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Sunday, 1 October, 2023
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जन्माष्टमी से लेकर तीज तक, बिहार में स्कूलों की छुट्टियां खत्म, BJP ने बताया ‘तुष्टीकरण’ की राजनीति

बिहार शिक्षा विभाग के आदेश में कहा गया है कि आरटीई अधिनियम के अनुसार प्राथमिक विद्यालयों में 200 और मध्य विद्यालयों में 220 कार्य दिवस बनाए रखने के लिए छुट्टियों को कम करना होगा.

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पटना: बिहार शिक्षा विभाग ने घोषणा की है कि वह इस कैलेंडर वर्ष की शेष अवधि के लिए स्कूलों में 12 त्योहारी छुट्टियों में कटौती कर रहा है, जिसमें अगले महीने श्रीकृष्ण जन्माष्टमी भी शामिल है. इस कदम पर विपक्षी बीजेपी ने आरोप लगाया है कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जेडीयू सरकार हिंदूओं के त्योहारों में छुट्टियों को खत्म कर “तुष्टिकरण” की राजनीति कर रही है.

शिक्षा विभाग के निदेशक द्वारा एक आदेश, जिसकी प्रति दिप्रिंट के पास है, को 29 अगस्त को जारी किया गया था. इसमें कहा गया है कि स्कूलों में अब श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, तीज और गुरु नानक जयंती पर छुट्टियां नहीं होंगी. इसके अलावा, दुर्गा पूजा की छुट्टियों को छह दिनों से घटाकर केवल चार दिन कर दिया गया है. शिक्षा विभाग द्वारा यह तर्क दिया गया है कि स्कूलों को एक निश्चित न्यूनतम कार्य दिवस पूरा करने के लिए यह किया गया है.

इस घोषणा से बीजेपी नेताओं में आक्रोश फैल गया है. बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने दिप्रिंट से कहा, “नीतीश कुमार अपनी राजनीतिक स्वार्थ में इतने तल्लीन हैं कि वे तुष्टीकरण की नीति अपना रहे हैं.”

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए बुधवार को पोस्ट किया कि बिहार शिक्षा विभाग द्वारा दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ पूजा की छुट्टियां “रद्द” कर दी गई हैं. उन्होंने आगे कहा, “संभव है कि कल बिहार में शरिया लागू हो जाएगा और हिंदू त्योहार मनाने पर रोक लगा दी जाएगी.”

इस बीच, जदयू ने बीजेपी पर इस फैसले को सांप्रदायिक मोड़ देने की कोशिश करने का आरोप लगाया.

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जेडी (यू) के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव रंजन ने दिप्रिंट से कहा, “स्कूल की छुट्टियों में कटौती प्राथमिक विद्यालयों में 200 कार्य दिवस और मध्य विद्यालयों में 220 कार्य दिवस बनाए रखने के केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के निर्देश के अनुरूप किया गया है. राज्य सरकार ने छुट्टियों के कार्यक्रम को नियमानुसार समायोजित किया है. राज्य बीजेपी को इस मुद्दे का राजनीतिकरण करने का प्रयास करने से पहले तथ्यों के बारे में जानकारी हासिल करनी चाहिए.”

आदेश में क्या है?

आदेश में शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 का हवाला दिया गया है, जिसके अनुसार प्राथमिक विद्यालयों (कक्षा I से V) में 200 कार्य दिवस होने चाहिए, जबकि मध्य विद्यालयों (कक्षा VI-VIII) में 220 कार्य दिवस होने चाहिए.

इसके बाद यह नोट किया गया कि चुनाव, परीक्षा, कानून और व्यवस्था की स्थिति, त्यौहार और अन्य घटनाओं के चलते कई बार स्कूलों में नियमित शिक्षण कार्य बाधित होते हैं.

कुल मिलाकर, शेष वर्ष के लिए छुट्टियां 23 दिनों से घटाकर 11 दिन कर दी गई हैं.

आने वाले महीने में, 7 सितंबर को पड़ने वाली श्री कृष्ण जन्माष्टमी की छुट्टियां हटा दी गई हैं, जबकि चेहलुम (6 सितंबर) और अनंत चतुर्दशी/हजरत मुहम्मद की जयंती (28 सितंबर) की छुट्टियां बरकरार रखी गई हैं.


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‘तानाशाही’

शिक्षा विभाग के आदेश से कई स्कूलों के शिक्षक नाखुश हैं.

बिहार प्राथमिक शिक्षक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष मनोज कुमार ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे “तानाशाहीपूर्ण” बताया.

उन्होंने दिप्रिंट से कहा, “श्री कृष्ण जन्माष्टमी जैसी छुट्टियां खत्म कर दी गई हैं. स्कूल की लगभग 70 प्रतिशत शिक्षिकाएं महिलाएं हैं जो जितिया के दिन व्रत रखती हैं. उनकी भी छुट्टियां काट दी गई हैं. हम शिक्षक कक्षाओं में 220 दिन से अधिक पढ़ाते हैं. शिक्षा विभाग लोगों को बेवकूफ बना रहा है जब वह कहता है कि वह 220 कार्य दिवस सुनिश्चित करना चाहता है.”

मनोज कुमार के मुताबिक, यह मानना ​​गलत है कि स्कूली शिक्षकों को बहुत ज्यादा छुट्टियां दी जाती हैं. उन्होंने कहा कि उनका संघ सरकार के इस कदम का विरोध करेगा.

यह पहली बार नहीं

हलांकि, यह पहली बार नहीं है जब बिहार में स्कूल की छुट्टियां और राजनीति एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं.

पिछले साल, बीजेपी ने सीमांचल क्षेत्र के किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिलों जैसे मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में शनिवार के बजाय शुक्रवार को स्कूल की छुट्टियां देने की प्रथा का विरोध किया था. ऐसा कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के बच्चों को शुक्रवार की नमाज के लिए समायोजित करने के लिए किया गया था.

हालांकि, बीजेपी की आपत्तियों के बावजूद- जो तब भी जेडीयू की सहयोगी थी- तत्कालीन शिक्षा मंत्री, विजय कुमार चौधरी ने छुट्टियों को दोबारा निर्धारित करने की मांग को पूरा नहीं किया.

गौरतलब है कि बिहार की आबादी में मुसलमानों की संख्या लगभग 17 प्रतिशत है, लेकिन सीमांचल में यह जिले के आधार पर 35 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक है.

(संपादनः ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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