Saturday, 25 June, 2022
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आम आदमी पार्टी के ‘भंडारी’ कार्ड खेलने के पहले गोवा में बहुत कम थी जातिगत राजनीति

गोवा विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने भंडारी समुदाय के अमित पालेकर को सीएम कैंडीडेट घोषित करके जातिगत राजनीति को हवा दे दी है. हालांकि, पालेकर का कहना है कि वे कैंपेन के दौरान जाति की बात नहीं करते.

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मुंबई: गोवा के लिए आम आदमी पार्टी (आप) के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार अमित पालेकर जब अपनी जानी-पहचानी आधी बांह की शर्ट और जींस या कैजुअल ट्राउज़र पहने सांताक्रूज में घर-घर जाकर प्रचार करते हैं, तो वह लोगों से उन्हें एक मौका देने को कहते हैं.

राजनीति की शुरुआत करने वाले, वह मतदाताओं को अपना सारा समय देने का वादा करते हैं. वह लोगों को विभिन्न योजनाओं के बारे में भी बताते हैं जिन्हें अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आप ने सत्ता में चुने जाने पर शुरू करने की योजना बनाई है.

लेकिन एक बात जो पेशे से वकील पालेकर, नहीं बताते हैं, वह है उनकी जाति ‘भंडारी’. गोवा में जाति की राजनीति हमेशा से कम रही है, और पालेकर, जो कि गोवा के मूल निवासी हैं, इस बात को बहुत अच्छे से जानते हैं.

लेकिन, आप ने पहले तटीय राज्य की प्रमुख भंडारी जाति से एक सीएम नियुक्त करने का वादा करके गोवा की राजनीति में जातीय समीकरणों को मजबूती से फोकस में ला दिया. इसके बाद आगे भंडारी जाति के अमित पालेकर को अपना सीएम उम्मीदवार घोषित करके एक कदम और आगे बढ़ गए.

हालांकि, गोवा के वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक टिप्पणीकार किशोर नाइक गांवकर का कहना है कि गोवा में अंदर ही अंदर हमेशा से जातिगत राजनीति रही है.

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उन्होंने दिप्रिंट को बताया, ‘अब तक कभी भी खुले तौर पर जातिगत राजनीति नहीं थी और लोगों को लगता है कि यह ठीक है. गोवा एक धर्म निरपेक्ष जगह है जहां हर कोई सद्भाव के साथ रहता है. लोग जाति को लेकर झगड़े नहीं करते, लेकिन साथ ही हर कोई चाहता है कि राजनीतिक क्षेत्र में उनकी जाति का प्रतिनिधित्व बना रहे.’

आगे उन्होंने कहा, ‘आप ने गोवा में पहली बार जातिगत राजनीति खुले तौर पर पेश कर दिया है. यह अपने आप में बिल्कुल नए तरह का प्रयोग होगा और चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि यह कितनी सफल रही.’


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गोवा में जातिगत समीकरण

भंडारी समुदाय गोवा के अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) वर्ग में सबसे ज्यादा है, जो राज्य की ओबीसी आबादी का लगभग 60 प्रतिशत है. राज्य की आबादी में हिंदू लगभग 65 प्रतिशत हैं और उनमें से आधे ओबीसी हैं. यह संख्या के मामले में भंडारियों को काफी सबल बनाता है.

हालांकि, पुर्तगाली शासन से गोवा की मुक्ति के 60 वर्षों में अब तक कुल 13 लोग मुख्यमंत्री बन चुके हैं जिनमें से कुछ एक से ज्यादा बार भी सीएम रहे. लेकिन इनमें से केवल एक व्यक्ति- राम नाइक- ही भंडारी जाति के रहे हैं.

नाइक जनवरी 1991 और मई 1993 के बीच गोवा के मुख्यमंत्री थे, लेकिन उनका मुख्यमंत्री पद उनकी भंडारी पहचान के कही ज्यादा राजनीतिक साजिशों का परिणाम था. कांग्रेस ने नाइक की मदद से महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी (एमजीपी) की गठबंधन सरकार को गिरा दिया था और अपनी सरकार बनाई थी और इसकी एवज में नाइक को सीएम के पद से पुरस्कृत किया गया था. हालांकि, इसके बाद नाइक दल-बदल विरोधी अधिनियम के तहत अयोग्य घोषित होने वाले पहले सीएम भी बन गए.

राम नाइक का राजनीतिक सफर दल-बदल से भरा हुआ है. एमजीपी के साथ राजनीतिक करियर की शुरुआत करना, फिर कांग्रेस में शामिल होना, इसके बाद कांग्रेस की सरकार गिराने में बीजेपी की मदद करना और दुबारा फिर कांग्रेस में शामिल होने के बाद राम नाइक ने फिर एक बार विधानसभा चुनाव के पहले बीजेपी ज्वाइन कर लिया है.

भंडारियों के बाद हिंदुओं में सबसे बड़ा वोटर ग्रुप मराठा और अनुसूचित जाति का है. गोवा के मौजूदा सीएम प्रमोद सावंत मराठा समुदाय से हैं.

विश्लेषकों के मुताबिक, सारस्वत ब्राह्मण गोवा की आबादी का एक बड़ा प्रतिशत नहीं हैं, लेकिन माना जाता है कि राज्य की अर्थव्यवस्था की बागडोर उन्हीं के हाथ में है इसलिए उन्हें राय बनाने वालों में शुमार किया जाता है. गोवा में सारस्वत ब्राह्मण समुदाय से भी कुछ मुख्यमंत्री रहे हैं. जैसे- भाजपा के दिवंगत मनोहर पर्रिकर, कांग्रेस के प्रतापसिंह राणे और दिगंबर कामत.

राजनीतिक विश्लेषक और वकील क्लियोफाटो कौटिन्हो ने दिप्रिंट को बताया, ‘हर पार्टी ने चुपके चुपके सारस्वत ब्राह्मणों को धोखा दिया और वे गोवा में प्रमुख ओपीनियन-मेकर रहे हैं. कुछ उम्मीदवार ऐसे भी हैं जो सारस्वत फैक्टर के कारण ही साफतौर पर जीत जाते हैं, जैसे कि दिगंबर कामत (कांग्रेस), रोहन खौंटे (भाजपा) और विजय सरदेसाई (गोवा फॉरवर्ड पार्टी). यदि उत्पल पर्रिकर (निर्दलीय) जीतते हैं, तो यह भी सारस्वत फैक्टर के कारण ही होगा.’

विश्लेषकों का कहना है कि इसके अलावा कैथोलिक गोवा की आबादी का लगभग 23 प्रतिशत हैं और सभी पार्टियां यह सुनिश्चित करके इस पर ध्यान केंद्रित करती हैं कि बड़ी संख्या में टिकट कैथोलिक उम्मीदवारों को जाएं, .

दबे तौर पर है जातिगत राजनीति

गांवकर के अनुसार, गोवा में जातिगत राजनीति किस तरह से घुली है इसको ऐसे समझा जा सकता है कि कैसे एमजीपी पहली बार ‘बहुजन’ पार्टी होने के कारण सत्ता में आई थी.

गांवकर ने कहा, ‘1963 में गोवा के पहले चुनाव में केरल को छोड़कर देश में हर जगह कांग्रेस का शासन था. कांग्रेस गोवा में भी चुने जाने के लिए आश्वस्त थी, लेकिन एमजीपी की एकतरफा जीत हुई.’

गोवा के पहले सीएम एमजीपी नेता दयानंद बांदोडकर ने आम लोगों, किसानों और छोटे दुकानदारों को टिकट दिया, जबकि कांग्रेस की उम्मीदवारों की सूची में उद्योगपति, जमींदार और व्यवसायी शामिल थे.

गांवकर ने कहा, ‘जब चुनाव परिणाम आए, तो एक किसान ने एक जमींदार को हराया, एक आम दुकानदार ने एक उद्योगपति पर जीत हासिल की थी. जिसने एक बड़ी सनसनी पैदा कर दी. पुर्तगालियों ने अभी-अभी ही गोवा को छोड़ा था, इसलिए औपनिवेशिक प्रभाव जो जनता पर था उसका भी असर चुनाव में देखने को मिला. चुनाव प्रत्यक्ष रूप से जातिगत आधार पर नहीं लड़ा गया था, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से जाति का प्रभाव जरूर था.’

आज, गोवा की राजनीति में एमजीपी का महत्त्व कम हो गया है और एक ‘बहुजन’ पार्टी के रूप में इसकी पहचान भी कमजोर हुई है क्योंकि मौजूदा वक्त में इसका नेतृत्व दो ब्राह्मण- धवलीकर भाइयों के द्वारा किया जा रहा है.

गोवा की दबी हुई जातिगत राजनीति को भी दृढ़ता से महसूस किया गया था क्योंकि भाजपा के मनोहर पर्रिकर सदी के अंत में राज्य के बड़े नेता के रूप में उभर कर समाने आए.

2012 के गोवा विधानसभा चुनावों से पहले, भाजपा में साफतौर पर एक जाति-आधारित दरार देखने को मिल रही थी. जिसमें एक तरफ पर्रिकर थे जो कि गौड़ सारस्वत ब्राह्मण थे तो दूसरी तरफ श्रीपद नाइक थे जो कि भंडारी समुदाय से थे. ये दोनों महत्त्वाकांक्षी पावर सेंटर के रूप में उभर रहे थे.

टिकट न दिए जाने के बाद, कुछ समय के लिए तो नाइक ने बीजेपी के लिए कैंपेन करने से इनकार कर दिया. कांग्रेस इस मौके का फायदा उठाकर बीजेपी की आलोचना करते हुए कहा कि पारंपरिक रूप से ब्राह्मण और बनिया पार्टी के रूप जानी-जाने वाली बीजेपी गोवा में अपने ही कुलीन वर्ग के कार्यकर्ताओं को बहुजन समाज की तुलना में ज्यादा तवज्जो दे रही है.

पर्रिकर और नाइक के बीच इस दरार में उच्च जाति का के प्रभाव को जीत मिली. पार्टी सूत्रों ने बताया कि भाजपा ने नाइक को उत्तरी गोवा से लोकसभा उम्मीदवार और केंद्रीय कैबिनेट बर्थ देने के वादे के साथ शांत कर दिया.

कौटिन्हो ने दिप्रिंट को बताया, ‘पिछले दशक में, पर्रिकर की छवि को सावधानीपूर्वक एक ‘बहुजन’ नेता के रूप में गढ़ने की कोशिश की गई, जिसकी पूरे गोवा में पैठ थी. एक भावना यह भी है कि भाजपा ने भंडारी समुदाय को निराश किया है. आगे उन्होंने कहा कि रवि नाइक का हाल में पार्टी में शामिल करके बीजेपी इसकी भरपाई करना चाहती है.

उन्होंने कहा, ‘इस भावना को आप द्वारा भुनाने की कोशिश की जा रही है लेकिन देखना होगा क्या वह इसका लाभ ले पाएगी.’


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‘आप का वादा जाति की राजनीति नहीं’

भाजपा के गोवा इकाई के अध्यक्ष सदानंद शेट तानावडे के अनुसार, ‘गोवा में जाति की राजनीति ने न कभी काम किया है और न ही कभी काम करेगी.’

उन्होंने कहा, ‘गोवा, गोवा है. यहां जाति की राजनीति नहीं होती. हर कोई चाहता है कि उनके समुदाय का प्रतिनिधित्व हो, लेकिन वे इसे सामाजिक कार्य के माध्यम से करते हैं, न कि खुली राजनीति के माध्यम से.’

वह कहते हैं, ‘गोवा में पुराने राजनीतिक दल यह सब जानते हैं, इसलिए गोवा की कोई भी पार्टी जातिगत राजनीति में अपने आपको शामिल नहीं करेगी. कांग्रेस भी यहां जातिगत राजनीति नहीं करती. तो फिर यह कौन करता है? जो लोग गोवा को नहीं समझते हैं.

इस बीच, चुनाव प्रचार से दोपहर का ब्रेक लेते हुए, गोवा में आप के सीएम उम्मीदवार पावेकर ने दिप्रिंट को बताते हैं कि वह पूरे मुद्दे को इसके उलट देखते हैं.

उन्होंने कहा, ‘मेरे लिए, अगर एक समुदाय जिसकी गोवा में की आबादी में अच्छी-खासी जनसंख्या है उसे मुख्यधारा की राजनीति में नेतृत्व करने का मौका नहीं दिया जाता है, तो वह जाति की राजनीति है. जब हम प्रचार करते हैं, तो मेरी भंडारी पहचान के बारे में हम में से कोई भी बात नहीं करता है. अगर मैं गोवा का सीएम बन सकता हूं तो ऐसे व्यक्ति के रूप में मेरी यह जिम्मेदारी है कि मैं हर वर्ग को साथ लेकर चलूं.’

उन्होंने कहा, ‘अगर अन्याय को एक ऐसे समुदाय के एक सक्षम व्यक्ति को नेतृत्व का अवसर देकर दूर किया जा सकता है जिसे पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं मिला है तो यह जाति की राजनीति नहीं है.’

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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