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Sunday, 3 December, 2023
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देवेगौड़ा के ‘ट्रांसलेटर’ – सीएम इब्राहिम, एक राजनेता जो राजनीति से ज्यादा वाक्पटुता के लिए पॉपुलर हैं

74 साल के इब्राहिम शायद ही कभी खबरों से दूर रहे हों, शायद ही कभी सही वजहों के कारण. पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण जद (एस) नेता को पार्टी के नेता ने निकाल दिया है.

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बेंगलुरु: 1980 के दशक की शुरुआत में, कर्नाटक विधान परिषद में एक गरमागरम चर्चा हुई, जनसंघ के एक वरिष्ठ सदस्य ए.के.सुब्बैया ने गुंडू राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के तहत खाद्य और नागरिक आपूर्ति मंत्री चांद महल इब्राहिम पर उनकी समृद्धि और चमकती रोलेक्स घड़ी को लेकर निशाना साधा.

इब्राहिम, जो मजदूरों के नेता और समाजवादी वक्ता के रूप में आमजन में पॉपुलर हैं, फाल्कन के प्रतीक चिन्ह वाली एक घड़ी पहने हुए दिखाई देते हैं जिसके बाद इस नवनियुक्त मंत्री ने कहा कि यह सऊदी राजकुमार की ओर से एक उपहार है.

वह एक ऐसा समय था जहां घोटालों या घोटालों की तुलना में आडंबर को जनता से अधिक तिरस्कार मिला था.

घड़ी की कीमत विदेशी कॉन्ट्रीब्यूशन रेगुलेशन एक्ट के तहत पर तय कीमत से अधिक हो गई, जिससे सुब्बैया को यह मुद्दा उठाना पड़ा.

इब्राहीम ने 2016 में टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया था जब तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के खिलाफ भी इसी तरह का आरोप लगाया गया था, “सुब्बैया ने आरोप लगाया कि यह प्रतीक चिन्ह मेरे लिए यूएई जाने का पासपोर्ट था. राजनीतिक हलकों में दोस्तों के लिए एक-दूसरे को उपहार देना आम बात है. ”

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“वह समय वह दौर था जब ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, प्रतिबद्धता को गिना जाता था. उस समय इस रोलेक्स घड़ी के साथ एक समस्या थी. इससे उन्हें (इब्राहिम को) अपना मंत्री पद गंवाना पड़ा,” वरिष्ठ कांग्रेस नेता बी.एल.शंकर ने दिप्रिंट को बताया.

74 वर्षीय व्यक्ति शायद ही कभी खबरों से दूर रहे हों, हालांकि उनका हमेशा चर्चा में रहने की वजह सही नहीं रही है. शुक्रवार को इब्राहिम को पूर्व प्रधान मंत्री एचडी देवेगौड़ा ने ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के लिए जनता दल (सेक्युलर) (जेडीएस) से निष्कासित कर दिया है.

कांग्रेस और जनता पार्टी, फिर कांग्रेस और फिर जद (एस) के बीच यात्रा करने के बाद, नेता अब किसी पार्टी में नहीं हैं, भले ही वह देवेगौड़ा के नेतृत्व वाले संगठन पर नियंत्रण पाने की कोशिश कर रहे हैं.

उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ जद (एस) गठबंधन का विरोध किया है और अपने रुख के लिए समर्थन जुटाने की कोशिश की है.

इब्राहिम ने अक्टूबर के बीच में दिप्रिंट को बताया, ”पुरानी जनता पार्टी को वापस लाने के लिए हम जल्द ही अहमदाबाद या बेंगलुरु में एक बैठक करेंगे, जो बीजेपी के साथ गठबंधन के खिलाफ हैं.” तब से उन्हें बहुत कम सफलता मिली है.


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‘लालच उसे मजबूर कर रहा है’

इब्राहिम को वर्षों से उनकी तीक्ष्ण बुद्धि और जबरदस्त वक्ता के तौर पर जाना जाता है और शायद ही उन्हें कभी उनकी राजनीति के लिए जाना जाता है. यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि उसने बहुत कुछ हासिल नहीं किया है, लेकिन ज़्यादातर इसलिए क्योंकि वह हमेशा सही समय पर सही जगह पर था.

1996 में जब देवेगौड़ा प्रधान मंत्री बने तो उन्हें नागरिक उड्डयन, पर्यटन, सूचना और प्रसारण मंत्री बनाया गया.

लेकिन हाल ही में, उन्हें ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाने लगा है जो अपने “लालची” रवैये के कारण अधिक चूक गया है.एक जद (एस) नेता ने कहा, “वह बहुत लालची हैं. एमएलसी (कांग्रेस में) के रूप में तीन साल रहे थे, लेकिन अपर हाउस में एलओपी नहीं बनाए जाने के बाद वह शिफ्ट हो गए. उन्होंने सोचा था कि गठबंधन सरकार होने पर वह मंत्री बन सकते हैं, लेकिन कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल गया. ”
इब्राहिम सिद्धारमैया के कट्टर समर्थक हैं और 2008 में उनके साथ कांग्रेस में आए थे. बेंगलुरु के बेन्सन शहर में उनके गृह कार्यालय में प्रवेश करते समय सिद्धारमैया के साथ हंसती हुई फोटो दिखाई देती है वह उनकी है.

इब्राहिम ने उस समय एक चुनावी रैली में कहा था,“जद(एस) एक पुरानी बस है. इसका इंजन सिद्धारमैया थे और गियरबॉक्स मैं था. मेरे जाने के बाद से केवल स्टीयरिंग कुमारस्वामी के पास रह गई है.”

ऐसा कोई निर्वाचन क्षेत्र नहीं जहां वह पकड़ बनाने में असमर्थ रहे हों सिर्फ दो नेता देवेगौड़ा और सिद्धारमैया ही हैं जिन्होंने उनकी महत्ता को समझा है.

जद (एस) के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि एक समय उन्हें देवेगौड़ा का “अनुवादक” कहा जाता था. देवेगौड़ा प्रधानमंत्री बनने के बाद हिंदी पर कोई अधिकार नहीं था. वह जद (एस) प्रमुख और यहां तक कि उनके ‘प्रवक्ता’ के करीबी विश्वासपात्र बने रहे.

जब जद (एस) प्रमुख प्रधानमंत्री थे, इब्राहिम ने एक बार इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन प्रधान संपादक (अब दिप्रिंट के प्रधान संपादक) शेखर गुप्ता से शिकायत की थी कि केवल देवेगौड़ा की सोते हुए तस्वीरें ही खबरों में हैं. .

गुप्ता ने ‘नेशनल इंट्रेस्ट’ में लिखा.“अरे भाई, ये आदमी (देवेगौड़ा) सारा दिन प्रधानमंत्री नहीं है. वह भारत के प्रधानमंत्री सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे तक ही हैं. शाम 7 बजे से आधी रात तक, वह कर्नाटक के मुख्यमंत्री हैं, आधी रात 2 बजे से वह हसन के जिला मजिस्ट्रेट हैं, फिर सुबह 4.30 बजे उन्हें पूजा के लिए उठना होता है, फिर नाश्ता करना होता है और फिर वापस भारत के प्रधान मंत्री बनना होता है. तो वह कब सो सकता है?”

वक्ता, राजनेता नहीं’

बेंगलुरु को जल्द हवाईअड्डा नहीं मिलने के लिए इब्राहिम को दोषी ठहराया जाता है. 1995-96 में, नमक-से-सॉफ़्टवेयर समूह टाटा की बेंगलुरु के ठीक बाहर, बिदादी के पास एक हवाई अड्डा बनाने की योजना थी. लेकिन तत्कालीन नागरिक उड्डयन मंत्री इब्राहिम के साथ बातचीत विफल रही और 2008 तक शहर को एक नया हवाई अड्डा नहीं मिला, जैसा कि इस प्रकरण की उस दौरान की जानकारी रखने वाले दो नेताओं ने दिप्रिंट को बताया.

लेकिन उनकी सबसे बड़ी संपत्ति उनका सार्वजनिक स्थल पर बोलने का कौशल था. 1970 के दशक के अंत में, बेंगलुरु के शेषाद्रिपुरम में नेहरू पार्क में इब्राहिम को सुनने के लिए लोग काफी दूर से आते थे. अपने चौड़े फ्रेम वाले काले चश्मे और अद्वितीय वक्ता के साथ, इब्राहिम भीड़ को खींचने वाला था.

कम से कम तीन दशकों से उनके साथ जुड़े एक व्यक्ति ने कहा, हिंदू धर्मग्रंथों के साथ-साथ कुरान का भी उद्धरण देते हुए, इब्राहिम को “अशिक्षित लोगों द्वारा एक शिक्षित राजनीतिज्ञ” के रूप में देखा जाता था.

यह उर्दू, हिंदी और कन्नड़ सहित कई भाषाओं को वह धारा प्रवाह बोलते थे. जिसकी वजह से वह ‘मुस्लिम नेता’ के रूप में उभरे .

उन्होंने कांग्रेस नेताओं जाफर शरीफ, अज़ीज़ सैत और अन्य को घेरने की कोशिश की, लेकिन बहुत कम सफलता मिली. किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम में, इब्राहिम भीड़ का मनोरंजन करते रहे और तब तक व्यस्त रखा जब तक कि बड़े नेता नहीं आ जाते थे.

जद (एस) के एक दिग्गज ने कहा, “ज्यादातर समय वह अपने भाषणों में उपनिषदों, बसवन्ना का उद्धरण देते हैं. इस तरह वह खुद को चालाक पढ़ा लिखा और खुद को एक बुद्धिजीवी के रूप में पेश करना चाहते हैं.”

इब्राहिम से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन संपर्क नहीं किया जा सका है.

(संपादन/पूजा मेहरोत्रा)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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