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Wednesday, 7 January, 2026
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बिहार को आखिरकार मिलेगा पहला बीजेपी मुख्यमंत्री, यह वक्त-वक्त की बात है

अगर नीतीश कुमार नहीं माने, जैसा कि संभावना है, तो बीजेपी उन्हें एक-दो साल की मोहलत दे सकती है. वे ज़्यादा समय तक विरोध नहीं कर पाएंगे.

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नीतीश कुमार संभवत: 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेंगे. चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के शीर्ष नेता—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य रणनीतिकार अमित शाह—इस मुद्दे पर थोड़ा अनिश्चित दिख रहे थे, लेकिन इस बार के चुनावी नतीजे ऐसे हैं कि वे नीतीश कुमार को एक और कार्यकाल देने से इनकार करना मुश्किल पाएंगे. इसका कारण यह नहीं कि उनके पास सरकार पलटने लायक पर्याप्त संख्या है, बल्कि इसलिए कि जनता ने उन्हें और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) को पूरा जनादेश दिया है. 1.40 करोड़ जीविका दीदियों को दिए गए 10,000 रुपये के लाभ हों या महिलाओं, अति पिछड़ों, दलितों और पिछड़ों में उनका मजबूत आधार—कोई यह नहीं कह सकता कि यह ऐतिहासिक जनादेश नीतीश कुमार की वजह से नहीं आया.

लेकिन इसके साथ ही, यह नतीजे बीजेपी को बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का ऐतिहासिक मौका भी देते हैं. इसके कई कारण हैं. बीजेपी के पास इस विधानसभा में जेडीयू से ज़्यादा विधायक होने की संभावना है. दोनों दल बराबर सीटों—101-101—पर लड़े थे. न प्रधानमंत्री और न ही गृह मंत्री ने कभी यह साफ कहा कि जीतने पर मुख्यमंत्री ज़रूर नीतीश कुमार ही होंगे. उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा जा रहा है. ऐसे में, अगर बीजेपी जेडीयू से कहे कि गठबंधन के ‘बड़े भाई’ को मुख्यमंत्री बनने दिया जाए, तो कोई सवाल नहीं उठा सकता—खासकर जब पिछले विधानसभा में जेडीयू के सिर्फ 43 विधायक थे और बीजेपी के 74, इसके बावजूद बीजेपी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी नीतीश को दी थी. तब बीजेपी इसलिए मान गई क्योंकि नीतीश कुमार कभी भी लालू यादव से हाथ मिलाकर सत्ता में बने रह सकते थे.

अब स्थिति अलग है. बीजेपी चाहे तो नीतीश कुमार के समर्थन के साथ या बिना भी अपना मुख्यमंत्री बना सकती है. रुझानों के हिसाब से बीजेपी अपने सहयोगियों—चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (आरवी), जीतन राम मांझी की हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा (एचएएम) और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक मोर्चा—के साथ मिलकर 122 सीटों के बहुमत आंकड़े को पार करती दिख रही है. अगर अंतिम नतीजों में वे थोड़ा-सा भी कम रह जाएं, जो कि फिलहाल नहीं लगता, तो विपक्षी खेमे से समर्थन लेना अमित शाह के कुछ फोन कॉल से ज़्यादा मुश्किल नहीं होगा. अगर मोदी और शाह बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाना चाहते हैं, तो उन्हें कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ेगी. उन्हें यह काम तुरंत करने की भी ज़रूरत नहीं है.

मतदाताओं को शायद नीतीश कुमार की सेहत की चिंता न हो, लेकिन जेडीयू के नेता भी निजी तौर पर मानते हैं कि वे अब ज्यादा समय तक सरकार चलाने की स्थिति में नहीं हैं.

कब का सवाल है

तो क्या बीजेपी नेतृत्व बदलने का फैसला कर सकती है? बिल्कुल कर सकती है. मोदी और शाह मौकों को गंवाने वाले नहीं हैं. यह महाराष्ट्र मॉडल जैसा ही हो सकता है, बस कुछ बदलावों के साथ. जेडीयू की स्थिति शिवसेना जितनी कमजोर नहीं है, लेकिन बीजेपी की बिहार में स्थिति उतनी ही मजबूत है. जल्दी ही नीतीश कुमार के सामने विकल्प आएगा—या तो उद्धव ठाकरे वाला रास्ता चुनें या फिर वास्तविकता स्वीकार कर एक अच्छी ‘कंपनसेशन-प्लस-रीहैबिलिटेशन’ डील ले लें.

अब सवाल ये है: अगर बीजेपी अपना सीएम बना सकती है, तो यह कब होगा? अगर विकल्प मिले, तो मोदी और शाह अभी चाहते हैं कि नीतीश कुमार खुद इसे आसान बना दें. उन्हें और उनकी पार्टी को केंद्र और राज्य दोनों जगहों पर अच्छे पद देकर मनाया जा सकता है, लेकिन अगर नीतीश नहीं माने—जैसा कि लग रहा है, तो बीजेपी उन्हें एक-दो साल का वक्त दे सकती है. तब तक नीतीश और उम्रदराज़ हो जाएंगे और स्वास्थ्य भी बेहतर नहीं होगा. उस समय बीजेपी के पास सारी रणनीति भी तैयार होगी. नीतीश इसका विरोध ज़्यादा समय तक नहीं कर पाएंगे.

तो 2025 में नहीं तो नीतीश कुमार के कार्यकाल के बीच तक बिहार में पहला बीजेपी मुख्यमंत्री बनना लगभग तय है. बदलाव कब होगा, इसका सवाल है—क्या होगा, इसका नहीं और यह बिहार के लिए भी अच्छा होगा. नीतीश कुमार ने बिहार के लिए बहुत किया है. अब वह पीछे हटकर उस नेता के लिए जगह बना सकते हैं, जिसके पास बिहार को सबसे गरीब राज्य की छवि से बाहर निकालने की योजना और क्षमता हो.

(डीके सिंह दिप्रिंट के पॉलिटिकल एडिटर हैं. उनका एक्स हैंडल @dksingh73 है. व्यक्त किए गए विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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