scorecardresearch
Monday, 17 June, 2024
होमराजनीतिओबीसी आरक्षण के विरोध में लगाई थी आग, आज होते तो सवर्ण कोटे से रहते खुश

ओबीसी आरक्षण के विरोध में लगाई थी आग, आज होते तो सवर्ण कोटे से रहते खुश

डीयू के छात्र राजीव गोस्वामी 1990 में सरकारी नौकरियों में ओबीसी आरक्षण के विरोध में आग लगा ली थी. पिता कहते हैं कि उनका पुत्र गरीबों के लिए कोटे से खुश होता.

Text Size:

नई दिल्ली: नरेन्द्र मोदी सरकार के शिक्षा और नौकरियों में ऊंची जाति के गरीबों को 10 प्रतिशत कोटा देने के निर्णय ने उस आदमी के पिता को समर्थक के रूप में पाया है, जिसका बेटा जाति आधारित आरक्षण के विरोध का चेहरा बन कर उभरा था.

लेकिन मदन गोस्वामी, जिनके पुत्र राजीव गोस्वामी ने सितम्बर 1990 में खुद को मंडल आयोग की सरकारी नौकरी में अन्य पिछड़े वर्गों को 27 प्रतिशत आरक्षण देने की अनुसंशा के विरोध में आग लगा ली थी, उन्होंने कहा कि थोड़ा सतर्क रहने की जरूरत है.

उन्होंने चेताया ‘ये तभी कारगर होगा जब ये असल गरीबों तक पहुंचेगा, न कि जो लोग इसे ला रहे हैं उनके रिश्तेदारों तक ही पहुंचे.’ 84 वर्षीय गोस्वामी अब अमेरिका के मिशिगन शहर में अपनी बेटी विजय के परिवार और राजीव के बच्चों के साथ रहते हैं. राजीव दिल्ली के देशबंधु कालेज का छात्र था, जब 20 साल की उम्र में 1990 में उसने आत्मदाह की कोशिश की थी.

गोस्वामी कहते हैं, ‘मुझे लगता है कि अगर आज राजीव जिंदा होता तो गरीबों के लिए कोटा लाए जाने से खुश होता.’

उदार व्यक्ति

आत्मदाह की कोशिश में राजीव 50 प्रतिशत जल गए थे और 2004 में उनकी जलने से हुई क्षति से बीमार रहने के बाद मृत्यु हो गई थी. राजीव के पिता एक सेवानिवृत्त पोस्टमास्टर थे. वे कहते हैं कि उनका बेटा बहुत ही उदार दिल था और जरूरतमंद को अपने कपड़े भी दे सकता था. वो याद करते हैं, ‘कई बार वो सर्दियों में कालेज से बिना स्वेटर या मफलर के लौटता था.’

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

‘जब हम उससे पूछते तो वो कहता था कि उसे राह चलते कोई मिल गया, जिसके पास सर्दी के कपड़े नहीं थे और इसलिए उसने अपने गर्म कपड़े उसको दे दिये. वो गरीबों के बारे में बहुत सोचते थे बिना उसके जात या समुदाय के बारे में सोचते हुए.’

जब उनसे ये पूछा गया कि क्या वे मानते हैं कि कोटा गरीबी दूर करने का एक समाधान है, तो उन्होंने कहा कि हां, ये है. पर तभी जब कोटा बिना धर्म और जाति के भेद के साथ दिया जाए.

गोस्वामी पूछते हैं, ‘गरीब को सपोर्ट मिल जाए तो कुछ कर लेता है. गरीब बच्चा पढ़ लिख जाए तो पूरे परिवार को गरीबी से निकाल लेता है. ब्राह्मण भी गरीब हो सकता है, तो क्या वह ब्राह्मण हैं इसलिए उसे सहायता नहीं मिलनी चाहिए?’

गर्वित बच्चे

राजीव की बहन और बच्चों की बुआ विजय ने कहा, ‘राजीव के बच्चे उनके पिता द्वारा उठाये गए कदम को लेकर आज भी गर्व करते हैं, जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो गई थी’. राजीव के बच्चे सिमरन जो इस वर्ष जनवरी में 20 साल की हो गयी और आदित्य 16वीं साल में है, जो अपने पिता की विरासत को लेकर काफी चिंतित हैं. परिवार में अभी भी कांग्रेस के खिलाफ नाराजगी है, जो उस समय की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत थी, जिसने वीपी सिंह की गठबंधन सरकार को बाहर से समर्थन देने की पेशकश की, जिसे वीपी सिंह चला रहे थे, जिसके तहत मंडल कानून की सिफारिश को मंजूरी दी गई थी.

उन्होंने कहा, ‘जब वह (राजीव) सफदरजंग में भर्ती थे, तो एक भी कांग्रेसी नेता उन्हें देखने नहीं आया.’ वह कहते हैं,  ‘जब अन्य पार्टी के कुछ नेता आए, तो उन्हें कांग्रेस नेताओं द्वारा धमकाया गया. किसी ने हमारा साथ नहीं दिया. राजीव को तब उचित इलाज के बिना छुट्टी दे दी गई थी.’

राजीव की मृत्यु के बाद यह पूछे जाने पर कि क्या उन्होंने उनके लिए जाति आधारित कोटे का विरोध किया था. गोस्वामी ने जवाब दिया, बिल्कुल नहीं.

‘हम समानता के हक़ के लिए लड़ने वालों के साथ कदम से कदम मिलाकर बने रहे. उन्होंंने कहा कि मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण के खिलाफ डॉक्टरों और युवा छात्रों द्वारा हड़ताल का समर्थन करने के लिए उनकी मां नंदरानी ने 2006 में भारत के लिए उड़ान भरी थीं.

2012 में नंदरानी का निधन हो गया.

इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

share & View comments