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Tuesday, 10 February, 2026
होमराजनीति1987 के बाद पहली बार विपक्ष ने स्पीकर को हटाने की मांग की, ओम बिरला पर पक्षपाती होने का आरोप लगाया

1987 के बाद पहली बार विपक्ष ने स्पीकर को हटाने की मांग की, ओम बिरला पर पक्षपाती होने का आरोप लगाया

विपक्ष के नोटिस में कहा गया है कि बिरला की यह टिप्पणी कि उन्होंने मोदी से पिछले बुधवार को लोकसभा में शामिल न होने के लिए कहा था, इस ‘ठोस जानकारी’ के आधार पर थी कि कांग्रेस सांसदों ने ‘कुछ अप्रत्याशित कार्य’ की योजना बनाई थी, ‘झूठी’, ‘अपमानजनक’ थी.

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नई दिल्ली: मंगलवार को विपक्ष ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को हटाने की मांग करते हुए एक नोटिस दिया. विपक्ष ने उन पर “खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण” तरीके से काम करने का आरोप लगाया और कहा कि यह “इस संवैधानिक पद के दुरुपयोग का संकेत” है. यह कदम सत्ता और विपक्षी बेंचों के साथ-साथ सर्वोच्च विधायी पद के संरक्षक के बीच भरोसे के असाधारण रूप से टूटने को दिखाता है.

अगर यह नोटिस स्वीकार होता है और प्रस्ताव पर चर्चा होती है, तो यह भारतीय गणराज्य बनने के बाद चौथी बार होगा — और 1987 के बाद पहली बार — जब किसी लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रस्ताव लाया जाएगा. हालांकि, पहले की तरह इस बार भी प्रस्ताव के हारने की संभावना है, क्योंकि विपक्ष के पास इसे पारित कराने के लिए जरूरी संख्या नहीं है.

अपने नोटिस में कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष ने बिरला पर चार आरोप लगाए. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान नेता विपक्ष राहुल गांधी को अपना भाषण पूरा नहीं करने देना. आठ कांग्रेस सांसदों को निलंबित करना. एक भाजपा सांसद को जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर आपत्तिजनक हमले करने की अनुमति देना. और कांग्रेस सांसदों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने की योजना बनाने का आरोप लगाना.

नोटिस में कहा गया, “हम, नीचे हस्ताक्षर करने वाले, भारत के संविधान के अनुच्छेद 94(c) के प्रावधानों के तहत लोकसभा अध्यक्ष पद से श्री ओम बिरला को हटाने के लिए एक प्रस्ताव की सूचना देते हैं, क्योंकि जिस खुले तौर पर पक्षपातपूर्ण तरीके से वह लोकसभा का कामकाज चला रहे हैं. कई मौकों पर विपक्षी दलों के नेताओं को बोलने ही नहीं दिया गया, जबकि यह संसद में उनका बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार है.”

संविधान का अनुच्छेद 94(c) कहता है कि लोकसभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को सदन के एक प्रस्ताव के जरिए पद से हटाया जा सकता है, बशर्ते कि लोकसभा के उस समय के सभी सदस्यों के बहुमत से प्रस्ताव पारित हो और ऐसे प्रस्ताव को लाने की मंशा की कम से कम 14 दिन पहले सूचना दी जाए.

नोटिस में विपक्ष ने कहा कि बिरला का यह बयान कि उन्होंने पिछले बुधवार को प्रधानमंत्री से लोकसभा न आने का अनुरोध किया था, क्योंकि उनके पास “ठोस जानकारी” थी कि कुछ कांग्रेस सांसद “कोई अप्रत्याशित हरकत” कर सकते हैं, “खुले तौर पर झूठा” और “अपमानजनक” है.

नोटिस में कहा गया, “अध्यक्ष, जिन पर कार्य संचालन के नियमों और संसदीय मर्यादा के मानकों की रक्षा की जिम्मेदारी होती है, उन्होंने सदन के पटल का इस्तेमाल ऐसे बयान देने के लिए किया, जो इस संवैधानिक पद के दुरुपयोग का संकेत है.” यह नोटिस लोकसभा के महासचिव को सौंपा गया.

विपक्ष — तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर, जिसने अलग रुख अपनाया और कहा कि पहले बिरला से अपील की जानी चाहिए और उन्हें जवाब देने के लिए तीन दिन दिए जाने चाहिए — ने कहा कि वह अध्यक्ष का व्यक्तिगत रूप से सम्मान करता है, लेकिन इस बात से “दुखी और आहत” है कि उन्होंने लगातार विपक्षी नेताओं को जनहित से जुड़े वैध मुद्दे उठाने से रोका.

संसद के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए तृणमूल कांग्रेस के सांसद और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने कहा कि अगर बिरला को जवाब देने का समय देने के बाद नोटिस दिया जाता है, तो उनकी पार्टी उस पर साइन करेगी.

उन्होंने कहा, “अगर आज इसे लाया जाता है, तो AITC (ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस) अपने रुख पर कायम रहेगी कि पहले एक पत्र भेजा जाना चाहिए. अगर किसी ने गलती की है, तो उसे सुधार का मौका दिया जाना चाहिए. अगर हम ऐसा नहीं करते, तो हमारे और प्रधानमंत्री मोदी में क्या फर्क रहेगा. हमारे और भाजपा में क्या फर्क रहेगा.”

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने के प्रस्ताव पहले तीन बार लाए जा चुके हैं. 1954 में जी.वी. मावलंकर के खिलाफ, 1966 में सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ, और 1987 में बलराम जाखड़ के खिलाफ.

मावलंकर के खिलाफ एक समाजवादी पार्टी के सांसद ने पक्षपात का आरोप लगाते हुए अविश्वास प्रस्ताव पेश किया था. सदन में इस पर बहस हुई, लेकिन अंत में प्रस्ताव खारिज हो गया.

हुकुम सिंह के मामले में प्रस्ताव चर्चा के लिए ही नहीं आ सका, क्योंकि उसे सदन में जरूरी न्यूनतम समर्थन नहीं मिला.

जाखड़ के खिलाफ लाया गया प्रस्ताव भी सदन में हार गया.

मार्च 2023 में भी विपक्ष ने अध्यक्ष बिरला को हटाने का प्रस्ताव लाने की बात कही थी, लेकिन वह कदम आगे नहीं बढ़ पाया.

दिसंबर 2024 में विपक्ष ने राज्यसभा में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ को उच्च सदन के सभापति पद से हटाने की मांग करते हुए नोटिस दिया था. उस पर कार्यवाही के दौरान सत्ता पक्ष के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया गया था.

लेकिन प्रक्रिया से जुड़ी वजहों के चलते शुरुआती स्तर पर ही इसे खारिज कर दिया गया और यह कोशिश वहीं रुक गई.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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