Monday, 27 June, 2022
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बोचहां उपचुनाव से लेकर परशुराम जयंती तक- बिहार में BJP के सामने हैं भूमिहारों को साथ बनाये रखने की चुनौती

सवर्ण भूमिहार, जो भाजपा के मूल मतदाता आधार का हिस्सा रहे हैं, पार्टी से लगातार अलग होते जा रहे हैं और वे अपने पारंपरिक 'दुश्मन' राजद के पाले में चले जाने की कसमें भी खा रहे हैं.

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नई दिल्ली: बिहार में इन दिनों राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कार्यकर्ताओं द्वारा गढ़ा गया एक दिलचस्प राजनैतिक पकवान का नुस्खा घूम रहा है. इसमें कहा गया है, ‘बाभन के चूड़ा, यादव के दही, मिली तब बिहार में हो सब सही.’ – इसका राजनैतिक मतलब यह है कि वास्तव में अगर भूमिहार-ब्राह्मण और यादव मतदाता एक साथ आ जाते हैं, तो बिहार की सभी समस्याओं को ठीक किया जा सकता है.

इस नारे को 3 मई को राजद के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के एक सामाजिक संगठन ‘भूमिहार-ब्राह्मण एकता मंच’ द्वारा आयोजित परशुराम जयंती समारोह में ‘मुख्य अतिथि’ के रूप में शामिल होने के बाद काफी जोर मिला है. यह कार्यक्रम अपने आप में उल्लेखनीय था क्योंकि इसने निश्चित रूप से दोनों समुदायों के बीच की पारंपरिक दुश्मनी के अंत का संकेत दिया है.

भाजपा, जो फिलहाल जनता दल (यूनाइटेड) के साथ एक असहज सत्तारूढ़ गठबंधन में शामिल है, के लिए परंपरागत रूप से विरोधी समीकरण वाली इन दो शक्तिशाली जातियों का एक साथ आना अच्छी खबर नहीं है.

उच्च जाति माने जाने वाले भूमिहार मतदाता, जो राज्य में भाजपा के मूल मतदाता आधार का हिस्सा रहे हैं, पार्टी से लगातार अलग होते जा रहे हैं. बोचहां विधानसभा सीट पर पिछले महीने हुए उपचुनाव में, इस समुदाय ने यादवों और निचली जाति के मल्लाहों का साथ दिया और राजद उम्मीदवार को प्रचंड जीत दिलाई.

बिहार भाजपा नेताओं के अनुसार, यह बदलाव इसलिए है क्योंकि यह समुदाय पार्टी नेतृत्व द्वारा उन्हें दरकिनार किए जाने से नाराज है.

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उदाहरण के तौर पर, पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि भूमिहार समुदाय पार्टी से नाराज हैं और उन्हें मनाने के लिए काम किया जायेगा. हालांकि, उन्होंने यह भी बताया कि ‘किसी भी अन्य राजनीतिक दल ने भूमिहारों को इतना कुछ नहीं दिया जितना की भाजपा ने दिया है’. उन्होंने कहा कि यह बात ‘लोकसभा और विधानसभा दोनों में सीटों की संख्या, और मंत्रिस्तरीय प्रतिनिधित्व पर लागू होती है.

फिर भी, यह समुदाय अभी भी 2020 के राज्य विधानसभा चुनावों और पिछले महीने के विधान परिषद चुनावों के दौरान दिए गए प्रतिनिधित्व के मामले में ठगा सा महसूस करता है. वास्तव में, पिछले कुछ महीनों के दौरान इस समुदाय के कई सदस्यों ने अपनी वफ़ादारी को राजद के पाले में स्थानांतरित करने के बारे में कोई संकोच नहीं दिखाया है.

चुनाव में मिला चेतावनी संकेत, बीजेपी कर रही है भूल सुधार की कोशिश

बोचहां विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव के मामले में भाजपा उम्मीदवार को 40,000 से अधिक मतों के अंतर से हार मिली थी . पार्टी के साथ-साथ राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने भी इसके लिए भूमिहारों द्वारा बड़े पैमाने पर राजद को एकमुश्त वोट देने के फैसले को जिम्मेदार ठहराया है. साथ ही इस समुदाय ने भाजपा को भी यह दिखाने की कोशिश की है कि उन्हें हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए.

इसी तरह, भूमिहारों ने हाल के 24 विधान परिषद सीटों चुनावों में भी राजद का समर्थन किया और समुदाय के तीन नेताओं ने इस पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की.

स्थानीय भाजपा नेताओं के अनुसार, इसकी एक वजह यह भी थी कि भाजपा के मंत्री राम सूरत राय ने सार्वजनिक रूप से भूमिहार जाति के पार्टी सदस्यों को ‘भू-माफिया’ के रूप में संदर्भित किया था .

भाजपा विधायक हरिभूषण ठाकुर ने दिप्रिंट को बताया, ‘बोचहां के एक भूमिहार बहुल गांव में तो मुझसे कहा गया था कि भाजपा को अब यादव वोटों की तलाश करनी चाहिए.’ उन्होंने जोर देकर कहा कि भूमिहारों को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता है, और उन्होंने दिखा दिया है कि वे राजद को भी वोट दे सकते हैं.

हाल के इन घटनाक्रमों से चिंतित, कई भाजपा नेताओं का मानना है कि बेहतर जाति संतुलन बनाकर इस भूल में सुधार किया जा सकता है.

बिहार में राजग सरकार के पिछले दो कार्यकालों से भाजपा की राज्य इकाई के प्रमुख अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) समुदाय से आए हैं: वर्तमान अध्यक्ष संजय जायसवाल और उनसे पहले नित्यानंद राय (जो अब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हैं).

पार्टी के कुछ नेताओं ने दिप्रिंट को बताया कि सितंबर के अंत में जायसवाल के कार्यकाल की समाप्ति के साथ अगला राज्य अध्यक्ष किसी ऊंची जाति के समुदाय से होना चाहिए – और भूमिहार हो तो ज्यादा अच्छा.

भाजपा के एक सूत्र के अनुसार, फिलहाल जो नाम चर्चा में हैं, उनमें बिहार विधानसभा के वर्तमान अध्यक्ष विजय कुमार सिन्हा, मंत्री नितिन नवीन, जीवेश मिश्रा, अश्विनी कुमार चौबे और गिरिराज सिंह शामिल हैं. राज्यसभा सांसद और भूमिहारों के सबसे बड़े नेताओं में से एक सी.पी. ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर के नाम पर भी विचार किया जा रहा है.


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तेजस्वी यादव का भूमिहारों तक पहुंच बनाने के प्रयास

एक तरफ जहां भाजपा अपने अगले कदमों पर विचार ही कर रही है, वहीं राजद नेता तेजस्वी यादव उन भूमिहारों को लुभाने के लिए ठोस प्रयास कर रहे हैं, जो एक समय में अपने पिता लालू प्रसाद यादव के खिलाफ एकजुट थे. इस महीने परशुराम जयंती समारोह में, उन्होंने ‘परशुराम समाज’ (यानी कि भूमिहार समाज) से उन पर अपना आशीर्वाद बरसाने की अपील की. भगवान विष्णु के 10 अवतारों में एक माने जाने वाले भगवान परशुराम के भूमिहारों में बहुत सारे अनुयायी है.

इसी सभा में तेजस्वी ने कहा, ‘कोई भी व्यक्ति गलती कर सकता है, लेकिन उसे इसे सुधारने का अवसर दिया जाना चाहिए.’ उनके इस बयान का संदर्भ, स्पष्ट रूप से 1990 के दशक की उस भयावह अवधि से था जब भूमिहारों को उनके पिता लालू प्रसाद यादव के तहत राज्य के प्रशासन द्वारा कथित रूप से निशाना बनाया गया था.

तेजस्वी ने इस बात का भी उल्लेख किया कि राजद ने हाल ही में हुए एमएलसी चुनाव में पांच भूमिहार नेताओं को टिकट दिया था, जिनमें से तीन जीते थे.

भूमिहारों की लगातार बदलती निष्ठा

भूमिहार खुद को ब्राह्मण समुदाय का विस्तारित अंग मानते हैं, लेकिन वे खेती के अपने व्यवसाय से की वजह से उनसे अलग दिखते हैं.

हालांकि, साल 1931 के बाद से कोई जातीय जनगणना नहीं हुई है, लेकिन भूमिहारों को उन ऊंची जातियों में गिना जाता है, जो कथित तौर पर राज्य की आबादी का 11 से 12 प्रतिशत हिस्सा हैं. बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, नवादा, मुंगेर और वैशाली जैसे जिलों में इस समुदाय की अच्छी खासी उपस्थिति है.

उनकी कम संख्या के बावजूद, उन्हें बिहार में ‘जमींदारों’ के रूप में जाना जाता है, और इसलिए उनका प्रभाव कभी भी उनकी संख्यात्मक ताकत के अनुपात में नहीं होता है.

विशेष रूप से, बिहार के पहले मुख्यमंत्री और कांग्रेसी नेता श्रीकृष्ण सिन्हा भूमिहार जाति से ही आते थे. इस समुदाय ने दशकों तक कांग्रेस का समर्थन किया, लेकिन 1990 के दशक में यह स्थिति बदल गयी.

इस अशांत दशक के दौरान माओवादियों द्वारा जमींदारों के खिलाफ कथित तौर पर किए गए नरसंहारों में काफी तेजी देखी गई.

लालू-राबड़ी प्रशासन ने भी अपेक्षाकृत समृद्ध और भूमि के स्वामित्व वाले इस समुदाय के खिलाफ रुख अख्तियार किया हुआ था. उस समय की खबरों के अनुसार, इस बात का ‘व्यापक संदेह’ था कि यादवों ने आरक्षण के खिलाफ भूमिहारों के कड़े रुख के कारण उनके नरसंहार को अंजाम दिलवाया था.

यह वही समयकाल था जिस दौरान ‘रणवीर सेना’ नामक एक निजी भूमिहार मिलिशिया (नागरिक सेना) की उत्पत्ति हुई. इसका नेतृत्व ब्रह्मेश्वर मुखिया ने किया, और इसने कथित तौर पर दलितों के खिलाफ नरसंहार भी किये.

कांग्रेस तब तक राजद के करीब जा चुकी थी, जिसे भूमिहार पचा नहीं पा रहे थे. ऐसे समय में जब राज्य में भाजपा का राजनीतिक पदचिन्ह बड़ा होता जा रहा था, इस समुदाय ने अपनी वफादारी इस उभर कर सामने आ रही पार्टी के प्रति स्थानांतरित कर दी, जिसके पास कैलाशपति मिश्रा जैसे कद्दावर भूमिहार नेता भी थे.

साल 1995 और 2020 के विधानसभा चुनावों के मध्य अन्य सवर्णों के साथ-साथ भूमिहार भी भाजपा के साथ ही बने रहे हैं, लेकिन अब ये समीकरण बदल रहे हैं.

एक भाजपा नेता ने उनका नाम न छापने का अनुरोध करते हुए कहा, ‘अतीत में जो कुछ भी हुआ वह काफी क्रूरतापूर्ण था, लेकिन यह अब भूमिहारों की नई पीढ़ियों के लिए किसी सार्वजनिक यादगार का हिस्सा नहीं है. न केवल उन्होंने नरसंहारों को देखा ही नहीं है, बल्कि उनके लिए राजद अब केवल लालू यादव नहीं बल्कि तेजस्वी की पार्टी भी है. राजद नेता द्वारा सार्वजनिक रूप से गलतियों को सुधारने करने की घोषणा के साथ ही भाजपा के लिए कई सारे चीजें बदल सकती हैं.’

भूमिहारों के एक नेता ने दिप्रिंट को बताया कि जहां इस समुदाय ने बीजेपी के सत्ता में आने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, वहीं अब वह पार्टी भी नुकसान को पहुंचा सकता है – और ऐसा ही कुछ उपचुनावों और एमएलसी चुनावों में देखा गया है.

इस नेता ने आगे कहा, ‘भाजपा का एक वर्ग इस गलत धारणा में है कि भूमिहार और ऊंची जाति के मतदाताओं के पास कोई अन्य विकल्प नहीं है, और इसलिए यदि वे चाहें तो भी वे राजद के साथ नहीं जा सकते. एक पीढ़ीगत बदलाव आया है और इसकी वहज से नए राजनैतिक संरेखण (एलाइनमेंट) प्रचलन में आएंगे (बनेगें). जिस तरह से समय के साथ भाजपा द्वारा चुनावी राजनीति में भूमिहारों के प्रतिनिधित्व को कम किया गया है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है.‘

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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