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Tuesday, 28 May, 2024
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BJP से लेकर PMK तक तमिलनाडु में पदयात्रा का मौसम, पर सोशल मीडिया दौर में यह कॉन्सेप्ट बासी हो रहा

राजनीतिक टिप्पणीकारों का मानना है कि पदयात्राएं नेताओं की लोकप्रियता तो बढ़ा सकती हैं, लेकिन जनता, खासकर वर्तमान पीढ़ी को लुभाने के लिए ये हथकंडे अब पुराने पड़ चुके हैं.

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चेन्नई: आम चुनावों से सिर्फ एक साल दूर और 2026 में विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए तमिलनाडु में राजनीतिक दलों ने आउटरीच प्रोग्रामों की झड़ी लगा दी है. इनमें से सबसे लोकप्रिय पदयात्रा (पैदल मार्च) है.

राज्य भाजपा प्रमुख के. अन्नामलाई अप्रैल में राज्यव्यापी पदयात्रा शुरू करने के लिए तैयार हैं. उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘यह 2024 और 2026 के चुनावों का अग्रदूत होगी.’ लेकिन आईपीएस अधिकारी से नेता बने अन्नामलाई की यह पदयात्रा शहर में अकेली नहीं है. भाजपा की सहयोगी पट्टालि मक्कल काची (पीएमके) भी ऐसा ही कुछ करने जा रहे है. वहीं द्रविड़ कज़गम (डीके) भी ऐसी ही एक योजना पर काम कर रहे हैं.

तमिलनाडु में पदयात्राओं का एक लंबा इतिहास रहा है. इसकी शुरुआत 1930 में सी. राजगोपालाचारी के वेदारण्यम सत्याग्रह से हुई थी. उन्होंने महात्मा गांधी के दांडी मार्च से प्रेरित होकर अंग्रेजों द्वारा लगाए गए नमक कर का विरोध करने के लिए यह आंदोलन चलाया था. बाद में उन्हें गिरफ्तार कर, छह महीने के लिए कैद में रखा गया था.

उसके बाद 1982 में द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के संरक्षक एम. करुणानिधि का मदुरै-तिरुचेंदूर पैदल मार्च हुआ, जिसे ‘निधि केट्टु नेदुम्पायनम (न्याय की मांग को लेकर लंबा मार्च)’ के नाम से जाना जाने लगा था. उस समय विपक्ष के नेता के रूप में करुणानिधि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (एचआर एंड सीई) के एक अधिकारी सुब्रमण्यम पिल्लई के लिए न्याय की मांग कर रहे थे, जिनकी 1980 में रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत हो गई थी.

मरुमलार्ची द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (एमडीएमके) के नेता वाइको ने भी 2013 में राज्य में शराबबंदी की मांग को लेकर मदुरै से कुंबुम तक पदयात्रा कर सुर्खियां बटोरी थीं. पद यात्रा के दौरान वाइको की तत्कालीन मुख्यमंत्री जे. जयललिता से भी मुलाकात हुई थी, जो अपनी कार से बाहर निकलीं और उनसे पूछा, ‘आप अपने आप को इतना तनाव क्यों दे रहे हैं?’

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हालांकि, राजनीतिक टिप्पणीकारों का मत है कि जनता, खास तौर पर वर्तमान पीढ़ी को लुभाने के एक तरीके के रूप में पद यात्रा की अवधारणा पुरानी हो चुकी है. सोशल मीडिया के इस युग में एक इनोवेटिव कैंपेन की सख्त जरूरत है.

राजनीतिक शोधकर्ता रवींद्रन दुरईसामी ने दिप्रिंट को बताया, ‘एक पदयात्रा किसी भी नेता की लोकप्रियता को तो बढ़ा सकती है, लेकिन इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आप चुनाव में जीत हासिल कर ही लेंगे या फिर लोकप्रियता को वोटों में बदलने में कामयाब हो जाएंगे.’


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पदयात्राओं की भरमार

फिलहाल तो तमिलनाडु बीजेपी में अन्नामलाई अकेले नेता नहीं हैं जो पार्टी के लिए समर्थन जुटाने के लिए पदयात्राओं का दांव खेल रहे हैं. जनवरी में कोयंबटूर दक्षिण से बीजेपी विधायक वनाथी श्रीनिवासन ने कोयंबटूर से पलानी तक 110 किलोमीटर लंबे मार्च में हिस्सा लिया था.

यह उनकी एक ‘आध्यात्मिक’ यात्रा थी, जो मुरुगा (कार्तिकेय) के छह निवासों में से एक माने जाने वाले पलानी मुरुगन मंदिर में जाकर खत्म हुई थी. उन्होंने यह यात्रा तमिलनाडु में भाजपा के विस्तार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लंबे जीवन के लिए प्रार्थना करने के लिए की थी.’

अन्नामलाई के अलावा अप्रैल में अभिनेत्री गायत्री रघुराम भी अपनी पैदल यात्रा पर निकलेंगी. गायत्री ने ‘पार्टी को बदनाम करने’ के आरोप में अपने छह महीने के निलंबन का सामना करने के बाद जनवरी में भाजपा का साथ छोड़ दिया था. वह पिछले आठ सालों से पार्टी के साथ बनी हुईं थीं. अपने त्याग पत्र में उन्होंने दावा किया था कि राज्य इकाई ने ‘एक जांच, महिलाओं के लिए समान अधिकार और सम्मान का अवसर’ नहीं दिया.

गायत्री ने दिप्रिंट को बताया, ‘चेन्नई से कन्याकुमारी तक मेरी पदयात्रा अन्नामलाई की यात्रा के दिन ही शुरू होगी और यह 40 दिनों तक चलेगी.’ उन्होंने कहा कि इसके पीछे का विचार महिलाओं के अधिकारों के बारे में जागरूकता फैलाना और संसदीय एवं विधानसभा चुनावों में महिलाओं के लिए 30 फीसदी प्रतिनिधित्व की जरूरत को उजागर करना है.

यह पूछे जाने पर कि उन्होंने अन्नामलाई के साथ ही अपनी पदयात्रा शुरू करने का फैसला क्यों किया, गायत्री ने कहा कि वह अपने साथ हुए ‘अन्याय’ की ओर ध्यान दिलाना चाहती हैं. यह स्पष्ट करते हुए कि वह भाजपा के विरोध में नहीं हैं, उन्होंने कहा, ‘भाजपा के भीतर कई शिकायतें हैं (महिला पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ठीक से व्यवहार नहीं किया जा रहा है) और मुझे नहीं पता कि कितनों को गंभीरता से लिया गया है या कितनों पर गौर किया गया है.’

उधर राज्यसभा सांसद और भाजपा-सहयोगी पीएमके के अध्यक्ष अंबुमणि रामदास भी नोय्याल नदी के पुनरुद्धार की मांग को लेकर पदयात्रा की योजना बना रहे हैं. पीएमके के संस्थापक एस रामदास (83) ने भी तमिल भाषा और संस्कृति की रक्षा के नाम पर फरवरी में कार से एक मार्च निकाला था. अंबुमणि के एक करीबी सहयोगी ने कहा, ‘इस साल कई और पदयात्राएं होंगी.’

द्रविड़ कज़गम (डीके) के प्रमुख के. वीरामणि ने सामाजिक न्याय के संदेश को फैलाने और द्रविड़ विचारधारा का प्रचार करने के लिए राज्य का दौरा करने की अपनी योजना की घोषणा की है, हालांकि उनकी यह यात्रा पैदल नहीं होगी.


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विपक्षी दल ‘विचारों से विहीन’

मद्रास यूनिवर्सिटी में राजनीति और लोक प्रशासन विभाग के प्रमुख प्रोफेसर रामू मणिवन्नन ने कहा कि पदयात्रा आमतौर पर विपक्ष द्वारा सत्ता विरोधी लहर को गोलबंद करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली रणनीति है. उन्होंने कहा कि पदयात्रा का एक ‘परिप्रेक्ष्य और एक प्रतीकात्मक अनुनाद’ होता है.

पहले उद्धृत राजनीतिक शोधकर्ता दुरीसामी का मानना है कि पदयात्रा का चेहरा उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पैदल मार्च. उन्होंने समझाते हुए कहा, 1983 में अपनी भारत यात्रा के साथ चंद्रशेखर ने खुद को इंदिरा गांधी के विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश की थी. इसी तरह वाई.एस. राजशेखर रेड्डी की 2003 में 1,500 किलोमीटर की पदयात्रा और 2018 में वसुंधरा राजे सिंधिया की पदयात्रा ने यह धारणा दी कि वे क्रमशः अविभाजित आंध्र प्रदेश और राजस्थान में सबसे उपयुक्त राजनीतिक विकल्प हैं.

दुरीस्वामी ने आगे कहा, ‘लेकिन वे सभी ऐसे नेता थे जिनके पास पहले से ही एक महत्वपूर्ण समर्थन आधार था और वो विपक्षी नेता थे. लेकिन जो वैकल्पिक ताकत नहीं हैं, उनकी लोकप्रियता बढ़ जाएगी. इन यात्राओं से उन्हें बस इतना ही मिलने वाला है.’

मणिवन्नन के अनुसार, आज के सोशल मीडिया युग में युवाओं के लिए पदयात्राएं जन लामबंदी का पसंदीदा साधन नहीं हैं. ‘पहले, इस तरह के मार्च के दौरान विभिन्न राजनीतिक दलों के लोग साथ आते थे. लेकिन अब नेता वाली पार्टी के लोग ही उनके साथ चलने या फिर उनके आस-पास दिखाई देते हैं.’

भाजपा महिला मोर्चा की अध्यक्ष वनाथी श्रीनिवासन ने कहा कि पदयात्रा की अवधारणा एक स्वीकृत ‘जन लामबंदी और जन संपर्क’ समाधान है जिसका लंबे समय में प्रभाव पड़ता है. पलानी तक अपने पैदल मार्च का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इसने कार्यकर्ताओं को ‘उत्साहित किया. साथ ही यह नेताओं, कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच एक संपर्क स्थापित करने का एक बड़ा अवसर भी था’.

हालांकि राजनेताओं की पदयात्रा अभी भी भारतीय मतदाता की कल्पना में ताजा है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तमिलनाडु में मौजूदा स्थिति दिखाती है कि विपक्षी दलों के पास ‘विचारों की कमी’ है.

90 के दशक में जयललिता का काफिला-आधारित चुनाव प्रचार काफी लोकप्रिय हुआ था. अपने इस अभियान के दौरान जयललिता दूर-दराज के गांवों में जातीं और समर्थकों को अपनी गाड़ी के अंदर बैठे हुए संबोधित किया करती थीं. यह उस समय आया जब राजनीतिक दलों को जनसभाओं की आदत थी.

विश्लेषकों ने कहा कि इस तरह की नई इनोवेटिव राजनीति अब नदारद है. दुरईसामी ने कहा, ‘अगर पदयात्रा जीतने का तरीका होती, तो हर कोई पैदल मार्च करता.’

(संपादनः शिव पाण्डेय)
(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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