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Wednesday, 8 April, 2026
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केरल के कासरगोड में BJP ‘मंगलुरु मॉडल’ के सहारे विकास का दांव खेल रही है

केरल के सबसे उत्तरी ज़िले के निवासी अक्सर अस्पतालों, कॉलेजों और उड़ानों के लिए राज्य की सीमा पार करते हैं. 9 अप्रैल को होने वाले चुनावों से पहले, BJP इसे वोटों में बदलने की कोशिश कर रही है.

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कासरगोड, केरल: करीब दो साल पहले, 54 साल के चंद्रशेखर ने कासरगोड के गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज में पेसमेकर का इंतिजार करते हुए 36 दिन बिताए.

आमतौर पर पेसमेकर एक घंटे की सर्जरी में लगाया जाता है, लेकिन चंद्रशेखर के मामले में डॉक्टर उनकी शुगर ज्यादा होने और अन्य जटिलताओं का हवाला देकर ऑपरेशन टालते रहे.

“यह बहुत परेशान करने वाला था. जिस व्यक्ति को मैं सुबह अपने पास देखता था, वह दोपहर तक मर चुका होता था. मैंने वहां रहते हुए 28 लोगों को मरते देखा,” सुरक्षा गार्ड ने कहा, यह सोचकर ही सिहरते हुए.

एक रिश्तेदार की सलाह पर, उन्होंने कर्नाटक के पड़ोसी दक्षिण कन्नड़ जिले के पुत्तूर में इलाज करवाया. वहां 10 दिनों के अंदर ऑपरेशन तय हुआ और पूरा भी हो गया.

स्थानीय लोग कहते हैं कि कासरगोड, जो केरल का सबसे उत्तरी जिला है, उसे उसका हक नहीं मिला और वह राज्य के विकास की कहानी से काफी हद तक बाहर रह गया.

कासरगोड के लोगों के लिए, कर्नाटक का मंगलुरु विशेषज्ञ इलाज, उच्च शिक्षा और हवाई यात्रा के लिए मुख्य जगह है.

9 अप्रैल के विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) इस कथित उपेक्षा के मुद्दे को उठा रही है, ताकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) और पिनराई विजयन के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को हराया जा सके.

Residents say Kasargod, Kerala’s northernmost district, has been left out of Kerala’s growth story | Sharan Poovanna | ThePrint
निवासियों का कहना है कि केरल का सबसे उत्तरी ज़िला कासरगोड, राज्य की विकास गाथा से अछूता रह गया है | शरण पूवन्ना | दिप्रिंट

विपक्षी पार्टी, जो केरल में चुनावी सफलता पाने की कोशिश कर रही है, खास तौर पर कासरगोड जिले की पांच विधानसभा सीटों में से मंजेश्वर और कासरगोड पर ध्यान दे रही है. बाकी सीटें उदमा, कन्हानगड और त्रिकारीपुर हैं.

बीजेपी के के. सुरेंद्रन (मंजेश्वर) और अश्विनी एम.एल. (कासरगोड) अपने क्षेत्रों में ‘मंगलुरु मॉडल’ को बढ़ावा दे रहे हैं. ये इलाके NH-66 के पूरे हो चुके हिस्से पर आते हैं, और वे इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विकास के उदाहरण के तौर पर दिखा रहे हैं.

लेकिन वे कर्नाटक के कांग्रेस शासित शहर मंगलुरु का प्रचार क्यों कर रहे हैं.

हालांकि कर्नाटक में बीजेपी और कांग्रेस की सरकारें बारी-बारी से आती रही हैं, लेकिन तटीय कर्नाटक को बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अच्छी पकड़ है. दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों और मंगलुरु शहर की 13 सीटों में से बीजेपी के पास 11 सीटें हैं, जबकि 2 कांग्रेस के पास हैं.

कासरगोड को कभी-कभी राज्य का “अनचाहा बच्चा” भी कहा जाता है, क्योंकि इसके कर्नाटक और पुराने तुलुनाडु क्षेत्र से ज्यादा संबंध हैं. कासरगोड पहले दक्षिण कनारा जिले का हिस्सा था, लेकिन 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान इसे केरल के कन्नूर जिले में मिला दिया गया. 24 मई 1984 को कासरगोड जिला बना.

हालांकि केरल में सरकारी अस्पतालों का अच्छा नेटवर्क है, लेकिन कासरगोड के लोग कहते हैं कि यहां अक्सर भीड़ बहुत ज्यादा होती है.

“स्थानीय अस्पताल और पीएचसी सामान्य इलाज के लिए अच्छे हैं. लेकिन अगर कोई जटिल मामला हो, स्कैन की जरूरत हो, या एक्सीडेंट में सिर की चोट हो, तो डॉक्टर मरीज को मंगलुरु ले जाने की सलाह देते हैं,” स्थानीय निवासी शरथ कुमार ने कहा.

केरल इकोनॉमिक रिव्यू के अनुसार, कासरगोड, इडुक्की और वायनाड में अस्पतालों में सबसे कम बेड हैं, जबकि तिरुवनंतपुरम और एर्नाकुलम में ज्यादा हैं. इस समय कासरगोड में कोई सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल बेड नहीं है.

Kasargod, Idukki and Wayanad have the lowest number of hospital beds compared to Thiruvananthapuram and Ernakulam | Photo: Sharan Poovanna | ThePrint
तिरुवनंतपुरम और एर्नाकुलम की तुलना में कासरगोड, इडुक्की और वायनाड में अस्पताल के बिस्तरों की संख्या सबसे कम है | फोटो: शरण पूवन्ना | दिप्रिंट

मंगलुरु सिर्फ 58 किमी दूर है और NH-66 के पूरे हिस्से से एक घंटे में पहुंचा जा सकता है. वहीं कन्नूर 92 किमी दूर है, लेकिन सड़क से लगभग 3 घंटे लगते हैं. कालीकट (करीब 186 किमी) पहुंचने में 5.5 घंटे लगते हैं, क्योंकि इस हिस्से में NH-66 का काम चल रहा है, जिससे रास्ते बदलने पड़ते हैं और ट्रैफिक धीमा रहता है.

आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस

अर्थव्यवस्था की तस्वीर मिली-जुली है. कासरगोड की मुख्य सड़क पर महंगे ज्वेलरी स्टोर हैं. इसकी 70 किमी लंबी तटरेखा ने इसे एक व्यापारिक बंदरगाह के रूप में विकसित होने में मदद की है. यहां बेकल फोर्ट और कप्पिल बीच जैसे पर्यटन स्थल भी हैं.

‘सात भाषाओं की भूमि’ के रूप में जाना जाने वाला कासरगोड, प्राचीन मस्जिदों और मंदिरों का भी मिश्रण है, जो NH-66 के दोनों तरफ दिखाई देते हैं.

लेकिन राज्य की जीएसडीपी में योगदान के मामले में यह 12वें स्थान पर है.

स्थानीय लोग कहते हैं कि तिरुवनंतपुरम, जो यहां से करीब 600 किमी दूर है, वहां की सरकार इस जिले पर ध्यान नहीं देती.

कन्हानगड के निवासी और सामान ढोने वाले ऑटो ड्राइवर अब्दुल बशीर ने सोचा जब उनसे पूछा गया कि क्या मुख्यमंत्री पिनराई विजयन पिछले 10 साल में यहां आए हैं.

“मुझे लगता है कि वह अपने पहले कार्यकाल में आए थे,” उन्होंने कहा, लेकिन किसी बड़े विकास कार्य के बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी.

विकास कितना हुआ है, यह इस पर निर्भर करता है कि आप किससे पूछते हैं.

“यहां सब ठीक है. कुछ जगहों पर वामपंथ मजबूत है, जबकि कम से कम दो सीटें लीग के गढ़ हैं,” उन्होंने कहा, भारतीय यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का जिक्र करते हुए.

IUML, जो UDF का हिस्सा है, लंबे समय से बीजेपी को इस क्षेत्र में जगह बनाने से रोकती रही है, भले ही यहां उसके लिए जनसंख्या के आधार पर मौका है.

2011 की जनगणना के अनुसार, यहां करीब 55.84 प्रतिशत हिंदू, 37.24 प्रतिशत मुस्लिम और 6.69 प्रतिशत ईसाई हैं.

बीजेपी के के. सुरेंद्रन 2011 में 5,828 वोट से हारे थे, लेकिन बाद में अंतर कम हुआ. 2016 में वे 89 वोट से हारे और 2021 में 745 वोट से.

यहां बड़ी संख्या में कन्नड़ बोलने वाले हिंदू हैं, जिनका कर्नाटक के तटीय जिलों से गहरा संबंध है.

ज्यादातर कुशल कामगार काम के लिए मंगलुरु जाते हैं या वहीं रहते हैं, और माता-पिता अपने बच्चों को भी वहीं पढ़ाना पसंद करते हैं.

कुमार के बच्चे शुरू से ही मंगलुरु के कदरी में पढ़ रहे हैं.

“10वीं तक यहां शिक्षा अच्छी है. उसके बाद हमें मंगलुरु देखना पड़ता है, जहां ज्यादा विकल्प मिलते हैं,” उन्होंने कहा. उन्होंने यह भी कहा कि कासरगोड में सिर्फ पारंपरिक आर्ट्स, कॉमर्स और साइंस के कोर्स ही मिलते हैं.

केरल इकोनॉमिक रिव्यू के अनुसार, कासरगोड में कोई सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज भी नहीं है.

यहां छात्र राजनीति भी हिंसक हो जाती है, जिससे डर का माहौल बनता है.

माता-पिता को डर है कि छात्रों को SFI, IUML की मुस्लिम स्टूडेंट फेडरेशन और बीजेपी की ABVP जैसे संगठनों के बीच झगड़ों में पक्ष लेना पड़ता है, नहीं तो उन्हें निशाना बनाया जा सकता है.

पिछले साल 15 अगस्त को, केरल की सेंट्रल यूनिवर्सिटी में ABVP द्वारा ‘पार्टिशन हॉरर्स रिमेंबरेंस डे’ मनाने के फैसले से कासरगोड, कन्नूर और कालीकट में छात्रों के बीच झड़प हुई.

यह क्षेत्र सोना तस्करी और प्रतिबंधित नशीले पदार्थों के इस्तेमाल और बिक्री जैसे कानून-व्यवस्था के मुद्दों के कारण भी चर्चा में रहा है.

2016 में, पदन्ना और आसपास के इलाकों के करीब 21 युवक लापता हो गए थे और शक था कि वे अफगानिस्तान में ISIS में शामिल हो गए हैं. इसके बाद राष्ट्रीय एजेंसियों ने जांच की.

इस कारण, माता-पिता को डर है कि उनके बच्चे इन विचारधारा और पहचान से जुड़े विवादों में फंस सकते हैं.

“हम मंगलुरु के पास होने के कारण बच गए हैं,” व्यापारी और CAMPCO के निदेशक गणेश पराकट्टा ने कहा.

उन्होंने बताया कि उनके दोनों बच्चे दक्षिण कन्नड़ में पढ़े और अब वापस आने की संभावना नहीं है.

पहचान की राजनीति

जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, केरल में बीजेपी के प्रमुख चेहरों में से एक सुरेंद्रन मंजेश्वर में ‘मंगलुरु मॉडल’ को आगे बढ़ा रहे हैं, जो इस तटीय शहर के बहुत करीब है.

BJP is focusing on Manjeshwar and Kasargod constituencies for its Kerala breakthrough | Photo: Sharan Poovanna | ThePrint
केरल में अपनी सफलता के लिए बीजेपी मंजेश्वर और कासरगोड निर्वाचन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रही है फोटो: शरण पूवन्ना | दिप्रिंट

आलिया दुर्गा परमेश्वरी मंदिर में एक सांस्कृतिक कार्यक्रम के दौरान, सुरेंद्रन ने पहले थोड़ी देर कन्नड़ में बात की और फिर जल्दी ही मलयालम में बोलने लगे. उन्होंने कन्नड़, तुलु और हिंदू पहचान को जोड़ते हुए बात की. उन्होंने आने वाले चुनाव को “धर्म युद्ध” बताया और सभी से वोट देने की अपील की.

“बच्चों और रिश्तेदारों से, जो मंगलुरु और अन्य जगहों पर हैं, उनसे फोन करके कहें कि वे आकर वोट दें,” उन्होंने एक छोटे भाषण में कहा, जिसमें ‘डेवलपमेंट’ और ‘मोदी सरकार’ जैसे शब्द बार-बार आए.

“हमारे स्थानीय विधायक ने मुश्किल से 5 करोड़ रुपये खर्च किए हैं. लेकिन मंगलुरु नॉर्थ के बीजेपी विधायक भारत शेट्टी के क्षेत्र में सैकड़ों करोड़ के काम चल रहे हैं,” उन्होंने कहा.

सुरेंद्रन ने विवाद से बचने के लिए कन्नड़ में ज्यादा बात करने से परहेज किया.

कासरगोड भाषा के आधार पर होने वाले विवादों का केंद्र रहा है. यहां कन्नड़ बोलने वाले लोग पिनराई विजयन की सरकार का विरोध कर रहे हैं, क्योंकि मलयालम भाषा बिल के तहत स्कूलों में मलयालम को अनिवार्य बनाने की कोशिश हो रही है.

रविवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी यही बात दोहराई.

“हमें विश्वास है कि लोग कन्नड़ भाषा की रक्षा के लिए कांग्रेस समर्थित UDF उम्मीदवार और मौजूदा विधायक अशरफ को जीताएंगे,” सिद्धारमैया ने कहा.

सिद्धारमैया ने यह भी कहा कि LDF सरकार कर्ज में डूबी हुई है. उन्होंने कांग्रेस शासित कर्नाटक के विकास का जिक्र करते हुए लोगों से UDF को समर्थन देने की अपील की.

‘LDF और UDF ने हमें हल्के में लिया’

हिंदू वोटों को एकजुट करने की कोशिश के अलावा, बीजेपी मुस्लिम आबादी तक भी पहुंचने की कोशिश कर रही है.

“बीजेपी को वोट देने में क्या गलत है? हमने लेफ्ट और UDF को वोट दिया, लेकिन बदले में कुछ नहीं मिला. वे हमें हल्के में लेते हैं,” बंडियॉड के निवासी मोइदीन ने कहा.

हालांकि कुछ लोग ज्यादा ध्यान मिलने की उम्मीद कर रहे हैं, लेकिन वे हिंदुत्व राजनीति के जिले या राज्य में आने को लेकर चिंतित भी हैं.

“वे (बीजेपी) उत्तर भारत जैसी राजनीति यहां नहीं ला सकते,” मोइदीन ने कहा.

IUML भी यह बताने की कोशिश कर रही है कि बीजेपी को वोट देना “खतरनाक” हो सकता है.

“IUML के महासचिव पी.एम.ए. सलाम ने कहा, “वे (बीजेपी) केरल में विभाजनकारी राजनीति लाना चाहते हैं. लेकिन केरल के लोग पढ़े-लिखे हैं और सांप्रदायिक सौहार्द चाहते हैं. वे इसे यहां नहीं आने देंगे.”

लेफ्ट से जुड़े इंडियन नेशनल लीग (INL) ने मुस्लिम वोटों को बांट दिया है, जो पहले ज्यादातर UDF के साथ रहते थे, कम से कम अभी के लिए.

बीजेपी इसी संभावित बंटवारे पर भरोसा कर रही है. उसे उम्मीद है कि मुस्लिम वोट LDF और IUML (UDF) के बीच बंटेंगे और इसका फायदा उसे कासरगोड में मिलेगा.

INL कासरगोड में अपने उम्मीदवार शाहनवाज़ पुदूर के लिए सक्रिय प्रचार कर रही है. मंजेश्वर में सुरेंद्रन का मुकाबला मौजूदा IUML विधायक ए.के.एम. अशरफ से है. वहीं LDF ने के.आर. जयनंद को उम्मीदवार बनाया है, जो हिंदू वोटों को बांट सकते हैं.

बीजेपी का कहना है कि वह पूरे हिंदू वोट को एकजुट करने की कोशिश कर रही है, ताकि लीग के पक्ष में मुस्लिम वोटों के एकजुट होने का सामना किया जा सके.

“जैसे ही मुसलमानों को लगता है कि बीजेपी जीत रही है, वे हमें हराने के लिए एकजुट हो जाते हैं. पहले भी ऐसा हुआ है. लेकिन इस बार हमें उम्मीद है,” एक बीजेपी कार्यकर्ता ने कहा.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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