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Wednesday, 29 May, 2024
होमराजनीतिठाकरे के वफादार सैनिकों ने कहा, 'शिवसेना की जड़ें गहरी हैं, फंड की कमी बाधा नहीं बनेगी.'

ठाकरे के वफादार सैनिकों ने कहा, ‘शिवसेना की जड़ें गहरी हैं, फंड की कमी बाधा नहीं बनेगी.’

शिंदे खेमे को सेना का नाम और चिन्ह आवंटित करने के चुनाव आयोग का फैसला भी शाखा प्रमुखों को पाला बदलने के लिए मजबूर नहीं कर पाया है. लेकिन आरोप है कि प्रतिद्वंद्वी शिंदे गुट की तरफ से उनके सैनिकों को पदों की पेशकश की जा रही है.

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मुंबई: 1966 में शिवसेना में शामिल होने वाले 79 वर्षीय वामन चव्हाण काफी गुस्से में हैं. चुनाव आयोग (ईसी) के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट को पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह आवंटित करने के हालिया फैसले ने चव्हाण जैसे कई सैनिकों को नाराज कर दिया है. हालांकि उसके बाद से दोनों पक्षों की शाखाओं की गतिविधियां तेज हो गई हैं और दोनों अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिशों में लगे हैं.

चव्हाण ने भोईवाड़ा में शाखा संख्या 72 से शुरुआत की थी. उनके जैसे पुराने कार्यकर्ता के लिए उद्धव ठाकरे का गुट ही असली सेना है. उन्होंने कहा, ‘शिवसेना की जड़ें गहरी हैं. उन्हें सतह से हिलाया नहीं जा सकता है. भले ही उन्हें नाम और चिन्ह मिल गया हो, लेकिन उद्धव ठाकरे को ही असली सेना के रूप में पहचाना जाएगा क्योंकि मराठी आबादी का इस परिवार के साथ भावनात्मक जुड़ाव है.’

उन्होंने कहा, ‘आज, असली सेना होने का दावा करने वालों में से आधे तब पैदा भी नहीं हुए थे जब पार्टी का जन्म हुआ था…(लेकिन) हम शिवसेना (यूबीटी) को बढ़ने में मदद करना जारी रखेंगे.’

शाखाएं या स्थानीय कार्यालय मुंबई के हर वार्ड में पाए जाते हैं और इनकी किले जैसी संरचनाएं हैं. यह पार्टी के दिन-प्रतिदिन के कामकाज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं. वे पार्टी की रीढ़ हैं.

हालांकि ज्यादातर शाखा कार्यकर्ता शिंदे गुट के साथ नहीं गए हैं, लेकिन उनके सामने पैसों की कमी एक बड़ी समस्या के रूप में सामने आ रही है. इसके चलते उन्हें अपनी गतिविधियों को जारी रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

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सायन की एक शाखा के एक युवा कार्यकर्ता ने अपना नाम न बताने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया, ‘युवा लोग अभी भी उद्धव ठाकरे के साथ हैं. लेकिन हमारे पास पर्याप्त पैसा नहीं है. उधर वे (शिंदे गुट) तरह-तरह के पदों की पेशकश कर हमारे कार्यकर्ताओं को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं.

प्रभादेवी की शाखा संख्या 194 से शिंदे की सेना के एक प्रमुख संतोष तेलवाने ने उनके इन आरोपों का खंडन किया. उन्होंने विरोध जताते हुए कहा कि उनके पास पेशकश करने के लिए कोई पद नहीं है. उन्होंने बताया, ‘कई लोग पिछले दरवाजे से हमारे पास आ रहे हैं, लेकिन हमारे पास कोई खाली पद नहीं है. कार्यकर्ता हमसे जुड़ रहे हैं लेकिन हम पदाधिकारियों को नहीं ले सकते. इसलिए हमारे पास जो है उसके साथ हम आगे बढ़ रहे हैं.’

सेना (यूबीटी) के वरिष्ठ नेताओं ने स्वीकार किया कि फंड एक समस्या जरूर है, लेकिन वे आने वाले बीएमसी चुनावों में एक बड़ी जीत के प्रति आश्वस्त हैं. उधर शिंदे समूह ने कहा कि वे हमेशा से ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए अपने यहां जगह बना सकते हैं.


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नाम में क्या रखा है

दादर के पास हिंदमाता में शाखा संख्या 200 में उल्हास पंचाल बैठकर लोगों की समस्याएं सुन रहे हैं. यहां उन्होंने अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं का समाधान किया और उनके निराकरण का आश्वासन दिया. उनका कहना है कि वह 1975 से शिवसैनिक हैं.

उन्होंने कहा, ‘हमारे कट्टर सैनिक और ठाकरे, हमारे लिए हमारा चिन्ह, प्रतीक, नाम, सब कुछ है. ठाकरे का नाम जहां भी है वो ही हमारी शिवसेना है. उन्हें बाकी सब कुछ लेने दीजिए, लेकिन हम ठाकरे के साथ हैं.’

दिप्रिंट ने जिन पुराने लोगों से बात की, वह जमीनी स्तर के सैनिक हैं जिन्होंने पूरे शहर में पार्टी के संदेश को फैलाने के लिए कड़ी मेहनत की है. चव्हाण ने कहा, ‘नाम और पार्टी के चिन्ह के छिन जाने की चिंता करने के बजाय, यह समय है कि हम अपने काम के जरिए बोलें.’

राजेंद्र चांदोरकर प्रतीक्षा नगर में शाखा 173 के साथ जुड़े हैं. वह बृहन्मुंबई इलेक्ट्रिक सप्लाई एंड ट्रांसपोर्ट अंडरटेकिंग (बेस्ट) में कई सालों से वेतन, लाभ और पेंशन जैसे कई मुद्दों पर सैनिकों की मदद करते आए हैं.

उन्होंने कहा, ‘महाराष्ट्र के लोग यह सब देख रहे हैं. शिवसैनिकों की नजर इस पर है. वास्तव में, जितना अधिक वे हमें दबाकर रखने की कोशिश कर रहे हैं, हम उतने ही मजबूत होते जा रहे हैं. सच्चे सैनिक सिर्फ ठाकरे के साथ होंगे.’

ठाकरे के समर्थन वाले सैनिकों को भरोसा है कि शाखा की ताकत के साथ, वे इस साल होने वाले बृहन्मुंबई नगर निगम चुनाव जीतने में सफल होंगे.

रामदास पारकर दावा करते हैं कि उनका परिवार पार्टी की स्थापना से पहले से ठाकरे को जानता है. उन्होंने कहा, ‘हम निश्चित रूप से चुनाव जीतेंगे. उद्धव जी के साथ जो हुआ वो सही नहीं है. आगे कुछ नहीं होगा. और वैसे भी आदित्य ठाकरे ने भी एक युवा सेना बनाई है. कोई भी हमें उनसे दूर नहीं कर सकता है.’

पैसों की कमी

अगर भावनाओं को एक तरफ रख दें तो फंड की कमी शाखा प्रमुखों को चिंतित कर रही है. दिप्रिंट ने जिन शाखा प्रमुखों से बात की उनमें से अधिकांश ने कहा कि हालांकि वे दूसरे खेमे में शामिल नहीं होंगे, लेकिन उनके पास काम करने के लिए पर्याप्त फंड नहीं है.

शिंदे पक्ष के कार्यकर्ताओं का ठाकरे पक्ष के लोगों से संपर्क करने और कुछ का पाला बदलने का यह एक कारण हो सकता है. चूनाभट्टी क्षेत्र में शाखा संख्या 170 का ही मामला लें. इसके प्रमुख बाबूराव मोरे के मुताबिक, उनके समेत कई लोगों से संपर्क किया गया था. लेकिन उनके उपशाखा प्रमुख के अलावा किसी ने पाला नहीं बदला.

मोरे पिछले 30 साल से शिवसेना के साथ जुड़े हैं. उन्होंने कहा, ‘जो लोग जा रहे हैं वे पैसे के लिए ऐसा कर रहे हैं. हम उद्धव जी के साथ हैं. लेकिन यह सच है कि पैसे के अभाव में काम बाधित हो रहा है. हमने रक्तदान शिविर आदि जैसी गतिविधियों को बंद नहीं किया है, लेकिन हम अधिक फंड के साथ बेहतर तरीके से काम कर पाएंगे.’

यह पूछे जाने पर कि उनमें से अधिकांश कार्यकर्ताओं ने शिंदे गुट में जाने का फैसला क्यों नहीं किया, उन्होंने कहा, ‘हम कई सालों से काम कर रहे हैं. उन्होंने हमारे लिए क्या किया है? हमने किसी पद के लिए काम नहीं किया है. मुझे विश्वास है कि कोई और नहीं जाएगा.’

लेकिन शिंदे की शिवसेना की दादर शाखा के एक कार्यकर्ता इससे पूरी तरह सहमत नहीं हैं. नाम न छापने की शर्त पर उन्होंने कहा, ‘हमें किसी को जबरदस्ती लाने की जरूरत नहीं है. अगर किसी सैनिक के पास पैसा नहीं है तो वह क्या करेगा?  हमारे विधायक के पास फंड है और इसलिए हम लोगों के लिए काम करने में सक्षम हैं.’

शिंदे खेमे के तेलवाने का कहना है कि विधायक सदा सर्वंकर के साथ होने से शाखा कार्यकर्ता क्षेत्र के लोगों के लिए काम करने में सक्षम हैं. उन्होंने कहा, ‘लोग फंड की वजह से हमसे जुड़ना चाहते हैं. जो लोग आज हमारा विरोध कर रहे हैं, वो हमेशा से ऐसा ही करते आए है. सिर्फ सर्वंकर के साथ नहीं चलने वाले ही हमारे साथ नहीं आए हैं. बाकी सब तो हमारे साथ रहना चाहते हैं.’

शिवसेना (यूबीटी) के प्रवक्ता आनंद दुबे ने यह स्वीकार करते हुए कि फंड की कमी इस समय एक बड़ा मसला है. उन्होंने कहा, ‘जो हमारे साथ हैं, वे ठाकरे के कारण हैं. उन्होंने हमारे साथ लंबे समय तक काम किया है. शिंदे और भाजपा के पास काफी पैसा है लेकिन यह हमें रोका नहीं पाएगा. हम अपने कार्यकर्ताओं से यही कह रहे हैं… हमें विश्वास है कि हम बीएमसी चुनाव भी जीतेंगे.’

शिवसेना (शिंदे खेमे) की विधायक सदा सर्वंकर ने दिप्रिंट को बताया कि अभी और लोगों को जोड़ने की गुंजाइश है. ‘हमारी शाखाओं में लोग अपनी शिकायतों के लिए कतार में खड़े हैं. चूंकि हमारे पास फंड है, इसलिए लोगों को भरोसा है कि उनका काम हो जाएगा. हम विस्तार कर रहे हैं और अधिक लोग हमसे जुड़ रहे हैं और हम उन्हें जगह दे रहे हैं.’

(अनुवाद: संघप्रिया मौर्या | संपादनः ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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