Saturday, 21 May, 2022
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कैसे बेलगावी को लेकर महाराष्ट्र-कर्नाटक के दशकों पुराने झगड़े को एक झड़प ने फिर से जिंदा कर दिया

पिछले हफ्ते मूर्तियों को तोड़ा गया और कन्नड़ और मराठी समूहों के बीच झड़पें हुई, एक पुराना सीमा-विवाद फिर भड़क गया है. हालांकि विधायिका ने सख्त कार्रवाई का वादा किया है.

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बेंगलुरू: कर्नाटक विधान सभा ने सोमवार को सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर दिया, जिसके तहत महाराष्ट्र के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद के पिछले सप्ताह भड़क उठने पर, तोड़फोड़ व हिंसा की घटनाओं में आई वृद्धि के खिलाफ, देश द्रोह के मुकदमे चलाए जाएंगे और ‘गुण्डा एक्ट’ लगाया जाएगा.

मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई ने विधानसभा में कहा, ‘हम एक इंच ज़मीन भी किसी को नहीं देंगे. बल्कि, अगर महाराष्ट्र के कन्नड़-भाषी गांवों के लोगों को हमारी सहायता चाहिए, तो हम आजीविका जुटाने में उनकी मदद करेंगे. हम उन गांवों को कर्नाटक में शमिल करने के लिए भी तैयार हैं अगर लोग इस आशय का प्रस्ताव पारित कर दें’.

उन्होंने फौरन ही स्वीकार किया कि वो जानते हैं कि उनके इस बयान से एक विवाद खड़ा हो सकता है. बोम्मई ने फिर एक प्रस्ताव पेश किया, जिसमें राज्य में कई प्रतिष्ठित ऐतिहासिक हस्तियों- संगोली रायन्ना, किट्टूर रानी चेन्नम्मा, बासवन्ना और छत्रपति शिवाजी की प्रतिमाओं को अपवित्र किए जाने और महाराष्ट्र में कन्नड़ ध्वज जलाने तथा उसके जवाब में हुई हिंसा की भर्त्सना की गई थी.

मराठी और कन्नड़ समूहों के बीच के संघर्षों ने, विधान सभा के भीतर और बाहर, क्षेत्रीय गौरव को लेकर एक बहस छेड़ दी है. जहां विपक्षी दलों ने मांग की है कि मराठी-समर्थक संगठन महाराष्ट्र एकीकरण समिति (एमईएस) पर पाबंदी लगाई जाए, वहीं कर्नाटक की बीजेपी सरकार ने कहा है कि क़ानून अपना काम करेगा.

जहां शिवसेना की अगुवाई वाली महाराष्ट्र सरकार के साथ गठबंधन ने, कांग्रेस के सामने भाषाई संघर्ष को लेकर मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, वहीं एमईएस के साथ बीजेपी की निकटता और शिवाजी जैसी मराठा हस्तियों के साथ उसके मज़बूत जुड़ाव ने, सत्तारूढ़ पार्टी के लिए भी कठिन स्थिति पैदा कर दी है.

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तोड़फोड़ की घटनाएं क्यों बढ़ीं

एमईएस- कभी बेलगावी में एक मज़बूत ताक़त जिसकी प्रसिद्धि अब घट रही है- एक राजनीतिक पार्टी है जिसका लक्ष्य बेलगावी शहर समेत, कर्नाटक के कुछ हिस्सों का महाराष्ट्र में विलय करना है.

ये सितंबर 2006 से विरोध प्रदर्शन करती आ रही है, जब बेलगावी में पहली बार कर्नाटक विधान सभा की बैठक हुई थी. सीमा विवाद को ख़त्म करने की कोशिश में, बेलगावी पर अपना नियंत्रण जताने के लिए, 2012 में राज्य सरकार ने वहां अपने एक सचिवालय- सुवर्णा सौधा का उद्घाटन किया था.उसके बाद से क्रमिक सरकारें वहां पर विधान सभा के शीत सत्र आयोजित करती आई हैं.

पिछले सप्ताह, एमईएस सदस्यों ने 13 दिसंबर को बेलगावी में कर्नाटक विधान सभा सत्र आयोजित किए जाने के खिलाफ प्रदर्शन किया, जिससे घटनाओं का सिलसिला शुरू हो गया और दशकों पुराना सीमा विवाद फिर से भड़क उठा.

तोड़फोड़ और जवाबी कार्रवाइयों की बाढ़ में, एमईएस सदस्य और कन्नड़-समर्थक संगठन एक दूसरे से टकरा रहे हैं, जिससे दो राज्यों के बीच सीमा विवाद फिर से भड़क गया है.

कर्नाटक में अभी तक 30 से अधिक लोग गिरफ्तार किए जा चुके हैं, और कर्नाटक सरकार ने ये भी मांग की है, कि जिन लोगों ने कन्नड़ ध्वज को जलाया, और महाराष्ट्र में कन्नड़-भाषी लोगों की संपत्तियों को नुक़सान पहुंचाया उन्हें गिरफ्तार किया जाना चाहिए. हिंसा पर एक रिपोर्ट केंद्रीय गृह मंत्रालय को भेज दी गई है.

इन घटनाओं के बाद बेलगावी में निषेधात्मक आदेश लागू कर दिए गए हैं, और विधान सभा ने प्रस्ताव पारित किया है, कि इनमें फंसे लोगों के खिलाफ ‘देशद्रोह क़ानून’ और ‘ग़ुण्डा एक्ट’ के तहत आरोप तय किए जाएं.

संघर्ष का इतिहास

कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच का सीमा विवाद दशकों पुराना है. दो क़ानून, एक आयोग और अदालतों में कई याचिकाओं के बाद भी, ये विवाद दो पड़ोसी राज्यों के बीच झगड़े की जड़ बना हुआ है.

औपनिवेशिक काल में कई ज़िले जो अब कर्नाटक में हैं- विजयपुरा, बेलगावी, धारवाड़ और उत्तर कन्नड़- भूतपूर्व बॉम्बे प्रेसिडेंसी का हिस्सा थे. ये स्थिति 1956 तक चलती रही, जब राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन किया गया.

राज्य पुनर्गठन अधिनियम,1956, के अंतर्गत, बॉम्बे प्रेसिडेंसी के बेलगावी और 10 अन्य ताल्लुक़ों को, मैसूर प्रांत का हिस्सा समझ लिया गया, जिसका नाम 1973 में बदलकर कर्नाटक कर दिया गया. ये फैसला 1881 की एक जनगणना पर आधारित था, जिसमें बेलगावी की 64.39 प्रतिशत आबादी की कन्नड़-भाषी और 26.04 प्रतिशत बादी की मराठी-भाषी के तौर पर पहचान की गई थी.

लेकिन, क्षेत्र की मराठी-भाषी आबादी ने इन आंकड़ों को ख़ारिज कर दिया था, जिनका दावा था कि अब उनकी संख्या कन्नड़ बोलने वालों से ज़्यादा है. महाराष्ट्र सरकार ने 1957 में केंद्र सरकार के पास अपनी चिंताएं दर्ज करा दीं थीं.

महाराष्ट्र ने राज्य पुनर्गठन अधिनियम की धारा 21(2)(बी) के तहत, मराठी और कोंकण-भाषी क्षेत्रों को, कर्नाटक में शामिल किए जाने पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई. केंद्रीय गृह मंत्रालय को अपने ज्ञापन में, महाराष्ट्र ने 814 गांवों और बेलगावी, कारवाड़, तथा निप्पानी की तीन शहरी बस्तियों के 2,806 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर निरंतरता, भाषाई बहुमत, और ‘लोगों की इच्छा’ के आधार पर अपना दावा जताया.


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महाजन आयोग रिपोर्ट ‘अभी लागू होना बाक़ी’

1966 में केंद्र सरकार ने कर्नाटक और महाराष्ट्र के बीच सीमा विवाद के दावों पर ग़ौर करने के लिए महाजन आयोग का गठन किया. 2,200 ज्ञापन प्राप्त करने और 7,500 से अधिक लोगों से मुलाक़ात करने के बाद, भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश मेहर चंद महाजन की अध्यक्षता में, आयोग ने अगस्त 1967 में अपनी रिपोर्ट पेश कर दी. जब तक रिपोर्ट संसद में पेश गई, तब तक 1972 आ चुका था.

रिपोर्ट ने कर्नाटक के 264 मराठी-बहुल गांवों को, महाराष्ट्र में शामिल करने की सिफारिश की, लेकिन इस बात पर ज़ोर दिया कि बेलगावी और 247 गांव कर्नाटक में ही बने रहेंगे.

महाराष्ट्र ने रिपोर्ट को ख़ारिज कर दिया और समीक्षा की मांग की लेकिन कर्नाटक ने उसे स्वीकार कर लिया.

उसके बाद से कई दशक बीत चुके हैं, लेकिन केंद्र सरकार ने अभी तक सिफारिशों को औपचारिक रूप से लागू नही किया है. इस बीच सीमा विवाद के चलते बेलगावी, पिछले कुछ सालों में हिंसक संघर्षों का केंद्र बन गया.

2004 में, महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया, और संविधान की धारा 131(बी) के तहत- जिसमें राज्यों अथवा राज्यों व केंद्र के बीच विवादों की सूरत में, शीर्ष अदालत को मूल-न्यायाधिकार दिया गया है- विवाद के निपटारे की मांग की और कर्नाटक के 814 गांवों पर अपना दावा पेश किया.

ये मामला भी भी शीर्ष अदालत में लंबित है. 2019 में, महाराष्ट्र मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने दो मंत्रियों छगन भुजबल और एकनाथ शिंदे को, याचिका को तेज़ी से आगे बढ़ाने के राज्य के प्रयासों की निगानी के लिए नियुक्त किया.

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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