Monday, 27 June, 2022
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‘सुन लीजिए सर’: सोनू ने बिहार में शिक्षा और शराबबंदी की हकीकत उघाड़ दी, कब सुनेंगे नीतीश कुमार

फिलहाल तो बिहार देश का एक ऐसा अभिशप्त प्रदेश है जो खराब शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर बेरोजगारी का गहरा दंश झेल रहा है और संभावनाओं की तलाश में लगातार राज्य छोड़कर निकलने को मजबूर हो रहा है.

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बिहार इन दिनों एक बार फिर से सुर्खियों में है. यूं तो राजनीतिक तौर पर वहां की सक्रियता अक्सर सभी का ध्यान खींचती हैं लेकिन बीते दिनों जो घटना हुई उसने दो स्तर पर राज्य की बदहाली को उघाड़ कर रख दिया.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जब सत्ता में 15 साल से ज्यादा का वक्त हो गया है, तब तो वो खुद भी ये नहीं चाहेंगे कि वहां की बुनियादी सुविधाओं को लेकर कोई नाबालिग बच्चा ऐसे तीखे सवाल कर बैठे कि पूरे सरकारी महकमे के कान खड़े हो जाएं.

ऐसा ही बीते दिनों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह क्षेत्र नालंदा में एक कार्यक्रम के दौरान हुआ जब सोनू नाम के 11 साल के एक बच्चे ने कहा कि ‘सुन लीजिए सर… हमको स्कूल में शिक्षा चाहिए…हमारा परिवार हमको पढ़ाना नहीं चाहता है…हमको आईएएस, आईपीएस बनना है. सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है.’

साथ ही सोनू ने नीतीश कुमार से कहा कि उसके पिता सारा पैसा शराब पर खर्च कर देते हैं.

शिक्षा की बदहाली और शराबबंदी वाले राज्य में शराब पीते लोग- ये ही दो ऐसे मुद्दे हैं जिसने नीतीश कुमार को जरूर कुछ देर के लिए ठहर कर सोचने को मजबूर किया होगा कि आखिर 15 साल बाद भी राज्य इस कदर क्यों बदहाल है?

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हालांकि बेरोजगारी भी बिहार के लिए बड़ा संकट का सबब बना हुआ है जिसकी बानगी बीते दिनों पटना से लेकर कई जिलों तक में देखने को मिल चुकी है. इसी साल जनवरी में आरआरबी-एनटीपीसी की परीक्षा में धांधली को लेकर बिहार में छात्रों का गुस्सा पूरे राज्य में देखने को मिला था.


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बिहार में लाखों सोनू हैं जिनकी पुकार मुख्यमंत्री तक नहीं पहुंचती

सोनू नाम का बच्चा जरूर बिहार के साथ ही पूरे भारत में वायरल हो गया हो और रातोंरात छा गया हो लेकिन राज्य में ये सिर्फ एक सोनू की कहानी नहीं है जो शिक्षा के अभाव के साथ ही उसकी खराब गुणवत्ता का भी शिकार हो रहा है.

2022 में जब सोनू अपने गांव से कुछ किलोमीटर का सफर तय कर मुख्यमंत्री तक पहुंचता हुआ ये सवाल करता है कि उसे अच्छी शिक्षा नहीं मिल रही है तो हमें 2015 के उस वीडियो को भी याद कर लेना चाहिए जब मंच पर मुख्यमंत्री के सामने एक छोटे बच्चे ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था और सरकारी अधिकारियों और उनके बच्चों की पढ़ाई पर सवाल खड़े किए थे.

उसने कहा था, ‘मेरे दिल में जितनी भी बात थी मैंने कह दी…अब मैं हल्का महसूस कर रहा हूं...’.

यानी की 2015 से लेकर 2022 के बीच के 8 सालों में शिक्षा व्यवस्था जस की तस बनी हुई है और शिक्षा व्यवस्था को लेकर वही नाराजगी आज भी कायम है.

बिहार के कई गांवों में जब मैंने खुद स्कूलों की हालत देखी तो पाया कि कहीं स्कूल की स्थिति ठीक नहीं है तो कहीं शिक्षकों की कमी है और समय से शिक्षक का ना आना भी एक बड़ी समस्या है. इन्हीं बुनियादी चीजों को दुरुस्त किए जाने की जरूरत है.

एनएफएचएस-5 के आंकड़ों के मुताबिक 15 साल से 49 वर्ष की आयु के बीच के लोगों में बिहार की साक्षरता दर सिर्फ 55 प्रतिशत है.

भले ही 2022 का सोनू अपने बड़बोलेपन के कारण भी हर टीवी चैनल पर छाया हुआ है लेकिन उसने जो दो अहम सवाल मुख्यमंत्री के सामने रखे, वो कहीं से भी गलत नहीं है. बल्कि उसकी हिम्मत की सराहना की जानी चाहिए. लेकिन बिहार में ऐसे कई सोनू हैं जिनकी पुकार सुनने वाला कोई नहीं है. मुख्यमंत्री तो क्या, गांव का मुखिया तक सोनू की पुकार नहीं सुनने वाले.

अभी भले ही बड़े-बड़े नेता सोनू से बात कर रहे हों, उसे मदद का आश्वासन दे रहे हों लेकिन कुछ दिनों बाद सोनू एकदम अकेला हो जाएगा और यही अकेलापन राज्य में और भी सोनू को तैयार करेगा.


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बिहार में शराबबंदी एक अधूरा सच है

सोनू ने नीतीश कुमार के सामने एक और तीखी हकीकत बयां की, जो कि उनकी महत्वाकांक्षी कदमों में से एक है. यानी की राज्य में शराबबंदी.

1 अप्रैल 2016 को हजारों करोड़ रुपए का घाटा सहते हुए जब नीतीश कुमार ने बिहार में शराबबंदी लागू की तो राज्य के एक बड़े वर्ग ने इस कदम का समर्थन किया. हालांकि इसे लेकर कुछ आशंकाएं और सवाल भी उठे लेकिन महिलाओं ने इसका खुले दिल से समर्थन किया.

लेकिन 6 साल बाद जब सोनू ने नीतीश कुमार से ये कहा कि उसके पिता सारा पैसा शराब में उड़ा देते हैं तो शराबबंदी जैसे महत्वाकांक्षी योजना की हकीकत सबके सामने आ जाती है. जो कि पहले से ही सबको पता भी है.

भले ही बिहार में शराबबंदी लागू हो लेकिन वहां जब जिसका मन हो उसे आसानी से शराब उपलब्ध हो सकती है. 2016 के बाद जब मैंने बिहार की कई यात्राएं की तो लोगों ने शराबबंदी का ठीक से पालन नहीं होने को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए.

शिक्षा की गुणवत्ता के बाद धड़ल्ले से मिलती शराब को लेकर प्रश्न ने नीतीश कुमार को किस स्थिति में डाला होगा? क्या वो इस पर कुछ करेंगे, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा क्योंकि बीते हुए वक्त की सच्चाई हाल ही में उनके सामने खुल गई है.


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अभिशप्त प्रदेश और बेरोजगारी

शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर मानव विकास के तमाम सूचकांकों के मामले में बिहार काफी पीछे तो है ही लेकिन बेरोजगारी के मामले में भी सबसे आगे है. बिहार के युवाओं की कहानी संघर्ष और निराशा की है. संघर्ष पढ़-लिखकर अच्छी नौकरी पाने की और निराशा नौकरी न मिल पाने की.

हाल ही में निराशा की कहानी का उस समय विस्तार देखने को मिला जब बिहार बीपीएससी की परीक्षा लीक हो गई और सालों से तैयारी कर रहे छात्रों के बीच भविष्य को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए. वैसे ही बीते दिनों पटना के गंगा घाट की भी तस्वीरें सोशल मीडिया पर तूफान की तरह लहराती रही जिसमें हजारों की संख्या में अभ्यार्थी गंगा किनारे सरकारी नौकरी की तैयारी में लगे थे.

बीते समय की ये दो घटनाएं राज्य में बेरोजगारी के संकट को सामने लाकर रख देती है.

बिहार में बेरोजगारी दर भारत के औसत स्तर से ज्यादा है. 2021 में राज्य की बेरोजगारी दर 12.8 प्रतिशत थी वहीं भारत की बेरोजगारी दर इससे काफी कम 7.7 प्रतिशत थी.

वहीं आंकड़ों के अनुसार महामारी से पहले यानी की 2019 में बिहार के सिर्फ 34.3 प्रतिशत लोग बेरोजगार थे वहीं महामारी के बाद 2021 में ये आंकड़ा कम होकर 31.2 प्रतिशत पर आ गया था.

तो ऐसे में बिहार को अतीत के गौरव से निकलकर अपने वर्तमान की चुनौतियों से निपटते हुए भविष्य की बेहतर राह बनाने की जरूरत है. ये राह सामूहिक और सरकारी पहल से तय हो सकती है लेकिन लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार दोनों के ही लंबे शासन में ये अब तक पूरी नहीं हो पाई है.

फिलहाल तो बिहार देश का एक ऐसा अभिशप्त प्रदेश है जो खराब शिक्षा, स्वास्थ्य से लेकर बेरोजगारी का गहरा दंश झेल रहा है और संभावनाओं की तलाश में लगातार राज्य छोड़कर निकलने को मजबूर हो रहा है. इन्हीं समस्याओं को हल करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए वरना आने वाले समय में फिर कोई सोनू मुख्यमंत्री से सवाल कर बैठेगा कि सुन लीजिए सर….सरकारी स्कूल में पढ़ाई नहीं होती है.

(व्यक्त विचार निजी हैं)


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