Wednesday, 29 June, 2022
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ज्ञानवापी मस्जिद विवाद पर शिवसेना बोली- 2024 के चुनावों के मद्देनजर सांप्रदायिक मुद्दे भड़का रही BJP

शिवसेना के मुखपत्र 'सामना' के संपादकीय में लिखा गया है कि भाजपा के ‘विकास मॉडल’ में मंदिरों-मस्जिदों पर बहस जैसे सांप्रदायिक मुद्दों को आगे बढ़ाना शामिल है.

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मुंबई: शिवसेना ने शुक्रवार को अपने मुखपत्र ‘सामना’ के संपादकीय में लिखा कि भाजपा 2024 के लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए ज्ञानवापी मस्जिद विवाद जैसे सांप्रदायिक मुद्दों को हवा दे रही है.

वाराणसी स्थित ज्ञानवापी मस्जिद के परिसर में एक ‘शिवलिंग’ पाए जाने के दावे पिछले कुछ समय से चर्चा का विषय बने हुए हैं. यद्यपि ये मामला कोर्ट में विचाराधीन है, भाजपा नेताओं ने ताजा घटनाक्रम का हवाला देते हुए धर्म स्थल अधिनियम पर फिर से विचार करने की मांग की है, वहीं, कुछ नेताओं ने काशी और मथुरा में मंदिरों के ‘पुनर्ग्रहण’ की भी मांग की है.

अपने हिंदुत्व के ब्रांड को पूर्व सहयोगी भाजपा की तुलना में अधिक सच्चा बताने की कोशिश में लगी उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली पार्टी शिवसेना ने यह भी कहा है कि भाजपा के ‘विकास मॉडल’ में मंदिरों-मस्जिदों पर बहस जैसे सांप्रदायिक मुद्दों को भड़काना शामिल है.

संपादकीय में लिखा गया है, ‘इन दिनों, ऐसा लगता है कि भाजपा ने वाराणसी की ज्ञानवापी मस्जिद को अपना एजेंडा बना लिया है… भाजपा में लोग बात कर रहे हैं कि कैसे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ लखनऊ का नाम लक्ष्मणपुर करने जा रहे हैं. भाजपा का विकास मॉडल इसी तरह चल रहा है.’

संपादकीय में आगे कहा गया है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2019 में अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर बनाने के पक्ष में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इसे ‘किसी भी कड़वाहट को भूलने का दिन’ कहा था. आरएसएस ने भी ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की ईदगाह के बारे में पूछे जाने पर कहा था कि ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के कारण यह अयोध्या आंदोलन से जुड़ा है, उसने यह बात आंदोलन में अपनी भूमिका को अपवाद बताते हुए कही थी.

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‘लेकिन, जैसे-जैसे 2024 के लोकसभा चुनाव करीब आ रहे हैं, कोई भी रुख में बदलाव देख सकता है. अब, एआईएमआईएम (असदुद्दीन) ओवैसी ने अपने तरीके से मथुरा और ज्ञानवापी मस्जिदों के बारे में बात की है. इन सज्जन ने कहा है कि वे एक और मस्जिद की कुर्बानी नहीं होने देंगे.’

संपादकीय में लिखा है, ‘इस सबको देखते हुए ये संकेत तो साफ हैं कि 2024 के चुनाव से पहले वास्तव में क्या होगा और किन मुद्दों पर चुनाव लड़ा जाएगा.’


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शिवसेना का हिंदुत्व बनाम भाजपा का हिन्दुत्व

ज्ञानवापी विवाद और मंदिर-मस्जिद को लेकर बड़े पैमाने पर जारी राजनीति पर शिवसेना का रुख महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ठाकरे के इस ऐलान पर केंद्रित है कि उनकी पार्टी का हिंदुत्व भाजपा से अलग है और इसका मूल ‘सांप्रदायिकता नहीं बल्कि राष्ट्रवाद’ है.

पिछले हफ्ते ही, शिवसेना ने ‘हृदयात राम, हाथला काम (दिल में राम, हाथ में नौकरी)’ के नारे को अपना हिंदुत्व बताते हुए भाजपा पर आरोप लगाया था कि वह ‘वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए नकली हिंदुत्व’ का सहारा ले रही है.

भाजपा का हिंदुत्व शिवसेना के विपरीत विकासोन्मुखी नहीं होने के अपने रुख को दोहराते हुए पार्टी ने शुक्रवार को सामना में अपने संपादकीय में उत्तर प्रदेश के स्कूलों में कथित तौर पर दीवारें और शौचालय नहीं होने जैसी खबरों का जिक्र किया.

इसमें कहा गया है कि मंदिर-मस्जिद की राजनीति और एआईएमआईएम नेता अकबरुद्दीन ओवैसी के औरंगाबाद स्थित औरंगजेब के मकबरे का दौरा करने जैसे मुद्दों पर बहस का कोई अंत नहीं है ‘क्योंकि भड़काऊ मुद्दों से ही राजनीतिक फायदा मिलता है.’

संपादकीय में आगे लिखा गया, ‘लेकिन, पेट की आग इन लपटों से ज्यादा महत्वपूर्ण है. हमारा पड़ोसी देश (श्रीलंका) इस बात का जीवंत उदाहरण है कि अगर आग नियंत्रण से बाहर हो जाए है तो क्या हो सकता है.’

शिवसेना के मुखपत्र में यह भी कहा गया कि 6.5 करोड़ से कुछ ही अधिक की आबादी वाला फ्रांस राफेल की आपूर्ति कर रहा है और 130 करोड़ की आबादी वाला भारत मंदिरों-मस्जिदों पर बहस में ही उलझा है.

संपादकीय में कहा गया है, ‘महंगाई, भूख और आर्थिक संकट जैसे सवालों को धार्मिक मुद्दों से दबाया नहीं जा सकता है. इसलिए मंदिर-मस्जिद को लेकर विवाद भड़काते समय सभी को संयम बरतना चाहिए.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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