मुंबई: अजित पवार की मौत ने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के भविष्य को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. 66 वर्षीय अजित पवार एक जननेता थे और उन्होंने खुद को एक सक्षम प्रशासक के रूप में स्थापित किया था.
महाराष्ट्र के लोग उन्हें प्यार से ‘दादा’ कहकर बुलाते थे. वे अपनी बेबाकी के लिए जाने जाते थे. यह गुण 2023 में पार्टी के लिए एक अहम मोड़ पर साफ तौर पर दिखा था.
बुधवार को हुए विमान हादसे ने भारतीय राजनीति से अचानक भारत के एक बड़े क्षेत्रीय नेता को छीन लिया. उनकी कमी महाराष्ट्र में गहराई से महसूस की जाएगी, जहां से एनसीपी को अपना मुख्य जनाधार और प्रभाव मिलता है.
यहां महाराष्ट्र के छह बार उपमुख्यमंत्री रहे अजित पवार के 35 से ज्यादा साल के राजनीतिक करियर को परिभाषित करने वाले पांच प्रमुख पल दिए जा रहे हैं.
- सिंचाई घोटाला
उनकी पूरी राजनीतिक विरासत एक बड़े विवाद से जुड़ गई थी. यह था 2012 का सिंचाई घोटाला, जिसकी वजह से उन्हें महाराष्ट्र मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था. उस साल सितंबर में कांग्रेस-एनसीपी सरकार में वे उपमुख्यमंत्री थे, जब 70,000 करोड़ रुपये से अधिक की कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में उनका नाम सामने आया था.
हालांकि दिसंबर 2019 में महाराष्ट्र भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उन्हें क्लीन चिट दे दी थी. एजेंसी ने कहा था कि उनके कार्यकाल के दौरान ठेकों की कथित लागत बढ़ाने में उनकी सीधी भूमिका का कोई सबूत नहीं मिला.
- सुबह की शपथ
2019 में जब शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस के बीच महा विकास आघाड़ी सरकार के गठन की बातचीत चल रही थी, तब अजित पवार ने सबको चौंका दिया. इसमें उनके चाचा और एनसीपी प्रमुख शरद पवार भी शामिल थे. उन्होंने शनिवार सुबह आठ बजे उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली.
यह शपथ उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के देवेंद्र फडणवीस के साथ मिलकर सरकार बनाने के बाद ली थी. हालांकि तीन दिन बाद ही सरकार गिर गई क्योंकि अजित पवार अपनी पार्टी में टूट नहीं करा पाए. इसके बाद वे फिर महा विकास आघाड़ी में लौट आए और दोबारा उपमुख्यमंत्री बनाए गए.
- शरद पवार का इस्तीफा
मई 2023 में एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने नई पीढ़ी के नेताओं के लिए रास्ता खोलने के मकसद से पद छोड़ने का फैसला किया. जिस कार्यक्रम में उन्होंने अपने इस्तीफे की घोषणा की, वहां पार्टी कार्यकर्ता और नेता रो पड़े और उनसे पद न छोड़ने की अपील करने लगे. बाद में शरद पवार ने यह फैसला वापस ले लिया.
लेकिन उस मंच पर सिर्फ अजित पवार ही थे, जिन्होंने शरद पवार के इस्तीफे का समर्थन किया. उन्होंने कहा, “आप लोग अपील कर सकते हैं, लेकिन मेरे और सुप्रिया के कहने पर क्या वे सुनेंगे?” उन्होंने यह बात कार्यकर्ताओं की अपील पर प्रतिक्रिया देते हुए कही.
अपने अंदाज में उन्होंने कहा कि बेहतर है कि शरद पवार के रहते और सक्रिय रहते ही नए पार्टी अध्यक्ष का फैसला कर लिया जाए.
उन्होंने कहा था, “उनकी उम्र को देखते हुए हम साहब और सभी लोगों के बारे में सोच रहे हैं और पार्टी की कमान नए नेतृत्व को सौंपने की कोशिश कर रहे हैं. यह नेतृत्व साहब के मार्गदर्शन में काम करेगा. कोई भी समझदार व्यक्ति बता सकता है कि साहब ही पार्टी हैं.”
उनका यह रुख, जो मंच पर मौजूद अन्य सभी नेताओं से अलग था, एक बार फिर एनसीपी अध्यक्ष बनने की उनकी महत्वाकांक्षा को दिखाता है.
- बगावत
आखिरकार जुलाई 2023 में अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार के खिलाफ बगावत कर दी. इस बार वे पूरी तैयारी के साथ थे. उनके साथ नौ अन्य मंत्री और करीब 40 विधायक थे. उन्होंने देवेंद्र फडणवीस और शिवसेना के एकनाथ शिंदे के साथ हाथ मिलाया और महायुति सरकार का हिस्सा बन गए.
एनसीपी दो हिस्सों में बंट गई. अजित पवार गुट को पार्टी का चुनाव चिन्ह, यानी अलार्म क्लॉक मिला. यह उनका वह पल था, जब वे अपने चाचा की छाया से बाहर निकलते दिखे.
हालांकि पिछले ढाई साल में उनके नतीजे मिले-जुले रहे. लोकसभा चुनाव में उनकी पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी और वे अपनी पत्नी को भी बारामती से जिता नहीं पाए. विधानसभा और नगर परिषद चुनावों में नतीजे कुछ बेहतर रहे.
लेकिन हाल ही में हुए नगर निगम चुनावों में घड़ी फिर उनके खिलाफ घूम गई. उनकी पार्टी को पुणे और पिंपरी चिंचवाड़ जैसे इलाकों में भी करारी हार झेलनी पड़ी, जहां 2017 तक उनका पूरा नियंत्रण था.
- बेटे पर आरोप
हालांकि अजित पवार कभी चुनाव नहीं हारे, लेकिन उनके बड़े बेटे पार्थ पवार 2019 के लोकसभा चुनाव में मावल सीट से हार गए थे. छह साल बाद उन्हें एक और झटका लगा, जब उनके बेटे का नाम मुंधवा जमीन घोटाले में घसीटा गया.
पिछले साल नवंबर में पार्थ पर आरोप लगने के बाद अजित पवार ने शुरुआत में खुद को बेटे से अलग कर लिया था. लेकिन कुछ दिन बाद उन्होंने बेटे का बचाव करते हुए इस पर बात की.
एनसीपी नेता ने मीडिया से कहा कि उन्हें अपने ऊपर लगे सिंचाई घोटाले के आरोप याद आ गए, जिनकी जांच में बाद में साबित हुआ कि उनका उन अनियमितताओं से कोई लेना-देना नहीं था.
उन्होंने कहा, “आरोप लगाना आसान है, लेकिन यह भी जरूरी है कि लोगों को इन आरोपों के पीछे की सच्चाई पता चले. मुझे इस लेनदेन के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी. मैं हमेशा कहता हूं कि नियमों के दायरे में काम करो. मैंने आज अपने दफ्तर में सभी से पूछा कि क्या किसी पर किसी तरह का दबाव डाला गया था. मेरे दफ्तर की ओर से किसी पर कोई दबाव नहीं था.”
उनके छोटे बेटे जय पवार ने अपेक्षाकृत कम सार्वजनिक भूमिका निभाई है. कहा जाता है कि वे परिवार के कारोबारी हितों से जुड़े हैं और स्थानीय चुनावी अभियानों और पर्दे के पीछे के प्रबंधन में मदद करते हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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