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Wednesday, 12 June, 2024
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हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण या गुर्जर आउटरीच? BJP ने राजस्थान के टोंक में चुनावी तैयारी के लिए बिधूड़ी को क्यों चुना

दक्षिण दिल्ली के सांसद रमेश बिधूड़ी को नई जिम्मेदारी संसद में बसपा के दानिश अली के खिलाफ दी गई भड़काऊ टिप्पणी करने के कुछ दिनों बाद मिली है. टोंक शहर की आबादी में मुसलमानों की संख्या 47.18% है.

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नई दिल्ली: कांग्रेस नेताओं और स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषकों का दावा है कि दक्षिणी दिल्ली के सांसद रमेश बिधूड़ी को राजस्थान के टोंक जिले का प्रभार देने का भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का फैसला हिंदू-मुस्लिम आधार पर मतदाताओं का “ध्रुवीकरण” करना है, न कि गुर्जरों को लुभाने के लिए.

संसद के विशेष सत्र में बहुजन समाज पार्टी के सांसद दानिश अली के खिलाफ असंसदीय भाषा का इस्तेमाल करने के बाद बिधूड़ी राजनीतिक तूफान में घिर गए हैं. बाद में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को लिखे पत्र में अली ने बिधूड़ी पर “मुस्लिम विरोधी टिप्पणी” करने का आरोप लगाया. हालांकि, बिधूड़ी की टिप्पणियों को बाद में लोकसभा अध्यक्ष ने हटा दिया और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भाजपा सांसद द्वारा की गई टिप्पणियों के लिए माफी भी मांगी थी.

बिधूड़ी को चुनावी राज्य में टोंक जिले का प्रभार देकर पुरस्कृत करने के भाजपा के फैसले की विपक्षी दलों ने आलोचना की. बिधूड़ी एक गुर्जर नेता हैं और उनकी नियुक्ति को भाजपा द्वारा गुर्जरों को लुभाने के प्रयास के रूप में देखा गया है, जो टोंक और आसपास के जिलों में आबादी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. कांग्रेस नेता सचिन पायलट, जो विधानसभा में टोंक का प्रतिनिधित्व करते हैं, के बारे में कहा जाता है कि उनका गुर्जर समुदाय पर अधिक प्रभाव है.

राजनीतिक विश्लेषक राजीव गुप्ता का कहना है कि बिधूड़ी की नई भूमिका राजस्थान की मुस्लिम आबादी को ध्यान में रखकर सौंपी गई है. गुप्ता ने कहा, “चूंकि टोंक काफी मुस्लिम आबादी वाला क्षेत्र है, इसलिए भाजपा ने सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने के लिए बिधूड़ी को तैनात किया है.” “बिधूड़ी को टोंक में कोई नहीं जानता है. इसलिए, यह तर्क कि उन्हें गुर्जर वोट पाने के लिए पायलट के खिलाफ खड़ा किया गया है, इसका कोई मतलब नहीं है.

टोंक जिले में जहां मुस्लिम आबादी 10.77 प्रतिशत है, वहीं टोंक शहर में यह 47.18 प्रतिशत है. दूसरी ओर, टोंक तहसील में मुस्लिम आबादी 29.25 प्रतिशत है. टोंक जिले में जिसमें निवाई, टोंक, देवली और मालपुरा के चार विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं -उसमें अन्य दो प्रमुख समुदाय गुर्जर और मीना शामिल हैं.

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मालपुरा जैसे जिले के कुछ इलाकों में भी सांप्रदायिक हिंसा भड़कने का इतिहास रहा है. उदाहरण के लिए, 1992 में, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भीड़ द्वारा किए गए नरसंहार में 22 लोग मारे गए थे. इसका असर जुलाई, 2000 में भी महसूस किया गया जब भीड़ का नेतृत्व करने वाले भाजपा नेता कैलाश माली की हत्या कर दी गई. इसके बाद सांप्रदायिक झड़पों में 12 लोग मारे गए. इसी साल अप्रैल में ईद के दौरान मालपुरा में हिंदू और मुस्लिमों के बीच पथराव हुआ था.

दिप्रिंट से बात करते हुए, राजस्थान कांग्रेस के महासचिव जसवन्त गुर्जर ने कहा कि बिधूड़ी की नियुक्ति भाजपा की “द्विअर्थी” और “सांप्रदायिक राजनीति” में शामिल होने की प्रवृत्ति की ओर इशारा करती है.

“बिधूड़ी के संसद में बोलने के बाद, उनकी पार्टी के नेताओं ने माफ़ी मांगी. उन्होंने कहा कि उन्हें कारण बताओ नोटिस दिया गया है. लेकिन दूसरी ओर उन्हें जिम्मेदारी का नया पद दिया गया है. इससे पता चलता है कि बीजेपी टोंक में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करना चाहती है.”

हालांकि, उन्होंने कहा कि एक गुर्जर नेता के तौर पर बिधूड़ी पायलट से मेल नहीं खाते हैं.

उन्होंने कहा, “राजेश पायलट राजस्थान में सबसे बड़े गुर्जर चेहरों में से एक थे. अब उनके बेटे सचिन पायलट न सिर्फ राजस्थान में एक बड़ा नाम हैं, बल्कि देशभर में एक बड़ा गुर्जर चेहरा भी हैं. बिधूड़ी गुर्जर वोटों को पायलट के खिलाफ नहीं कर सकते.”

गुर्जरों और मीनाओं के बीच प्रतिद्वंद्विता का इतिहास है, जो अक्सर हिंसा का कारण बनती है. अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के रूप में वर्गीकृत गुर्जरों ने अतीत में अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा देने की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था, इस मांग का एसटी मीनाओं ने विरोध किया था. दोनों समुदायों का राज्य की कम से कम 30 विधानसभा सीटों पर दबदबा है.

टोंक के अलावा पड़ोसी जिले सवाई माधोपुर में भी गुर्जर-मीणा जाति की राजनीति चलती है. हालांकि, 2017 के विधानसभा चुनाव में, दोनों समुदाय, जो कुल मिलाकर राज्य की आबादी का लगभग 16 प्रतिशत हैं, कांग्रेस के पीछे लामबंद हो गए. यह आंशिक रूप से पायलट के प्रयासों के कारण ही हो पाया था, जो उस समय पार्टी के राज्य प्रमुख थे. जबकि गुर्जर उन्हें एक सामुदायिक नेता के रूप में देखते थे, उनके नेता किरोड़ी लाल मीणा के भाजपा में चले जाने के बावजूद, मीणाओं ने पार्टी का समर्थन करना जारी रखा.

“यह टोंक में हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण करने के लिए भाजपा द्वारा डिजाइन किया गया है. इस पर नवाबों का शासन था और यहां मुसलमानों का बड़ा प्रभाव है. राजनीतिक विश्लेषक नारायण बरेठ ने बताया कि मालपुरा क्षेत्र सांप्रदायिक रूप से बहुत संवेदनशील है. “यह क्षेत्र अजमेर की सीमा से भी सटा हुआ है, जो जहां मुस्लिम अपना प्रभुत्व रखते हैं. इसलिए, बीजेपी को लगता है कि बिधूड़ी वहां भी उनकी मदद कर सकते हैं.”

एक अन्य राजनीतिक विश्लेषक ओम सैनी ने कहा, “1980 तक, टोंक ने किसी मुस्लिम को नहीं चुना था. ऐसा इसलिए क्योंकि नवाबी शासन से प्रभावित इलाके के मुसलमान चुनावी लोकतंत्र में ज्यादा विश्वास नहीं रखते थे. 1985 में कांग्रेस से जकिया इनाम टोंक से विधायक चुनी गईं. तभी टोंक में मुसलमानों ने अपनी चुनावी शक्ति का प्रयोग करना शुरू कर दिया. ”

सैनी ने आगे कहा, “ऐसा लगता है कि वे बिधूड़ी को हाथापाई करने के लिए लाए हैं. हिंदू भावनाएं बढ़ेंगी और मुसलमान वोट देने के लिए बाहर नहीं आएंगे. इससे चीजें भाजपा के पक्ष में हो जाएंगी.”

दिप्रिंट ने कॉल के जरिए टिप्पणी के लिए बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष मुकेश दाधीच से संपर्क किया, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली. प्रतिक्रिया मिलने पर इस रिपोर्ट को अपडेट किया जाएगा.

(संपादन: पूजा मेहरोत्रा)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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