Friday, 12 August, 2022
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डिजिटल चुनाव प्रचार- क्रान्ति या सिर्फ हवा? पिछले 3 महीनों में फेसबुक पर सिर्फ 8 करोड़ रुपए ही हुए खर्च

2017 के चुनावों में इन 5 राज्यों में, नेशनल पार्टीज और क्षेत्रीय दलों ने प्रचार पर 300 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए थे. लेकिन, ऐसा लगता है कि डिजिटल विज्ञापनों पर खर्च करना इन पार्टियों के खर्च का बड़ा हिस्सा नहीं है.

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नई दिल्ली: कोरोना महामारी के बाद चुनाव आयोग की ओर से चुनावी रैलियों और रोड शो पर लगाई गई पाबंदियों को देखते हुए अनुमान लगाया गया था कि राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया का भरपूर इस्तेमाल करेंगी. उत्तर प्रदेश,उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में चुनावी सरगर्मी जोरों पर है. लेकिन, सोशल मीडिया पर पार्टियों की सक्रियता इस अनुमान को तोड़ने वाले हैं.

दिप्रिंट की गणना के मुताबिक, पिछले तीन महीनों में उन सभी राज्यों से फ़ेसबुक पर सिर्फ़ आठ करोड़ रुपये का राजनीतिक विज्ञापन आया है जहां पर चुनाव होने हैं.

चुनावी कैंपेन में यह रकम ऊंट के मुंह में जीरा के बराबर है. एसोसिएशन एंड डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म (एडीआर) के मुताबिक, इन राज्यों में, साल 2017 के विधानसभा चुनावों में बड़ी राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों ने कुल 494.36 करोड़ रुपये खर्च किए थे. इनमें 300.23 करोड़ रुपये चुनाव प्रचार में खर्च किए गए थे. चुनाव पर नजर रखने वाली गैर सरकारी संगठन एडीआर ने पार्टियों की ओर से घोषित किए गए चुनावी खर्च की रकम के विश्लेषण से यह आंकड़ा निकाला था. ऐसा भी नहीं है कि कोविड की वजह से चुनावी खर्च में भारी कमी देखने को मिल रही है. साल 2021 में असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु. पुडुचेरी के चुनावों में राजनीतिक पार्टियों ने साल 2016 के मुकाबले दुगुना खर्च किया था.

आंकड़े कम से कम इस बात पर मुहर लगाते हैं कि राजनीतिक पार्टियां वोट पाने के लिए जमीनी प्रचार न कर पाने के बावजूद, मामूली रकम ही सोशल मीडिया पर विज्ञापन देने में खर्च कर रही हैं.

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इसके कारणों की पड़ताल करने के लिए दप्रिंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक को चुना. ऐसा इसलिए, क्योंकि दूसरी तकनीकी कंपनियों की तरह यह राजनीतिक विज्ञापनों की पहुंच को सीमित नहीं करती है. इसके साथ ही, पोस्ट किए जाने वाले विज्ञापन से जुड़े डेटा भी मुहैया करवाती है.

फेसबुक पर राजनीतिक विज्ञापन के खर्च की पड़ताल

सबसे पहले हम शोध के तरीकों पर बात करते हैं. राजनीतिक प्रचार और सामाजिक मुद्दों से जुड़े विज्ञापनों पर किए गए खर्च का डेटा ‘फेसबुक एड लाइब्रेरी’ पर सार्वजनिक है. 28 जनवरी से पहले, 90 दिनों में उन सभी राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से जुड़े विज्ञापनों पर 12.68 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं जहां चुनाव होने वाले हैं.

अगर राज्यवार आंकड़े देखें तो, उत्तर प्रदेश से 7.8 करोड़, पंजाब से 2.87 करोड़, गोवा से 1.1 करोड़, उत्तराखंड से 78 करोड़, और मणिपुर से 12.6 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. इनमें अलग-अलग संगठनों की ओर से सामाजिक मुद्दों पर दिए गए विज्ञापनों के खर्च भी शामिल हैं.

Home Minister Amit Shah during a roadshow at Bethuadahari in West Bengal's Nadia district, on 18 April 2021 | PTI Photo
प्रतीकात्मक तस्वीर/ बंगाल में चुनावी रैली करते हुए गृहमंत्री अमित शाह, इसबार चुनाव आयोग ने 2022 में इस तरह की रैली पर प्रतिबंध लगा दिया है./ फोटो: पीटीआई

हजारों फेसबुक पेज से राजनीतिक विज्ञापन किए जाते हैं. हमने राजनीतिक विज्ञापनों पर खर्च करने वाले ऐसे पेजों को ही विश्लेषण में शामिल किया है जो एक तय राशि से ज़्यादा खर्च करते हैं. इनमें उत्तर प्रदेश के लिए प्रति पेज 50, 000 रुपये, पंजाब के लिए प्रति पेज 10,000 रुपये, गोवा और उत्तराखंड के लिए, 5,000 रुपये और मणिपुर के लिए 2,000 रुपये तय किया गया है..

इससे ज़्यादा खर्च करने वाले 548 पेजों को छांटा गया. इन पेजों से पिछले तीन महीनों में राजनीतिक विज्ञापन पर खर्च की गई कुल राशि का 80 से 90 फीसदी राशि खर्च की गई है. इसके बाद, हमने उन पेजों को चुना जो राजनीतिक पार्टियों के समर्थन में चलाए जा रहे हैं. ऐसा करने पर उन सभी पेजों को इस विश्लेषण से अलग कर दिया गया जो गैर-राजनीतिक विज्ञापन पोस्ट करते हैं.

सामाजिक विषयों से जुड़े विज्ञापनों और न्यूनतम खर्च करने वाले पेजों को हटाने के बाद, पता चला कि आठ करोड़ रुपये की राशि राजनीतिक विज्ञापनों पर खर्च की गई.

डेटा के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने फेसबुक पर विज्ञापन देने वाली पार्टियों में सबसे ज़्यादा 2.25 करोड़ रुपये की राशि खर्च की है. दूसरे नंबर पर, कांग्रेस है जिसने 2.25 करोड़ रुपये की राशि खर्च की है. इन दोनों पार्टी के खर्च को जोड़ दिया जाए तो यह कुल खर्च का 70 फीसदी हो जाता है.

राज्यों में अलग-अलग पार्टियां अव्वल

बीजेपी, सिर्फ़ उत्तर प्रदेश और मणिपुर में ही विज्ञापन पर खर्च करने में सबसे आगे है. पार्टी ने सिर्फ़ उत्तर प्रदेश में तीन करोड़ रुपये की राशि खर्च की है. यह राज्य में विज्ञापन पर खर्च की गई राशि का 70 फीसदी है. वहीं, कांग्रेस ने राज्य में विज्ञापन पर 92 लाख रुपये की राशि खर्च की है.

मणिपुर में बीजेपी और उसके समर्थन में चलाए जा रहे फेसबुक पेज पर 6.8 लाख रुपये की राशि खर्च की गई है. यह राज्य में राजनीतिक विज्ञापन पर खर्च की गई राशि का 90 फीसदी है.

पंजाब और उत्तराखंड में कांग्रेस विज्ञापन पर खर्च करने में सबसे आगे है. पंजाब में कांग्रेस ने 1.1 करोड़ रुपये की राशि खर्च की है. यहां पर पार्टी सत्ता में है. वहीं, बीजेपी ने पंजाब में 11 लाख रुपये की राशि खर्च की है. उत्तराखंड में कांग्रेस ने 15 लाख रुपये और बीजेपी ने 11 लाख रुपये की राशि खर्च की है.

गोवा में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पार्टी और उसके समर्थन में चलाए जा रहे पेज पर करीब 50 लाख रुपये का विज्ञापन दिया गया है. यह राज्य में पिछले तीन महीने में विज्ञापन पर खर्च की गई कुल राशि का आधा है.

गौरतलब है कि आम आदमी (आप) ने भी इन राज्यों में राजनीतिक विज्ञापनों पर ठीक-ठाक राशि खर्च की है. वहीं, आम आदमी पार्टी, पंजाब (30 लाख), उत्तराखंड (10 लाख), और गोवा (12.6 लाख) में खर्च करने के मामले में तीसरे नंबर पर है.


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राजनीतिक पार्टियां सोशल मीडिया पर ज्यादा खर्च क्यों नहीं कर रही हैं?

राजनीतिक पार्टियां डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए करती रही है. कोरोना महामारी से पहले भी राजनीतिक पार्टियों ने फेसबुक और ‘गूगल एड’ पर बड़ी राशि खर्च की है. माना जाता है कि फेसबुक, राजनीतिक पार्टियों के लिए सबसे काम का प्लैटफ़ॉर्म है. ऐसा इसलिए, क्योंकि ट्विटर राजनीतिक विज्ञापनों को पूरी तरह से ब्लॉक कर देता है. वहीं, गूगल, राजनीतिक विज्ञापन देने वालों को यह तय करने की पूरी छूट नहीं देती कि वह किसे अपना विज्ञापन दिखा सकते हैं (राजनीतिक विज्ञापन देने वालों को टारगेट ऑडियंस चुनने की पूरी छूट नहीं होती है).

जमीनी स्तर पर प्रचार करने को लेकर जारी पाबंदियों को देखते हुए यह अनुमान लगाया गया था कि पार्टियां अपने प्रचार बजट का ज़्यादातर हिस्सा फेसबुक पर खर्च करेंगी. साल 2017 के चुनाव में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियों ने कुल 300.23 करोड़ की राशि खर्च की थी. इस हिसाब से फेसबुक पर दिए गए विज्ञापनों पर खर्च की गई राशि बेहद मामूली है.

फेसबुक पर विज्ञापन देने में कम खर्च की एक वजह यह भी हो सकती है कि इस प्लैटफ़ॉर्म पर ज़्यादा खर्च करने की ज़रूरत ही नहीं है. ‘फेसबुक एड’ पर कम खर्च करके भी ज़्यादा लोगों को अपना विज्ञापन दिखाया जा सकता है. ‘फेसबुक एड मैनेजर’ पर ऑफर किए गए रेट के हिसाब से सिर्फ़ 10, 000 रुपये खर्च करके ही 70,000 से दो लाख लोगों तक पहुंचा जा सकता है. अगर एक विज्ञापन को 1.35 लाख लोगों तक पहुंचाने के लिए हर व्यक्ति पर लगभग 13 रुपए का खर्चा आता है – ऐसे में 1000 लोगों तक पहुंचने में लगभग 74 रुपये तो खर्च हो ही जाएंगे.

हिन्दी अखबार ‘दैनिक जागरण’ के दिल्ली संस्करण के पहले पन्ने पर विज्ञापन देने का रेट 55 लाख रुपये है. दिल्ली में इसका सर्कुलेशन तीन लाख है. अगर यह मानकर चलें कि एक अखबार को पूरा परिवार (तीन सदस्य) पढ़ता है, तब भी एक हजार लोगों तक इस विज्ञापन के पहुंचने में करीब 6,000 रुपये का खर्च आता है. इसका मतलब है कि फेसबुक पर विज्ञापन देना, अखबार में विज्ञापन देने के मुकाबले 80 गुना सस्ता है.

चंडीगढ़ की पॉलिटिकल कम्युनिकेशन फर्म आइडियाज़ फैक्ट्री के मुख्य रणनीतिकार सागर विश्नोई कहते हैं, ‘पारंपरिक मीडिया, चाहे वह प्रिंट हो, टीवी हो या कोई दूसरा विज्ञापन प्लैटफ़ॉर्म, के मुकाबले डिजिटल विज्ञापन किफायती है, अगर लोगों को सिर्फ अपना विज्ञापन दिखाना ही हो.’

वह कहते हैं कि डिजिटल विज्ञापन में उम्र, आय और जेंडर के हिसाब से टारगेट ऑडियंस चुनने की छूट होती है, जो पारंपरिक मीडिया प्लैटफ़ॉर्म पर मिलना आसान नहीं है.’

डिजिटल प्लैफ़ॉर्म की इन खूबियों के बावजूद राजनीतिक पार्टियां, पुराने तरीके से विज्ञापन देने के लिए ज़्यादा खर्च करने को क्यों तैयार हैं?

बीजेपी के आइटी सेल के प्रभारी अमित मालवीय ने प्रिंट के साथ बातचीत में कहा कि हर प्लैटफ़ॉर्म के अलग-अलग फ़ायदे हैं.

उन्होंने कहा कि पारंपरिक मीडिया के पास सीमित जगह और प्रसारण-समय होता है, इसलिए डिजिटल के मुकाबले उनका रेट ज़्यादा होता है. वहीं, डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म का इस्तेमाल अपने हिसाब से किया जा सकता है और लोगों तक उनकी सुविधा के हिसाब से अपनी बात पहुंचाई जा सकती है.

विश्नोई भी मानते हैं कि डिजिटल विज्ञापन, चुनावों में लोगों तक अपनी बात पहुंचाने वाले अन्य मीडिया के विकल्प नहीं हैं. उनके मुताबिक फेसबुक एड ‘ऊपरी खर्च है, जो सिर्फ़ डिजिटल प्लैटफ़ॉर्म पर मौजूदगी दिखाने भर के लिए है’. वह मानते हैं कि फेसबुक विज्ञापन देखकर कोई वोटर अपना विचार बदल ले यह जरूरी नहीं है.

उन्होंने कहा, ‘कोई नेता किसी वोटर के इलाके में कितनी बार गया, कितनी बार वह लोगों के साथ मीटिंग की और घर-घर जाकर प्रचार किया, यह सब ज़्यादा असर डालता है. भारत में एक बार धन्यवाद कह देने भर से ही मतदाताओं का विश्वास जीता जा सकता है. जमीनी प्रचार पर खर्च करना फेसबुक विज्ञापन पर खर्च करने के मुकाबले कहीं ज्यादा वोटर को प्रभावित करता है.

कोरोना के दौरान चुनावी खर्च बढ़ा

कोविड की वजह से चुनाव आयोग की ओर से लगाई गई पाबंदियों और डिजिटल प्रचार की वजह से चुनाव खर्च कम नहीं हुआ है.

असम, पश्चिम बंगाल, तमिल नाडु, केरल, और पुड्डुचेरी के साल 2021 के विधान सभा चुनावों में मुख्य पार्टियों (10 लाख रुपये से ज़्यादा खर्च करने वाली पार्टियां) ने 726 करोड़ रुपये की राशि खर्च की. साल 2016 के विधानसभा चुनावों में इन पार्टियों ने 320 करोड़ रुपये की राशि खर्च की थी. इससे पता चलता है कि पांच साल में चुनावी खर्च में दोगुना बढ़ोत्तरी हुई है.राजनीतिक पार्टियों की ओर से जारी खर्च के ब्यौरे के मुताबिक, बिहार में अक्टूबर 2020 में हुए विधानसभा चुनाव में पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में सिर्फ़ 0.15 फीसदी ज़्यादा खर्च किया गया. पहली बार लगाई गई पाबंदियों के ठीक बाद हुए इस चुनाव में स्थितियां पूरी तरह से ‘सामान्य’ नहीं हो पाई थी.

अशोका यूनिवर्सिटी के त्रिवेदी सेंटर फॉर पॉलिटिकल डेटा (टीसीपीडी) में असिस्टेंट प्रोफेसर और को-डायरेक्टर गिल्स वर्नियर के मुताबिक, कोरोना महामारी के बाद, चुनावी प्रचार का खर्च बढ़ने का मतलब है कि पार्टियां अपने फंड का इस्तेमाल नए और महंगे तरीके से प्रचार करने के लिए कर रही हैं.

वर्नियर ने दप्रिंट से बातचीत में कहा, ‘पूरी तौर पर डिजिटल इलेक्शन के लिए राजनीतिक पार्टियों को डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करने के लिए निवेश करना होगा. अगर आप अपने कार्यकर्ताओं को डिजिटल रैली में आने के लिए कहते हैं, तो उन्हें डिवाइसों, इंटरनेट कनेक्शन, और इन रैलियों से जुड़ने के लिए ज़रूरी साधनों की ज़रूरत पड़ेगी. महामारी के बाद, चुनावी खर्च बढ़ने की यह भी एक वजह हो सकती है.’

वह कहते हैं कि कैंपेन का लोकलाइजेशन भी चुनावी खर्च बढ़ने की एक वजह हो सकती है.

उन्होंने कहा, ‘कार्यकर्ताओं को वोटर से जोड़ने के लिए, राजनीतिक पार्टियां अपने स्थानीय लोगों तक पहुंचने में ज़्यादा तत्पर हो गयी हैं. इन कार्यकर्ताओं को पैसे भी देने होते हैं जो प्रचार खर्चों के बढ़ने का एक कारण हो सकता है.

यह स्थिति बड़ी पार्टियों के लिए अनुकूल है. ये पार्टियां वर्चुअल रैलियों और सोशल मीडिया पर लोगों को जुटाने के लिए इंन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर सकती हैं. वहीं, नई और छोटी पार्टियों को इस स्थिति में नुकसान होगा.

लोकनीति के सह-संस्थापक संजय कुमार कहते हैं, ‘निश्चित तौर पर (छोटी पार्टियां) महारथियों से मात खाएंगे. बड़ी पार्टियों के पास सोशल मीडिया के लिए रणनीति बनाने का कई सालों का तर्जु़बा है. उनके पास सोशल मीडिया का अनुभव है. इसके लिए उनके पास टीम भी है, जो छोटी पार्टियों के पास नहीं है.

लोकनीति, थिंक टैंक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) की एक इकाई है.

उनके मुताबिक चुनाव आयोग को पाबंदियों की घोषणा एक साल पहले ही कर देनी चाहिए थी, जिससे सभी पार्टियों को बराबरी का मौका मिल पाता.

कुमार ने कहा, ‘इतने कम समय में डिजिटल कैंपेन के लिए इंन्फ्रास्ट्रक्चर विकसित कर पाना छोटी पार्टियों के लिए संभव नहीं है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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