नई दिल्ली: सोमवार को मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लिखे एक पत्र में भाजपा विधायक सुवेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर पलटवार किया. उन्होंने कहा कि राज्य में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, SIR, को रोकने की उनकी मांग “हार स्वीकार करने से कम नहीं” है.
ममता ने 3 जनवरी को कुमार को लिखे पत्र में चल रहे SIR के दौरान सामने आ रही “गंभीर अनियमितताओं, प्रक्रियागत उल्लंघनों और प्रशासनिक चूकों” को लेकर “गहरी चिंता” जताई थी. इसी आधार पर उन्होंने आयोग से इस प्रक्रिया को रोकने, खामियों को तुरंत दूर करने, कमियों को ठीक करने और जरूरी सुधार करने का आग्रह किया था.
उनके पत्र में कहा गया था, “अगर इसे मौजूदा रूप में जारी रहने दिया गया, तो इससे अपूरणीय नुकसान होगा, योग्य मतदाताओं का बड़े पैमाने पर मताधिकार छिन जाएगा और लोकतांत्रिक शासन के मूल सिद्धांतों पर सीधा हमला होगा.”
इसके जवाब में पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुवेंदु अधिकारी ने कहा कि ममता का “आक्रोश एक उलटी सच्चाई से पैदा हुआ है. SIR उनके दल की 2026 के विधानसभा चुनावों की संभावनाओं के लिए बेहद नुकसानदेह साबित हो रहा है, क्योंकि यह ‘फर्जी’, काल्पनिक मतदाताओं, मृतकों के नाम और अवैध घुसपैठियों को उजागर कर रहा है, जिन्हें उनके प्रशासन और पार्टी कार्यकर्ताओं ने व्यवस्थित रूप से संरक्षण दिया और जिन पर वे फलते-फूलते रहे”.
उन्होंने आरोप लगाया कि ममता का अपना प्रशासन और पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, की मशीनरी ने SIR को कमजोर करने के लिए मिलीभगत की है. उन्होंने पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के मगराहाट में एक SIR सुनवाई केंद्र के दौरे के दौरान मतदाता सूची पर्यवेक्षक सी. मुरुगन की गाड़ी को नुकसान पहुंचाए जाने की घटना का हवाला दिया, जहां प्रदर्शनकारी भीड़ ने चुनाव अधिकारी का घेराव किया था.
अधिकारी ने ममता के कई आरोपों का जवाब भी दिया.
मुख्यमंत्री ने लिखा था कि पर्याप्त तैयारी और आधार कार्य के बिना जिस जल्दबाजी में SIR किया जा रहा है, उसने “पूरी प्रक्रिया को मूल रूप से त्रुटिपूर्ण बना दिया है”.
उन्होंने यह भी कहा था कि अलग-अलग राज्य “अलग-अलग मानदंड अपना रहे हैं और समय-सीमाएं मनमाने ढंग से बदली जा रही हैं, जो स्पष्ट रूप से स्पष्टता, तैयारी और प्रक्रियागत समझ की कमी को दर्शाता है”.
उन्होंने आईटी सिस्टम के दुरुपयोग के जरिए, उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना और निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों, EROs, की जानकारी या मंजूरी के बिना, मतदाताओं के नाम बैकएंड से हटाए जाने के आरोपों का भी जिक्र किया था.
ममता के पत्र में कहा गया था कि प्रवासी मजदूरों के साथ-साथ बुजुर्ग, अस्वस्थ और गंभीर रूप से बीमार नागरिकों को भी सुनवाई के लिए बुलाया जा रहा है. उन्होंने बिहार में अपनाई जा रही प्रक्रिया और स्वीकार किए जा रहे दस्तावेजों की तुलना पश्चिम बंगाल से करते हुए कहा था कि यहां परिवार रजिस्टर को पहचान के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा रहा है. साथ ही विभिन्न राज्य प्राधिकरणों द्वारा जारी स्थायी निवास प्रमाण पत्र और डोमिसाइल सर्टिफिकेट भी मान्य नहीं किए जा रहे हैं.
अपने पत्र में अधिकारी ने बैकएंड से नाम हटाए जाने के मुख्यमंत्री के आरोपों को “उकसाने वाली कल्पना” बताया. उन्होंने सुनवाई से पार्टी द्वारा नियुक्त बूथ लेवल एजेंटों को बाहर रखने का भी समर्थन किया और कहा कि यह “संवेदनशील सत्यापन के दौरान निष्पक्षता बनाए रखने के लिए जरूरी है, ताकि टीएमसी के शासन में पहले देखी गई कैडर-प्रेरित बाधाओं को रोका जा सके”.
उन्होंने बुजुर्गों या अस्वस्थ लोगों को होने वाली परेशानियों के दावों को “बहुत ही दुर्लभ घटनाएं और मूल रूप से बढ़ा-चढ़ाकर किया गया प्रचार” बताया.
इसलिए, ममता की मांग के उलट, उन्होंने चुनाव आयोग से आग्रह किया कि वह “लोकतांत्रिक जनता के अडिग समर्थन से मजबूत होकर, बिना डरे SIR को जारी रखे”.
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