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Friday, 21 June, 2024
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NSUI से कांग्रेस के कोषाध्यक्ष तक: गांधी परिवार के वफादार अजय माकन के राजनीतिक करियर में कई मोड़ आए हैं

कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि कांग्रेस के कोषाध्यक्ष के रूप में अजय माकन की नियुक्ति ने पार्टी पर गांधी परिवार की पकड़ को और मजबूत कर दिया है. कोषाध्यक्ष पार्टी में अध्यक्ष के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण पद माना जाता है.

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नई दिल्ली: कांग्रेस नेता अजय माकन लोकसभा चुनाव हार गए थे और पार्टी की आंतरिक राजनीति के कारण राज्यसभा सीट से भी चूक गए. पिछले साल उन्होंने राजस्थान के प्रभारी महासचिव का पद छोड़ दिया जब शीर्ष नेतृत्व ने राज्य के विद्रोही नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था. वह समय माकन के राजनीतिक करियर के सबसे खराब समय में से एक रहा होगा. एक वक्त था जब वह 2003 में 39 वर्ष की आयु में दिल्ली विधानसभा के सबसे कम उम्र के अध्यक्ष बने थे.

माकन के एक करीबी सूत्र ने दिप्रिंट से कहा, “यह वह समय था जब वह कांग्रेस हलकों में एक उभरता हुआ सितारा थे. वह तीन बार विधायक रहे. वह दिल्ली सरकार में मंत्री और AICC (अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी) सचिव रहे थे. उन्हें मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के बाद दूसरे नंबर का नेता माना जाता था. लेकिन बाद में जब उन्हें विधानसभा स्पीकर बनाया गया तो यह एक प्रकार से उन्हें रिटायर करने जैसा था.”

लेकिन माकन ने इसके बाद केंद्र सरकार और पार्टी दोनों में कई जिम्मेदारियां निभाईं. सबसे नवीनतम नियुक्ति रविवार को AICC के कोषाध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति थी. यह पद पार्टी में अध्यक्ष के बाद संगठन के प्रभारी महासचिव के साथ दूसरा सबसे बड़ा पद माना जाता है.

सूत्रों का कहना है कि इस कदम पर, जिस पर गांधी परिवार की मुहर है, शायद एक साल लग गया हो. उनका दावा है कि मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने से पहले ही इसकी योजना बनाई गई थी.

इस नियुक्ति के साथ, तीसरी पीढ़ी के राजनेता और गांधी परिवार के करीबी विश्वासपात्र माने जाने वाले माकन उन कांग्रेस नेताओं की प्रतिष्ठित सूची में शामिल हो गए हैं, जिन्होंने उनसे पहले यह भूमिका निभाई हैं. इसमें सीताराम केसरी, प्रणब मुखर्जी, अहमद पटेल और मोतीलाल वोहरा जैसे नेता शामिल हैं.

एक तरह से यह उनकी राजनीतिक यात्रा को शीर्ष की ओर ले जाता है.

1984 में, उन्हें कांग्रेस की छात्र शाखा, नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI) के कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था. अगले चार दशकों में दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति, शीला दीक्षित के नेतृत्व में और उनके खिलाफ राजधानी के सत्ता गलियारों में घूमना और यूपीए सरकार में मंत्री के रूप में काम करना शामिल रहा. लेकिन भले ही माकन कई बार आउट हुए हों, लेकिन वे कभी पूरी तरह से आउट नहीं हुए.


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शीला दीक्षित के शिष्य और आलोचक

1985 में, हंसराज कॉलेज में पढ़ाई के दौरान अजय माकन को दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (DUSU) का अध्यक्ष चुना गया. वह इस पद तक पहुंचने वाले पहले NSUI सदस्य थे. लेकिन यह भी त्रासदी भरा साल था. उनके चाचा, ललित माकन, एक सांसद, की 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सिख विरोधी दंगों में उनकी कथित संलिप्तता के प्रतिशोध के रूप में तीन सिख आतंकवादियों ने हत्या कर दी थी.

हालांकि, अजय माकन राजनीतिक सीढ़ी चढ़ते रहे और अगले कुछ सालों में भारतीय युवा कांग्रेस और दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी (DPCC) में पदों पर रहे.

1993 में, उन्होंने दिल्ली के राजौरी गार्डन से चुनाव लड़कर विधानसभा चुनाव में अपनी शुरुआत की. उन्होंने 1998 और 2003 में इस सीट से लगातार जीत हासिल की.

अपने पिता के विपरीत, जिन्होंने पहली और एकमात्र बार 1973 में उपचुनाव में चुनाव लड़ा था, अजय माकन कभी भी रुकने वाले राजनेता नहीं थे.

1998 में उनकी विधानसभा जीत के बाद, उन्हें तत्कालीन सीएम शीला दीक्षित के संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया गया था और उन्हें उनका शिष्य माना जाता था. इसके बाद, 2001 में, उन्हें दिल्ली सरकार में बिजली, परिवहन और पर्यटन मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया और उन्हें स्वच्छ हवा और बिजली निजीकरण पर दीक्षित की पसंदीदा परियोजनाओं को लागू करने का काम सौंपा गया. ऐसे समय में जब उत्तर प्रदेश से “बाहरी” के रूप में शीला दीक्षित के दिल्ली की राजनीति में प्रवेश ने दिल्ली इकाई में कई लोगों को नाराज कर दिया था, माकन को उनके भरोसेमंद लेफ्टिनेंट के रूप में देखा गया था.

शीला दीक्षित के साथ अजय माकन | फोटो: Facebook/@Ajay Maken

हालांकि, शीला दीक्षित के बेटे संदीप दीक्षित के राजनीतिक मैदान में उतरने के बाद रिश्ते में दरारें आने लगीं.

2004 के लोकसभा चुनावों में माकन को पश्चिमी दिल्ली के बजाय अपेक्षाकृत कठिन नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ाया गया, जहां से वह विधायक थे.

संदीप दीक्षित को पूर्वी दिल्ली सीट दी गई. दोनों जीते, लेकिन माकन की जीत 1,200 वोटों के मामूली अंतर से हुई.

यह पहली बार था जब उन्होंने संसद में प्रवेश किया.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, उस समय माकन संदीप के जल्दी आगे बढ़ने से नाखुश थे. उन्होंने कहा कि उन्हें लगता है कि उनके पास संदीप की तुलना में अधिक राजनीतिक और चुनावी अनुभव है और वह अपने बेटे के राजनीतिक करियर को बढ़ावा देने के लिए शीला दीक्षित के फैसले से नाखुश थे.

तब से, दिल्ली कांग्रेस के भीतर स्पष्ट विभाजन हो गया. माकन मुख्यमंत्री के खिलाफ एक गुट का नेतृत्व कर रहे थे. 2005 में, DPCC के भीतर माकन और जगदीश टाइटलर दोनों खेमों के दबाव के कारण, शीला दीक्षित को बिजली दरों में बढ़ोतरी को वापस लेने का आदेश देना पड़ा. उस समय की रिपोर्ट्स में दावा किया गया था कि माकन ने स्थिति से निपटने को “कुप्रबंधन” बताते हुए आंतरिक रूप से सीएम के इस्तीफे की मांग की थी.

सालों बाद, जब 2015 में माकन DPCC के प्रमुख बने, तो संदीप दीक्षित ने उन पर अपनी मां को बदनाम करने की साजिश रचने का आरोप लगाया. संदीप ने कहा कि माकन पत्रकारों को उनकी मां के खिलाफ न्यूज़ लिखने के लिए प्रेरित कर रहे थे. यह पार्टी के दिल्ली नेतृत्व के लिए गंभीर चिंता का विषय था.

उस समय, शीला दीक्षित ने पहले 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव और फिर 2017 के नगर पालिका चुनावों में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन के लिए भी माकन को ही दोषी ठहराया था.

हालांकि, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी (AAP) दोनों को एक साथ लाने में सहायक बनी. 2018 में, “लाभ के पद” के आरोपों के कारण 20 AAP विधायकों को दिल्ली विधानसभा से अयोग्य घोषित किए जाने के बाद दीक्षित और माकन ने संयुक्त मोर्चा बनाया. उस समय, कांग्रेस को राजनीतिक लाभ प्राप्त करने का अवसर मिला.


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गांधी परिवार के विश्वासपात्र

इन सालों में अजय माकन की गांधी परिवार से नजदीकियां बढ़ीं. सूत्रों का कहना है कि वह तब भी कांग्रेस अध्यक्ष पद के दावेदार थे जब राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत दौड़ से हट गए थे.

माकन राहुल गांधी के “युवा तुर्कों” में से एक थे जो 2004 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे. माकन तब 40 साल के थे.

इस ग्रुप में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, मिलिंद देवड़ा और जितेन प्रसाद जैसे नेता भी शामिल थे. उस समय उन्हें कांग्रेस पार्टी की नई पीढ़ी के रूप में देखा जाता था. हालांकि, सिंधिया, सिंह और प्रसाद कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए हैं. बाकी लोगों में से केवल माकन और पायलट ही अभी भी पार्टी में महत्वपूर्ण पदों पर हैं.

Ajay Maken
कांग्रेस नेता अजय माकन | फाइल फोटो: ThePrint

कांग्रेस के एक अंदरूनी सूत्र ने दिप्रिंट से कहा, “वह 2004 में पहली बार संसद के लिए चुने गए, लेकिन उन्हें ग्रुप के अन्य लोगों के साथ बराबरी करना पसंद नहीं था. उनका मानना ​​था कि उनके पास उनसे ज्यादा चुनावी और राजनीतिक अनुभव है. हालांकि, उन्होंने कभी भी गांधी परिवार के बारे में बुरा नहीं कहा. उन्हें पता था कि कब क्या कहना है और इसी वजह से UPA और पार्टी दोनों में उनकी पदोन्नति हुई.”

2006 में, माकन को केंद्रीय शहरी विकास राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया था. इसके बाद 2009 में पी.चिदंबरम के नेतृत्व में उन्हें गृह राज्य मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया और फिर 2011 में राष्ट्रमंडल खेल भ्रष्टाचार घोटाला सामने आने के तुरंत बाद उन्हें खेल और युवा मामलों के लिए राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के रूप में नियुक्त किया गया.

2012 में, वह सरकार में सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने जब उन्हें आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन मंत्री बनाया गया. यह UPA सरकार में माकन का आखिरी कार्यकाल था.

2013 में, उन्होंने अनुभवी कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी की जगह संचार के प्रभारी महासचिव के रूप में AICC में वापसी की.

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि माकन के राहुल गांधी के साथ घनिष्ठ संबंध और 2014 के चुनावों से पहले उनकी छवि बनाने के लिए एक विश्वसनीय सहयोगी की आवश्यकता इस कदम का कारण थी.

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, “यह कहना मुश्किल है कि गांधी परिवार के साथ उनका संबंध किस कारण से हुआ. शायद इसलिए कि दोनों परिवारों में हत्याएं हुईं. लेकिन माकन हमेशा उनके गुड बुक में रहे हैं.”

नेता ने आगे आरोप लगाया कि वह कुख्यात घटना जहां राहुल गांधी ने 2013 में UPA द्वारा घोषित अध्यादेश को खारिज कर दिया था, असल में वह माकन का आईडिया था.

राहुल गांधी ने इस अध्यादेश की कड़ी आलोचना की थी. इस अध्यादेश का उद्देश्य न्यूनतम दो साल की सजा पाने पर सांसदों और विधायकों को उनकी सीटों से अयोग्य ठहराने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना था.

अध्यादेश के खिलाफ गांधी का भाषण नई दिल्ली के प्रेस क्लब में हुआ, जिसमें माकन उनके बगल में बैठे थे.

नेता ने कहा, “उस समय उन्होंने सोचा था कि यह राहुल गांधी को एक बड़े नेता के रूप में स्थापित करेगा और उन्हें 2014 से पहले कुछ लाभ देगा. लेकिन दुर्भाग्य से, इसका उल्टा असर हुआ.”

हालांकि, उन्होंने कहा कि प्रमुख पदों पर वफादारों की उपस्थिति को देखते हुए राहुल गांधी की “पार्टी पर पकड़ अब पूरी हो गई है”. इसमें कोषाध्यक्ष के रूप में माकन, महासचिव (संगठन) के रूप में केसी वेणुगोपाल और साथ ही AICC में रणदीप सुरजेवाला और जितेंद्र सिंह जैसे राहुल के करीबी नेता शामिल हैं.


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राजस्थान में विवाद

संचार के प्रभारी महासचिव के रूप में उनके कार्यकाल के बाद, माकन को 2015 में DPCC प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था. वह 2019 तक इस पद पर रहे और 2020 में उन्हें राजस्थान का प्रभारी महासचिव नियुक्त किया गया.

जून 2022 में उन्हें पार्टी ने हरियाणा से राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतारा. हालांकि, कांग्रेस विधायकों द्वारा क्रॉस वोटिंग के कारण मीडिया दिग्गज कार्तिकेय शर्मा के खिलाफ उनकी हार हुई.

हालांकि, वह पिछले साल 25 सितंबर की चर्चित घटना तक राजस्थान के महासचिव बने रहे.

उस दिन माकन और मल्लिकार्जुन खड़गे (जो उस समय पार्टी अध्यक्ष नहीं थे) ने जयपुर में कांग्रेस विधायक दल (CLP) की बैठक बुलाई थी.

हालांकि, सीएम अशोक गहलोत के वफादार करीब 90 विधायकों ने बैठक का बहिष्कार किया और एक समानांतर बैठक की. CLP बैठक का एजेंडा कांग्रेस अध्यक्ष को राजस्थान का नया सीएम चुनने के लिए अधिकृत करने वाला एक पंक्ति का प्रस्ताव पारित करना था, क्योंकि गहलोत को अध्यक्ष पद के लिए अपना नामांकन दाखिल करना था.

कांग्रेस सूत्रों ने कहा कि आलाकमान दिल्ली में गहलोत को पार्टी का अध्यक्ष और राजस्थान में सचिन पायलट को सीएम बनाना चाह रहा है.

उस घटना के मद्देनजर, जिसके बाद गहलोत को कांग्रेस अध्यक्ष की दौड़ से बाहर होना पड़ा, पार्टी ने राजस्थान के तीन विधायकों: शांति धारीवाल, महेश जोशी और धर्मेंद्र राठौड़ को कारण बताओ नोटिस जारी किया.

इसके तुरंत बाद नवंबर 2022 में माकन ने राजस्थान प्रभारी पद से इस्तीफा दे दिया. उस समय सूत्रों ने कहा कि माकन पायलट समर्थक करार दिए जाने और इस तथ्य से नाराज थे कि उन्हें राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उन विधायकों के साथ काम करना होगा जिन्होंने CLP बैठक के लिए आलाकमान के आदेश का उल्लंघन करके उनका और पार्टी का अपमान किया था. .

कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे को लिखे पत्र में माकन ने पद पर बने रहने में अपनी ”अक्षमता और अनिच्छा” व्यक्त की.

कांग्रेस हलकों में इस इस्तीफे को यात्रा से पहले राज्य में स्थिति को सुलझाने के लिए गांधी समर्थक कदम के रूप में देखा गया.

विशेष रूप से, जब भारत जोड़ो यात्रा ने पिछले साल दिसंबर में राजस्थान में प्रवेश किया था, तो तीन कारण बताओ विधायकों को कोई सजा नहीं दी गई थी. इसके बजाय, उन्हें गुर्जर बहुल इलाकों में भारत जोड़ो यात्रा का प्रभारी बनाया गया जहां पायलट का प्रभाव है.

कांग्रेस नेता ने कहा, “हालांकि अजय माकन इसे हार नहीं मानते हैं. वह कहते हैं कि आगे बढ़ने के लिए आपको कुछ कदम पीछे हटने की ज़रूरत है. कोषाध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति यह दर्शाती है.”

(संपादन : ऋषभ राज)

(इस ख़बर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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