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Wednesday, 29 May, 2024
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अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा समारोह से पहले बोले लालू यादव — ‘BJP आडवाणी के समय से अधिक सांप्रदायिक’

बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री, यादव ने 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की राम रथ यात्रा को रोक दिया था और भाजपा नेता को अयोध्या पहुंचने से पहले बिहार में गिरफ्तार करवा दिया था.

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नई दिल्ली: लालकृष्ण आडवाणी के समय के मुकाबले वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की “सांप्रदायिकता” और “तीव्र” हो गई है. अयोध्या मंदिर में राम लला की मूर्ति के निर्धारित प्राण प्रतिष्ठा समारोह से दो दिन पहले शनिवार को एक ईमेल साक्षात्कार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने दिप्रिंट को बताया.

यह यादव ही थे, जिन्होंने बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री के रूप में 1990 में भाजपा नेता को अयोध्या पहुंचने से पहले बिहार में गिरफ्तार करवाकर आडवाणी की राम रथ यात्रा को रोक दिया था. विवादित स्थल जहां बाबरी मस्जिद थी, वहां मंदिर बनाने की अपनी पार्टी की मांग पर दबाव बनाने के लिए आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक यात्रा शुरू की थी.

शनिवार को यादव ने कहा, “90 के दशक से बीजेपी का सांप्रदायिक चरित्र तेज़ हो गया है. यह शुरू तो आडवाणी के समय ही हुआ था अब तो और भी तीव्र हो गया है.”

हालांकि, यह पूछे जाने पर कि राम मंदिर निर्माण के लिए आडवाणी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में से कौन अधिक जिम्मेदार है, यादव ने कहा कि उनके अनुसार, दोनों के बीच कोई अंतर नहीं है.

लालू ने कहा, “ऐसा कोई भी व्यक्ति नहीं है जो कम या ज्यादा जिम्मेदार हो. बाबरी विध्वंस के लिए वे सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं. मेरे लिए मोदी और आडवाणी के बीच कोई अंतर नहीं है — मैंने उन सभी के खिलाफ लड़ाई लड़ी है जिन्होंने विभाजनकारी राजनीति की है.”

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42-वर्षीय नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री, जिन्होंने 1989 के भागलपुर दंगों के बाद मुस्लिम-यादव गठबंधन बनाया था, यादव को मीडिया ने तुरंत ही आडवाणी के राम रथ यात्रा के खिलाफ खड़े होने के लिए धर्मनिरपेक्षता के पोस्टर-ब्वॉय के रूप में उछाल दिया था.

चूंकि, पिछले कुछ दशकों में राजनीतिक गठबंधन और पुनर्संरेखण बदल गए हैं, खासकर बिहार में यादव ने अपने भाजपा विरोधी, धर्मनिरपेक्ष रुख को बरकरार रखा है. उन्होंने कहा, “मैं 1990 में सांप्रदायिकता के खिलाफ था, मैं अब भी वैसा ही हूं. सांप्रदायिकता के खिलाफ मेरी राजनीतिक लड़ाई नहीं बदली है.”

इसके अलावा, उनका मानना ​​है कि इस साल के लोकसभा चुनावों से पहले अयोध्या में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह का चुनावों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, और इसके आसपास के उत्साह को भारत की धर्मनिरपेक्ष सर्वसम्मति से बदलाव के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए. लालू ने कहा, “यह केवल सांप्रदायिक राजनीति है. भारत वही है जो पहले हुआ करता था. इसका (राम मंदिर) कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.”

वह कांग्रेस के इस रुख से भी दृढ़ता से सहमत हैं कि मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा भाजपा-राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का कार्यक्रम है, जिसका आस्था और धार्मिकता से कोई लेना-देना नहीं है और स्पष्ट किया कि राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना की विपक्ष की मांग इन पार्टियों के लिए चुनावी मुद्दा नहीं थी.


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‘राम या आस्था से कोई लेना-देना नहीं’

बिहार के पूर्व सीएम ने कहा, “मैं कांग्रेस से पूरी तरह सहमत हूं कि यह (राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा) भाजपा-आरएसएस का कार्यक्रम है. हम सभी राम आस्तिक हैं, लेकिन मंदिर का कार्यक्रम पूरी तरह से राजनीतिक है. इसका राम या आस्था से कोई लेना-देना नहीं है. लोग इसे देख सकेंगे, इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा.”

यह पूछे जाने पर कि क्या विपक्ष असमंजस की स्थिति में है कि भाजपा की हिंदुत्व राजनीति का जवाब कैसे दिया जाए, यादव ने कहा, “भ्रम केवल मीडिया में है. सभी धर्मनिरपेक्ष दल एकजुट हैं और लड़ने का एकमात्र तरीका एकजुट रहना और लोगों के हित के लिए लड़ना है.”

नवंबर में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों में विपक्ष के जाति सर्वे के मुद्दे पर कोई असर नहीं होने पर, यादव ने कहा कि जाति सर्वेक्षण का चुनावों से कोई लेना-देना नहीं है.

बिहार द्वारा पिछले साल राज्य में जाति सर्वेक्षण के नतीजे सार्वजनिक किए जाने के बाद से विपक्षी दल राष्ट्रव्यापी जाति जनगणना की मांग कर रहे हैं.

उन्होंने कहा, “सामाजिक न्याय के लिए हमारी लड़ाई मंडल (देश के पिछड़े वर्गों की पहचान करने के लिए आयोग) के बाद से जारी है, इसलिए हमारे लिए जाति सर्वेक्षण कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. लोगों का सशक्तिकरण किसी एक या दो चुनावों से जुड़ा नहीं है, यह एक दीर्घकालिक लड़ाई है.”

यादव ने कहा, “बिहार में हमारी सरकार ने लाखों लोगों को रोज़गार दिया है. नीतीश कुमार (बिहार के मुख्यमंत्री) और तेजस्वी यादव (लालू के बेटे और बिहार के उपमुख्यमंत्री) बहुत अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन वे असमानता और बेरोज़गारी के वास्तविक मुद्दों को संबोधित करने के लिए ऐसा कर रहे हैं. भाजपा के विपरीत, नीतीश और तेजस्वी लोगों की भावनाओं से खेलकर वोट नहीं मांग रहे हैं.”

(संपादन : फाल्गुनी शर्मा)

(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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