध शुरू करो, या बातचीत करो.”
इस पर जगदंबिका पाल ने आपत्ति जताई और कहा कि इस मामले पर स्पीकर ओम बिरला पहले ही फैसला दे चुके हैं.
गोगोई ने कहा कि विपक्ष ओम बिरला के खिलाफ यह प्रस्ताव लाकर खुश नहीं है, “जिनके साथ सभी के व्यक्तिगत अच्छे संबंध हैं.”
उन्होंने कहा, “इसी वजह से हमें दुख है कि हमें उनके खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना पड़ा. संसद की मर्यादा और गरिमा की रक्षा करना हमारा धर्म और कर्तव्य है. हम बिरला पर व्यक्तिगत हमला नहीं करना चाहते.”
जब यह चर्चा शुरू हुई तब राहुल गांधी सदन में मौजूद नहीं थे.
लोकसभा स्पीकर को हटाने का प्रस्ताव पहले भी दो बार लाया जा चुका है—1954 में जी. वी. मावलंकर के खिलाफ और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ.
1966 में सरदार हुकम सिंह के खिलाफ भी ऐसा प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई थी, लेकिन विपक्ष सदन में जरूरी समर्थन जुटाने में सफल नहीं हो पाया था.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
