राहुल गांधी की फाइल फोटो । पीटीआई
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नई दिल्ली: अगर आपको ‘द ग्रेट इंडियन लाफ्टर शो’ देखना है तो ज्यादा दूर जाने की जरूरत नहीं है. कांग्रेस पार्टी इसका एक जीता जागता नमूना है. भोपाल की सड़कों पर जिस प्रकार से तमाशा हो रहा है यह किसी सर्कस से कम नहीं है. इस प्रकार का तमाशा केवल कांग्रेस पार्टी में मुमकिन है. भाजपा इस प्रकार के तमाशे से हमेशा दूर रहती है.

कांग्रेस और भाजपा में सबसे बड़ा अंतर अनुशासन का है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी है. जीतने वाले विधायक अलग-अलग खेमे से आते हैं. जबकि भाजपा में मुख्यमंत्री पद को लेकर इस प्रकार कि रस्साकसी नहीं होती है. भाजपा के समर्थक रोड पे नहीं उतरते हैं.

कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान शुरू हो गयी है. मध्य प्रदेश में कमलनाथ और सिंधिया लड़ाई में हैं. भाजपा को हराकर कांग्रेस अभी तो खड़ी ही हुई है, लेकिन जीत के तुरंत बाद आंतरिक अंतर्कलह में फंसती नज़र आ रही है. समर्थकों ने जिंदाबाद और मुर्दाबाद के नारे लगाना शुरू कर दिए हैं. दोनों नेताओं के समर्थकों में जबरदस्त उत्साह है. कांग्रेस आलाकमान का क्या रुख है, यह बात अभी तक सामने नहीं आ पायी है. देखने वाली बात यह है कि 15 बाद सत्ता में वापसी कर रही कांग्रेस अपना मुख्यमंत्री किसको चुनती है.

दोनों नेताओं के समर्थकों में जबरदस्त उत्साह है. समर्थक अपने-अपने नेताओं कमलनाथ और सिंधिया दोनों को मुख्यमंत्री बनवाना चाहते हैं.

राहुल गांधी को मुख्यमंत्री पद को लेकर मशक्कत करनी पड़ रही है. कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के उत्साह ने उनकी पार्टी को परेशानी में दाल दिया है. लेकिन जिस प्रकार से जिंदाबाद और मुर्दाबाद के नारे लग रहे हैं उसको देखकर लगता है कि कांग्रेस पार्टी के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है.

राजस्थान में भी कांग्रेस का कुछ ऐसा ही हाल है. पार्टी के कार्यकर्ता अपने-अपने नेताओं को मुख्यमंत्री बनाने के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं. अशोक गहलोत और सचिन पायलट दोनों ही राजस्थान में कांग्रेस के प्रमुख नेता हैं. अशोक गहलोत राजस्थान के मुख्यमंत्री पहले रह चुके हैं जिसका फायदा उनको मिल रहा है, पार्टी के पुराने नेताओं में उनकी पकड़ है.

सचिन पायलट के समर्थक उनके समर्थन में राजस्थान में जमकर नारा लगा रहे हैं. उनके नाम को लेकर युवाओं में काफी उत्साह है.

राजस्थान के मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर पेंच फंसा हुआ है. तस्वीर अभी साफ़ नहीं हो पायी है.

इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस के तीन बड़े नेता हैं जो मुख्यमंत्री की कुर्सी हथियाने की रेस में हैं- टीएस​ सिंहदेव, भूपेश बघेल और ताम्रध्वज साहू. हालांकि, वहां पर अभी बाकी दो राज्यों की तरह घमासान की खबर नहीं है.

कमलनाथ और सिंधिया दोनों ने ही पार्टी के लिए जमकर प्रचार किया था. पिछले दिनों में दोनों ही नेताओं ने पार्टी को मध्य प्रदेश में जीवित करने का भरपूर प्रयास किया था और उसमें कामयाब भी हो गए.

कमलनाथ का राजनीतिक सफर

कमलनाथ मध्य प्रदेश में कांग्रेस के बड़े नेता हैं. वे कुछ दिन पहले मध्य प्रदेश के कांग्रेस अध्यक्ष बनाये गए थे. वहीं दूसरी तरफ सिंधिया को प्रचार समिति का मुखिया बनाया गया था.

कमलनाथ 1980 में पहली बार सांसद बने. नौ बार सांसद बन चुके हैं. वे 1991 में पहली बार केंद्रीय मंत्री बने थे. कमलनाथ का छिंदवाड़ा में काफी प्रभाव है. वे कांग्रेस परिवार के काफी करीबी माने जाते हैं. मध्य प्रदेश में साफ सुथरी छवि के नेता माने जाते हैं. हालांकि कमलनाथ का मध्य प्रदेश से सिर्फ राजनीतिक रिश्ता ही है.

ज्योतिरादित्य सिंधिया का राजनीतिक सफर

सिंधिया राजघराने से ताल्लुक रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश में कांग्रेस के युवा नेता हैं. ज्योतिरादित्य गुना लोकसभा से 2002 में सांसद चुने गए थे. इस सीट से वे रिकॉर्ड सवा चार लाख वोटों से जीते थे.

उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का करीबी भी माना जाता है. ऐसे में उन्हें मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री का मजबूत दावेदार माना जा रहा है.


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