Saturday, 2 July, 2022
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बिहार में बड़े नाटककार ने अशोक को बताया औरंगजेब जैसा, तो BJP और JD(U) के बीच बढ़ी तकरार

जद (यू) ने लेखक दया प्रकाश सिन्हा के भाजपा से संबंध होने का आरोप लगाया, पद्मश्री छीनने की की मांग, भाजपा है 'डैमेज कंट्रोल मोड' में, बिहार भाजपा प्रमुख ने सिन्हा के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई.

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पटना: कई पुरस्कारों के विजेता और नामचीन हिंदी लेखक दया प्रकाश सिन्हा के एक हालिया साक्षात्कार, जिसमें उन्होंने सम्राट अशोक और मुगल बादशाह औरंगजेब के बीच समानताएं गिनायीं थीं, ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पार्टी जद (यू) और उसकी सहयोगी भाजपा के बीच बढ़ते मतभेदों को और चौड़ा कर दिया है.

लगभग एक हफ्ते पहले हिंदी समाचार पत्र नवभारत टाइम्स में प्रकाशित एक साक्षात्कार में सेवानिवृत्त सिविल सर्वेंट सिन्हा ने अशोक की तुलना औरंगजेब से की और आरोप लगाया, ‘अपने भाइयों के अलावा, उन्होंने कई सारे बौद्ध भिक्षुओं को भी मार डाला था.’

पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित ये 86 वर्षीय लेखक एक हिंदी नाटक, सम्राट अशोक के रचनाकार हैं, जिसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार 2021 भी मिला है .

सिन्हा की व्यक्तिगत वेबसाइट पर दिए गए इस नाटक के सार में लिखा है – ‘श्रीलंका में पाए गए बौद्ध धर्म वैधानिक (कैनॉनिकल) साहित्य पर आधारित तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में राज करने वाले आधुनिक सम्राट अशोक के जीवन पर आधारित यह नाटक सिर्फ उनके जीवन और उपलब्धियों का इतिहास मात्र नहीं है. यह एक नाटकीय भाषा में इस सम्राट को एक इंसान के रूप में उसकी सभी कमजोरियों और आकांक्षाओं के साथ चित्रित करता है. विभिन्न समूहों द्वारा इस नाटक का सफलतापूर्वक मंचन किया गया है.‘

हालांकि सिन्हा द्वारा की गई इन दो राजाओं के बीच की यह तुलना बिहार के शिक्षाविदों द्वारा खारिज कर दी गई है – पटना विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास के पूर्व प्रोफेसर, डॉ जयदेव मिश्रा ने गुरुवार को दावा किया कि ‘दोनों, औरंगजेब और सम्राट अशोक, की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि औरंगजेब ने कभी भी सम्राट अशोक के सामान विशाल भूमि पर शासन नहीं किया था – फिर भी इन लेखक की टिप्पणियों के राजनीतिक परिणाम और भी अहम माने जा रहे है.

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जद (यू) के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह, जो फ़िलहाल कोविड पॉजिटिव रिपोर्ट आने के बाद से क्वारंटाइन में हैं, ने बुधवार को एक वीडियो बयान जारी कर मांग की कि ‘भारत के राष्ट्रपति, केंद्र सरकार और प्रधान मंत्री’ को सिन्हा को दिए गए पद्म श्री पुरस्कार को वापस ले लेना चाहिए.’ यह आरोप लगाते हुए कि इस साक्षात्कार ने केंद्र द्वारा देश के इतिहास को फिर से लिखने के प्रयास का संकेत दिया है, ललन सिंह ने कहा, ‘जो कोई भी हमारे देश के ऐतिहासिक प्रतीकों का अपमान करता है, वह किसी भी राष्ट्रीय पुरस्कार के लायक नहीं हो सकता.’

ललन सिंह ने आगे कहा है, ‘सम्राट अशोक महान अखंड भारत के निर्माता थे. अशोक स्तंभ और अशोक चक्र हमारी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा हैं. ऐसे व्यक्तित्व के विरुद्ध अपमानजनक शब्दों का प्रयोग कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता. जो कोई भी उनका अपमान करता है, वह एक विकृत विचारधारा का हिस्सा है.’

गुरुवार को जद (यू) के एक विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) ने अपना नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर दिप्रिंट को बताया, ‘सिन्हा वर्तमान केंद्रीय शासन के तहत इतने सारे पुरस्कार कैसे जीत सकते हैं?’


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सिन्हा के भाजपा से तथाकथित संबंध

सम्राट अशोक के बारे में सिन्हा की टिप्पणी भाजपा के लिए अधिक परेशान करने वाली है क्योंकि उनका का इस पार्टी से पुराना ‘जुड़ाव’ है.

भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने अपना नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि सिन्हा 2004 में भाजपा के सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय संयोजक थे और कई भाजपा नेताओं के करीबी भी थे. इस नेता ने आगे कहा, ‘हालांकि, 2010 के बाद से उनका भाजपा से कोई संबंध नहीं है.’

इस 86 वर्षीय लेखक को ‘एक कमजोर वृद्ध पुरुष’ करार देते हुए, इस भाजपा नेता ने दावा किया: ‘सिन्हा साहित्य पुरस्कार, एक ऐसा सम्मान है जिस पर पहले सिर्फ वामपंथी लेखकों का वर्चस्व था, पाने वाले पहले राष्ट्रवादी लेखक हैं .’

हालांकि, सिन्हा की टिप्पणियों के खिलाफ हो रही तीव्र प्रतिक्रिया ने भाजपा के कई नेताओं को डैमेज कंट्रोल मोड (नुकसान की भरपाई की कोशिश) अपनाने के लिए विवश कर दिया है. एक ओर जहां बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल ने गुरुवार को सिन्हा के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज करवाई जिसमें आरोप लगाया गया है कि यह नाटककार नफरत फैला रहे हैं, वहीं भाजपा के अन्य लोगों ने पार्टी और लेखक सिन्हा के बीच किसी भी तरह के संबंध की बात को तुरत-फुरत में खारिज कर दिया.

भाजपा के राज्यसभा सांसद और बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने गुरुवार को दिप्रिंट को बताया, ‘सम्राट अशोक की तुलना औरंगजेब जैसे क्रूर शासक से किया जाना बेहद निंदनीय है.’ उन्होंने यह भी दावा किया कि भाजपा का ‘राष्ट्रीय स्तर पर कोई सांस्कृतिक प्रकोष्ठ नहीं है और सिन्हा का भाजपा से कोई संबंध नहीं है’.


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वह साल जब सम्राट अशोक बन गए थे कुशवाहा जाति के प्रतीक

सम्राट अशोक को लेकर जद (यू) और भाजपा के बीच मतभेद होना कोई नई बात नहीं है. 2015 में, जब वे एक-दूसरे के खिलाफ खड़े थे, तो भाजपा को इस पुरातन राजा के रूप में एक नया जातीय चिह्न मिल गया था.

उस वर्ष, भाजपा ने इस प्राचीन काल के शासक की 2,320 वीं जयंती मनाई थी, और तत्कालीन केंद्रीय दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद ने घोषणा की थी कि अगर उनकी पार्टी उस वर्ष के बिहार विधानसभा चुनाव में जीतती है तो इस सम्राट के नाम पर एक डाक टिकट जारी की जाएगी.

उस वक्त भाजपा की निगाहें इस राज्य के ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) वाले वोट बैंक पर टिकी थी – यह एक ऐसा वर्ग है जो परंपरागत रूप से जद (यू) के समर्थन आधार वाला है.

वह (भाजपा) कुर्मी और कुशवाहा जातियों वाले जद (यू) के वोट बैंक – जिसे बिहार में लव-कुश संयोजन के रूप में जाना जाता है- में अपनी पैठ बनाना चाहती थी. चूंकि नीतीश कुमार खुद कुर्मी जाति (बिहार की जनसंख्या का 2 फीसदी) से आते हैं, इसलिए भाजपा कुशवाहों (जनसंख्या के करीब 8 फीसदी) को लुभाने के लिए बेताब थी.

इसे उद्देश्य से भाजपा ने कुशवाहा जाति के बीच से उभरी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी से हाथ मिलाया, जबकि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की राजद ने कांग्रेस के साथ गठबंधन किया था.

उस चुनाव के लिए भाजपा की रणनीति का एक हिस्सा सम्राट अशोक को एक कुशवाहा शासक के रूप में पेश करने के इर्द-गिर्द घूमता था. यह एक ऐसा मामला था जिस पर कुछ लोगों का पहले से ही विश्वास था. सम्राट अशोक का एक कुशवाहा नेता के रूप में प्रचार किये जाने के प्रयासों ने इतिहासकार रोमिला थापर को उस समय यह टिप्पणी करने के लिए प्रेरित किया था कि अशोक की जाति के बारे में कोई ऐतिहासिक प्रमाण कभी नहीं मिला था.

इस बारे में गुरुवार को दिप्रिंट से बात करते हुए, पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जयदेव मिश्रा ने कहा, ‘वैसे तो उनकी जाति का कोई प्रमाण नहीं है, लेकिन आमतौर पर यह माना जाता है कि वह एक कृषक समुदाय से थे.’

हालांकि (भाजपा का) 2015 का वाला प्रयास विफल रहा, और भाजपा के नेतृत्व वाला राजग, जद (यू)-राजद-कांग्रेस के महागठबंधन से सात प्रतिशत मतों के बड़े अंतर से हार गया था, पर कुछ भाजपा नेताओं का आरोप है कि जद (यू) अपने वोट बैंक में सेंध लगाने के भाजपा के प्रयासों के बारे में नाखुश बनी हुई है.

इस बात का संकेत देते हुए कि दया प्रकाश सिन्हा ने सम्राट अशोक के खिलाफ अपनी टिप्पणियों के द्वारा जद (यू) को 2015 के प्रयासों के लिए भाजपा पर जवाबी वार का मौका दिया है, भाजपा के एक सांसद- जो अपना नाम गुप्त रखना चाहते थे – ने कहा, ‘जब हम गठबंधन में होते हैं, तब भी नीतीश जी हम से अगड़ी जाति के वोटों की परवाह करने की उम्मीद करते हैं, जबकि वे स्वयं ओबीसी और ईबीसी वोटों की देखभाल करते हैं. ओबीसी वोट बैंक को मजबूत करने के हमारे किसी भी प्रयास को नाकाम कर दिया जाता है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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