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Thursday, 9 April, 2026
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केरल में चुनावी दांव-पेंच—LDF का निरंतरता पर फोकस, NDA की लंबी रणनीति

वामपंथी खेमे ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा जल्द करके चुनावी मैदान में ज़ोरदार शुरुआत की है, जिसके चलते UDF को अब उनकी बराबरी करने के लिए तेज़ी दिखानी पड़ रही है. BJP के नज़रिए से, यह चुनाव एक क्वार्टर-फ़ाइनल या सेमी-फ़ाइनल जैसा है.

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तिरुवनंतपुरम: 15 मार्च को, केरल विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के तुरंत बाद, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के राज्य सचिव बिनॉय विश्वम ने प्रेस से बात की और उम्मीदवारों की अपनी सूची पढ़कर सुनाई. इसके तुरंत बाद भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के राज्य सचिव एम.वी. गोविंदन ने भी प्रेस ब्रीफिंग की.

इन प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ ही मिनटों के भीतर, सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के कई उम्मीदवार अपने समर्थकों के साथ खुले वाहनों में रैलियां निकालने लगे. वे झंडे लहरा रहे थे और मतदाताओं का अभिवादन कर रहे थे. इससे शहर के केंद्र लाल रंग से भर गए. इससे कांग्रेस, जो विरोधी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) का नेतृत्व करती है, अचानक चौंक गई और आम लोग भी हैरान रह गए.

दिसंबर में हुए स्थानीय निकाय चुनाव में हार से सबक लेते हुए, लेफ्ट ने विधानसभा चुनाव के लिए तुरंत काम शुरू कर दिया. हार के एक महीने बाद हुई समीक्षा बैठक में CPI(M) ने चुनावी काम में अपनी गलतियों को स्वीकार किया था, ऐसा एक छोटे सहयोगी दल के नेता ने नाम न बताने की शर्त पर कहा.

कांग्रेस ने 9 अप्रैल के चुनाव के लिए अपनी पूरी उम्मीदवार सूची जारी करने में चार दिन और लगा दिए, जिसका फायदा लेफ्ट को मिला.

यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि LDF ने लगभग सौ सीटों पर मौजूदा विधायकों को ही टिकट दिया. ज्यादातर विधायकों को बरकरार रखा गया, जबकि 2021 में CPI(M) ने ‘टर्म क्लॉज’ लागू किया था. 2021 के चुनाव में CPI(M) ने दो कार्यकाल पूरे कर चुके विधायकों को टिकट नहीं दिया था.

इस पूरे मामले से लेफ्ट को शुरुआती बढ़त मिली.

Lok Sabha LoP Rahul Gandhi during an election rally in Kerala on 30 March | ANI
30 मार्च को केरल में एक चुनावी रैली के दौरान लोकसभा नेता राहुल गांधी | एएनआई

LDF रणनीति

LDF की उम्मीदवार सूची का मुख्य विषय निरंतरता है. कई वरिष्ठ नेता अपना आखिरी चुनाव लड़ रहे हैं. मट्टनूर में वी.के. सनोज को छोड़कर, जहां मौजूदा विधायक के.के. शैलजा को पार्टी के दबाव में पेरावूर जाना पड़ा, CPI(M) ने कोई नए चेहरे नहीं उतारे.

CPI(M) के अंदरूनी सूत्र के.सी. उमेश बाबू के अनुसार, पहली बार स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) और डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन ऑफ इंडिया (DYFI) के राज्य अध्यक्षों को टिकट नहीं दिया गया है.

CPI(M) की कुल रणनीति सुरक्षित खेलना और पार्टी संगठन का पूरा उपयोग करके पिनराई विजयन के लिए रिकॉर्ड तीसरी जीत हासिल करना है. मौजूदा विधायकों को बनाए रखने से उम्मीदवारों को मतदाताओं से परिचित कराने में समय नहीं लगाना पड़ा.

CPI(M) के इस फैसले से सहयोगी दलों को भी हौसला मिला कि वे उम्रदराज मंत्रियों को ही मैदान में उतारें, जिन्हें सामान्य तौर पर युवाओं के लिए जगह छोड़नी पड़ती.

विजयन के अलावा सूची में अन्य 80 साल से अधिक उम्र के नेता भी हैं, जैसे मंत्री ए.के. ससींद्रन और कदन्नापल्ली रामचंद्रन. एक अन्य मंत्री के. कृष्णनकुट्टी ने 81 साल की उम्र में सर्जरी से ठीक होने के बाद राजनीति छोड़ दी.

अन्य CPI(M) उम्मीदवारों में थोत्ताथिल रवींद्रन 79, पी.टी.ए. रहीम 78, लेफ्ट संयोजक टी.पी. रामकृष्णन 75 और के.के. जयचंद्रन 74 साल के हैं. दासन और कुन्हाम्मद कुट्टी 73 के हैं. वी. शिवनकुट्टी और कदकंपल्ली सुरेंद्रन 71 के हैं. सी. रवींद्रनाथ और ए.सी. मोइदीन दोनों 70 साल के हैं.

The campaign committee office of Congress Kochi candidate Mohammed Shiyas at Palluruthy. |Photo: Anand Kochukudy/ThePrint
पल्लुरूथी में कांग्रेस कोच्चि उम्मीदवार मोहम्मद शियास की अभियान समिति का कार्यालय। |फोटो: आनंद कोचुकुडी/दिप्रिंट

आखिरी बार CPI(M) ने 2001 में इतनी बड़ी संख्या में 70 साल से ऊपर के उम्मीदवार उतारे थे और तब उसका प्रदर्शन खराब रहा था.

गठबंधन की रणनीति

यह सुरक्षित रखने की रणनीति सहयोगियों के साथ व्यवहार में भी दिखी. केरल कांग्रेस (मणि) को आखिरी समय में विपक्षी UDF में जाने से रोककर, और कथित तौर पर पार्टी तोड़ने की धमकी देकर, CPI(M) ने यह धारणा बनने से बचा लिया कि LDF हारने वाला है.

और पहले के मुकाबले, CPI(M) ने छोटे सहयोगियों से सीटें छीनने या अदला-बदली करने से भी परहेज किया, सिवाय एक मामले के.

Posters of rival candidates in Kochi—Mohammed Shiyas of the Congress and K J Maxi of the CPI(M)—at Mattancherry. | Photo: Anand Kochukudy/ThePrint
146 कोच्चि के मट्टनचेरी में प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों—कांग्रेस के मोहम्मद शियास और CPI(M) के के.जे. मैक्सी—के पोस्टर। |फोटो: आनंद कोचुकुडी/दिप्रिंट

मलप्पुरम में, जहां CPI(M) आम तौर पर कुछ सीटें खाली रखती है ताकि कांग्रेस या इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) के दलबदलुओं को उतारा जा सके, इस बार उसे कोई उम्मीदवार नहीं मिला.

इस बीच CPI ने जहां भी उसे लगा कि वह सीट बचा सकती है, वहां तीन कार्यकाल की सीमा लागू की, भले ही मौजूदा विधायक को हटाना पड़ा.

चौंकाने वाले उम्मीदवार

सुरक्षित रणनीति के बीच CPI(M) का एक कदम खास रहा, जब उसने अलाप्पुझा के पूर्व सांसद और तीन बार विधायक ए.एम. आरिफ को एर्नाकुलम जिले के अलुवा से उतारा. अलुवा को कांग्रेस का गढ़ माना जाता है और यहां कई चुनावी लहरों के बावजूद कांग्रेस मजबूत रही है.

लेकिन लोकप्रिय अरिफ को आखिरी समय में ए.के. नजीर की जगह उतारना यह दिखाता है कि CPI(M) को तीन बार के विधायक अनवर सादत के खिलाफ माहौल का फायदा उठाने की उम्मीद है.

वायपीन के विधायक के.एन. उन्नीकृष्णन को त्रिप्पुनिथुरा भेजने पर नया मोड़ तब आया जब कांग्रेस ने अपनी सूची जारी की. पिछली बार वायपीन से हारने वाले दीपक जॉय को इस बार त्रिप्पुनिथुरा से उम्मीदवार बनाया गया, जिससे एक ही मुकाबला नए इलाके में फिर से देखने को मिलेगा.

बीजेपी की लंबी रणनीति

जैसे CPI(M) ने मलप्पुरम में संभावित दलबदलुओं के लिए उम्मीदवारों के नाम घोषित करने में देरी की, वैसे ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने भी कांग्रेस की दूसरी सूची आने तक कई सीटें खाली रखीं. केरल में बीजेपी के नजरिए से यह चुनाव 2031 और 2036 में बड़ी जीत की तैयारी से पहले क्वार्टर फाइनल या सेमीफाइनल जैसा है.

केरल में पहली बार लोकसभा सीट जीतने और लगभग 20 प्रतिशत वोट शेयर तक पहुंचने के बाद, जब 2024 में सुरेश गोपी ने त्रिशूर सीट जीती, तो स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन उम्मीद से कमजोर रहा.

तिरुवनंतपुरम कॉरपोरेशन जीतने के अलावा, 2025 में नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) का वोट शेयर 2020 के मुकाबले थोड़ा कम रहा.

पर्यवेक्षकों का मानना है कि बीजेपी की इस कमजोरी का कारण यह था कि LDF ने लोकसभा चुनाव में बीजेपी को मिले कुछ हिंदू वोट वापस अपनी ओर कर लिए, खासकर त्रिशूर, अलाप्पुझा और तिरुवनंतपुरम में.

लेफ्ट का ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ का तरीका चुनाव को बीजेपी के लिए और मुश्किल बनाता है. हालांकि, पहले के मुकाबले अब पार्टी राज्य में करीब आधा दर्जन सीटें जीतने की स्थिति में है.

हालांकि इन सीटों पर बीजेपी को हराने के लिए मुस्लिम वोटों का एकजुट होना संभव है, फिर भी राज्य की एक दर्जन से ज्यादा सीटों पर मुकाबला तीन तरफा है.

बीजेपी की गठबंधन रणनीति

शुरुआत में माना जा रहा था कि ट्वेंटी20 पार्टी को 10-12 सीटें मिलेंगी, जिनमें ज्यादातर एर्नाकुलम में होतीं, लेकिन नए सहयोगी को 19 सीटें दी गईं. यह फैसला अजीब लग सकता है, लेकिन इसे संभावित सहयोगियों को जोड़ने के लिए जरूरी “त्याग” बताया जा रहा है.

इस वजह से बीजेपी त्रिप्पुनिथुरा, कोडुंगल्लूर, एट्टुमानूर और रन्नी जैसी सीटों पर तीन तरफा मुकाबला खड़ा करने का मौका खो बैठी.

बीजेपी के महासचिव और तिरुवल्ला से उम्मीदवार अनूप एंटनी ने कहा, “यह ऊपर से लिया गया फैसला है. यह संभावित सहयोगियों को संदेश है कि हम उन्हें जगह देने के लिए तैयार हैं.”

BJP leader K. Annamalai during an election campaign in support of C. Raghunath from the Kannur constituency in Kerala, on Friday. (@annamalai_k)
शुक्रवार को केरल के कन्नूर निर्वाचन क्षेत्र से सी. रघुनाथ के समर्थन में चुनावी अभियान के दौरान भाजपा नेता के. अन्नामलाई | (@annamalai_k)

ट्वेंटी20 और एजावा समुदाय से जुड़े भारत धर्म जन सेना (BDJS) की सबसे बड़ी समस्या उनकी कमजोर संगठन क्षमता है. 2016 में अपने पहले चुनाव में बीजेपी के बराबर वोट पाने के बाद, BDJS का प्रदर्शन लगातार खराब रहा है. स्थानीय निकाय चुनाव में उसे सिर्फ 5 सीटें मिलीं.

बीजेपी ने लगातार चुनावों में BDJS के एजावा वोट अपने पक्ष में कर लिए हैं, लेकिन प्रतीकात्मक रूप से उसे महत्व दिया गया है. ट्वेंटी20 की तरह BDJS भी कोन्नी जैसी सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जहां बीजेपी पहले मजबूत हुई थी.

BDJS और ट्वेंटी20 को क्रमशः 22 और 19 सीटें देने के बाद बीजेपी के पास पहली बार 100 से कम सीटें रह गईं, और एक सीट (वांडूर) जनाधिपत्य राष्ट्रिया सभा को दी गई.

ईसाई समुदाय तक पहुंच

एक वरिष्ठ बीजेपी नेता ने कहा कि पार्टी ने अपनी लंबी रणनीति के तहत ट्वेंटी20 को चर्च समर्थित ‘केरल कांग्रेस’ जैसा मानकर चलना शुरू किया है.

असल में ईसाई समुदाय तक पहुंचने की जिम्मेदारी ट्वेंटी20 को दी गई है, क्योंकि बीजेपी को स्थानीय चुनावों में कई ईसाई उम्मीदवार उतारने के बाद नुकसान हुआ था. लेकिन समस्या यह है कि ट्वेंटी20 मुख्य रूप से एर्नाकुलम जिले के जैकोबाइट ईसाइयों के एक छोटे हिस्से तक ही सीमित है.

अनूप एंटनी के अलावा बीजेपी ने पाला से शोन जॉर्ज, पूंजार से पी.सी. जॉर्ज और कंजिरापल्ली से केंद्रीय मंत्री जॉर्ज कुरियन को मैदान में उतारा है.

विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (संशोधन) विधेयक, जिसे संसद में पेश किया जाना था, चुनाव से पहले सही समय पर नहीं आया और अंत में उसे रोक दिया गया.

विपक्षी सांसदों और कई संगठनों ने आरोप लगाया कि यह विधेयक अल्पसंख्यक संस्थाओं, खासकर ईसाई संगठनों को निशाना बनाता है और सरकार की आलोचना करने वाले एनजीओ को नियंत्रित करने के लिए है.

लेकिन इस विधेयक को रोकना भी शायद काफी नहीं होगा, क्योंकि बीजेपी के समर्थक माने जाने वाले कुछ बिशप ने भी इसके खिलाफ कड़े बयान दिए.

बीजेपी की संभावनाएं

तिरुवनंतपुरम जिले में बीजेपी संगठन के लिहाज से सबसे मजबूत है, और उसने शहर की सीटों पर जाने-पहचाने चेहरे उतारे हैं. नेमोम से राजीव चंद्रशेखर, कझाकूट्टम से वी. मुरलीधरन, वट्टियूरकावु से आर. श्रीलेखा और तिरुवनंतपुरम सेंट्रल से करमना जयन.

पार्टी को पालक्काड़ में भी उम्मीद है, जहां शोभा सुरेंद्रन का मुकाबला कड़ा है, और मंजेश्वरम में भी, जहां के. सुरेंद्रन 2016 और 2021 में बहुत कम अंतर से हारे थे.

इन छह सीटों के अलावा बीजेपी चथन्नूर, अरनमुला, वैकोम, देविकुलम, मलमपुझा, कोझिकोड नॉर्थ और त्रिशूर जैसी सीटों पर भी नजर रखे हुए है.

कई लोगों का मानना है कि पार्टी ने चेंगन्नूर में मजबूत उम्मीदवार नहीं उतारकर गलती की, जबकि वहां उसकी अच्छी स्थिति है. इसी वजह से कुछ लोगों ने बीजेपी और मंत्री साजी चेरियन के बीच समझौते की बात भी कही.

बीजेपी प्रवक्ता नारायणन नंबूथिरी ने इसका जवाब देते हुए कहा, “हमने 2021 वाले ही उम्मीदवार को उतारा है, जो पहले अलाप्पुझा जिले के अध्यक्ष थे. गोपकुमार ही वहां पार्टी की बढ़त के पीछे मुख्य कारण हैं.”

बीजेपी ने CPI(M) और कांग्रेस दोनों से आए नेताओं को टिकट दिया है. इसमें पद्मजा वेणुगोपाल (त्रिशूर), पांडालम प्रतापन (अडूर), एम.जे. जॉब (अलाप्पुझा), आर. रेश्मी (कोट्टारक्कारा), आर.एस. अरुण राज (चडायमंगलम), बी.एस. अनूप (चिरायिनकीझु) शामिल हैं, जो सभी कांग्रेस से आए हैं.

लेफ्ट से आए नेताओं में के. अजीत (वैकोम), एस. राजेंद्रन (देविकुलम) और सी.सी. मुकुंदन (नट्टिका) शामिल हैं.

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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