Monday, 27 June, 2022
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पंडित वोटर्स के लिए कैंप और पहाड़ियों को ST दर्जे पर जोर, जम्मू-कश्मीर के ‘अल्पसंख्यक इलाकों’ पर BJP की नजर

भाजपा आगामी 24 अप्रैल को पंचायती राज दिवस के मौके पर समारोह के आयोजन के साथ जम्मू में अपने चुनाव अभियान की शुरुआत करने जा रही है. इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सांबा जाएंगे.

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नई दिल्ली: भाजपा ने जम्मू-कश्मीर में अगला विधानसभा चुनाव जीतने के लिए अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी हैं, इसमें अल्पसंख्यक बहुल घाटी क्षेत्र में अपने पैर जमाने के लिए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी) के नेताओं को पार्टी में शामिल करने और एसटी दर्जे पर जोर देकर पहाड़ी समुदाय के बीच पैठ बनाना शामिल है.

भाजपा नेताओं का कहना है कि कश्मीर में ओबीसी को आरक्षण देने की कवायद भी जारी है.

भाजपा ने आगामी 24 अप्रैल को जम्मू में पंचायती राज दिवस समारोह के आयोजन को अपने चुनाव अभियान की शुरुआत के तौर पर चुना है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए सांबा जाएंगे, जिसमें करीब लाख भाजपा कार्यकर्ता और जमीनी स्तर के संगठनों के प्रमुख—280 डीडीसी सदस्य, 289 बीडीसी अध्यक्ष, 4,159 सरपंच और 28,000 पंच आदि—मौजूद रहेंगे.

अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में यह प्रधानमंत्री का पहला विशाल सम्मेलन होगा.

जम्मू-कश्मीर में भाजपा के सह-प्रभारी आशीष सूद ने कहा, ‘प्रधानमंत्री का दौरा निश्चित तौर पर पंचायती राज संस्थानों की सफलता का जश्न मनाने के लिए है और इस आयोजन के लिए निकाय के सभी तीन स्तरों पर निमंत्रण भेजा गया है. इस मौके पर बड़ी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता प्रधानमंत्री को सुनने के लिए मौजूद रहेंगे.’

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बहरहाल, चुनाव आयोग 90 विधानसभा और पांच संसदीय क्षेत्रों के परिसीमन के बाद यह तय करेगा कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव कब होंगे.

प्रतिद्वंदवी दलों के नेताओं को शामिल करना

भाजपा ने पिछले हफ्ते ही हिमाचल प्रदेश में आम आदमी पार्टी (आप) के कई वरिष्ठ नेताओं को पार्टी में शामिल करके अपने प्रतिद्वंद्वी दल को तोड़ने में कामयाबी हासिल की है.

जम्मू-कश्मीर में भाजपा राज्य में कभी लंबे समय तक शासन करने वाली दो प्रमुख पार्टियों नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के साथ भी यही रणनीति अपना रही है.

जम्मू भाजपा के एक नेता ने कहा, ‘पिछले पांच महीनों में नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के 40 से अधिक नेता पार्टी में शामिल हुए हैं.’ दलबदल का यह ट्रेंड अक्टूबर 2021 में केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह के छोटे भाई देवेंद्र सिंह राणा के नेशनल कांफ्रेंस से भाजपा में आने के बाद तेज हुआ है.

भाजपा ने जिन अन्य प्रमुख चेहरों को पार्टी में जगह दी है, उनमें नेशनल कांफ्रेंस के सुरजीत सलाथिया, पूर्व मंत्री प्रेम सागर अजीज और पीडीपी के पूर्व एमएलसी सुरिंदर चौधरी के अलावा कई डिप्टी मेयर, ब्लॉक डेवलपमेंट काउंसिल (बीडीसी) अध्यक्ष और पंचायत प्रमुख शामिल हैं.

जम्मू क्षेत्र में एक प्रमुख जाट चेहरा और पीडीपी के नेता रहे सुरिंदर चौधरी इस महीने के शुरू में जम्मू में भाजपा के जम्मू-कश्मीर प्रभारी और पार्टी महासचिव तरुण चुग की उपस्थिति में भाजपा में शामिल हुए.

चौधरी ने पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती पर ‘जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तानी एजेंडा चलाकर पार्टी को बर्बाद करने’ का आरोप लगाया है.


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पिछले साल दिसंबर में कश्मीरी पंडित नेता अनिल धर ने यह कहते हुए नेशनल कांफ्रेंस को छोड़ दिया था कि पार्टी को ‘पंडितों के हितों पर ध्यान देने में कोई रुचि नहीं रही है.’

नेताओं का दलबदल आमतौर पर जम्मू क्षेत्र में हुआ है, और भाजपा ने अब अपनी नजरें नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के अल्पसंख्यक बहुल गढ़ों पुंछ और राजौरी पर टिका दी हैं.

जम्मू-कश्मीर के पूर्व डिप्टी सीएम निर्मल सिंह ने दिप्रिंट को बताया, ‘जम्मू क्षेत्र में नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी का लगभग पूरा नेतृत्व खत्म हो चुका है. जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस की मौजूदगी तो है लेकिन वे आपसी लड़ाई में ही व्यस्त हैं और दिशाहीन हैं. भाजपा उन क्षेत्रों में अपनी जगह बना रही है जहां पहले नेताओं को पार्टी में शामिल होने पर आपत्ति थी.

जाटों की नाराजगी दूर करने, और पहाड़ियों को लुभाने की कोशिश

चौधरी के भाजपा में शामिल होने से पार्टी को उन क्षेत्रों में कुछ मदद मिली है जहां परिसीमन आयोग की रिपोर्ट को लेकर जाट समुदाय के भीतर कुछ नाराजगी है. रिपोर्ट में सांबा और कठुआ क्षेत्रों को एससी सीटों के तौर पर आरक्षित करने की सिफारिश की गई है.

चूंकि, जाट आबादी का अधिकांश हिस्सा जम्मू, सांबा और कठुआ जिलों के सीमावर्ती इलाकों में ही रहता है, इसलिए यह प्रस्ताव समुदाय को कतई नहीं भाया है. 1947 के दौरान पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर से आए करीब पांच लाख जाट नियंत्रण रेखा (एलओसी) से लगे इन्हीं इलाकों में बसे हैं.

परिसीमन आयोग ने अपने शुरुआती मसौदे में जम्मू-कश्मीर में एसटी समुदाय के लिए नौ और एससी समुदाय के लिए सात सीटों का प्रस्ताव रखा है. प्रस्तावित एससी सीटों में से पांच में जाटों की अच्छी खासी मौजूदगी है.

आयोग ने पहाड़ियों के लिए एसटी आरक्षण की सिफारिश भी की है. इसे पीर पंजाल क्षेत्र में मूलत: खेती और पशु-पालन जुड़े इस समुदाय के बीच पैठ बढ़ाने के भाजपा के प्रयासों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है. इस समुदाय की तरफ से दशकों से एसटी दर्जे की मांग की जा रही है. जम्मू-कश्मीर में पहाड़ी समुदाय के लोगों की आबादी करीब 9.6 लाख है.

पीर पंजाल क्षेत्र में नेशनल कांफ्रेंस का चेहरा रहे प्रमुख पहाड़ी नेता और पूर्व मंत्री मुश्ताक बुखारी ने इसी मुद्दे को लेकर फरवरी में पार्टी छोड़ दी थी. हालांकि वह अभी तक भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन पार्टी नेताओं का कहना है कि वह पहाड़ी लोगों को एसटी का दर्जा देने के प्रयासों में मदद करेंगे.

दो पारंपरिक चरवाहा समुदायों गुर्जर-बकरवाल, जो सामाजिक रूप से अधिक पिछड़े हैं, को 1991 में एसटी का दर्जा मिला था. एसटी को जम्मू-कश्मीर में नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10 प्रतिशत आरक्षण मिलता है.

अब, केंद्र में सत्तासीन भाजपा ने पहाड़ी वोटबैंक को लुभाने के लिए इस समुदाय को एसटी का दर्जा देने का वादा किया है. इसका संकेत केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नवंबर में जम्मू-कश्मीर की अपनी यात्रा के दौरान दिया था, जब उन्होंने इस मांग पर जोर देने वाले पहाड़ी समुदाय के प्रतिनिधियों से मुलाकात की थी.

पहाड़ियों को एसटी का दर्जा मिलने से यह समुदाय भी गुर्जर-बकरवालों की तरह ही थोड़ी मजबूत स्थिति में आ सकेगा.

भाजपा की नजरें पहाड़ी वोटबैंक पर हैं, यह बात तभी स्पष्ट हो गई थी जब शाह ने 2018 में एक पहाड़ी रविंदर रैना को राज्य पार्टी अध्यक्ष के तौर पर चुना था.


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पंडितों के लिए ‘विशेष शिविर’

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक, ‘द कश्मीर फाइल्स फिल्म और राष्ट्रवाद के मुद्दे ने कश्मीरी पंडितों के बीच हमारी पकड़ फिर से मजबूत कर दी है.’

इस समुदाय के अधिकांश लोग जम्मू में बसे हैं. 2014 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू क्षेत्र की 37 में से 25 सीटों पर जीत हासिल की थी, जो वहां उसका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था. 2008 में, भाजपा को जम्मू में 11 सीटें मिली थीं, जबकि 2002 में उसे केवल एक सीट पर सफलता मिली थी.

नेता ने कहा, ‘हम नए क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रहे बल्कि अपने पुराने गढ़ों को ही बचा रहे हैं. और हम इधर-उधर बिखरे कश्मीरी पंडित मतदाताओं का पता लगाने के लिए विशेष शिविर लगा रहे हैं. ऐसे सात लाख मतदाता हैं और हम उनका पता लगा रहे हैं ताकि चुनाव के दौरान वे आराम से अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर सकें.

उन्होंने कहा, ‘इसके अलावा, हमने प्रत्येक बूथ पर दो लोगों को यह पता लगाने के लिए नियुक्त किया है कि क्या लोगों को पीएम आवास योजना और ई-श्रम कार्ड जैसी सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों का लाभ मिल रहा है, और साथ ही यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि जिनका पंजीकरण नहीं हुआ है, उन्हें केंद्रीय योजनाओं में नामांकित किया जा सके.’

यदि परिसीमन आयोग के प्रस्तावों को स्वीकर कर लिया जाता है, तो जम्मू क्षेत्र में कुल विधानसभा सीटें 37 से बढ़कर 43 और कश्मीर क्षेत्र में 46 से बढ़कर 47 हो जाएंगी.

जम्मू-कश्मीर के एक अन्य वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा, ‘हिंदू बहुल जम्मू, कठुआ, सांबा और रियासी क्षेत्र हमारे मजबूत गढ़ हैं. परिसीमन के बाद हम जम्मू प्रांत में ही 35 सीटें जीत सकते हैं, जबकि बाकी सीटें कश्मीर के छोटे दलों और निर्दलीयों को मिल सकती है. पहाड़ियों को एसटी दर्जा और ओबीसी को आरक्षण घाटी और आसपास के जिलों में हमारी संभावनाओं को बढ़ाएगा.’

सूद ने कहा, ‘सरकार ने ओबीसी आरक्षण के लिए जीडी शर्मा आयोग गठित किया था जो अपनी रिपोर्ट तैयार करने के अंतिम चरण में है. चूंकि कश्मीर में ओबीसी के लिए कोई आरक्षण नहीं है, इसलिए ऐसा करने से अल्पसंख्यक बहुल घाटी में 13-14 से अधिक जातियों को इसका फायदा मिलेगा.’

(इस ख़बर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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