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Tuesday, 18 June, 2024
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बिहार में एक और फर्जी डिग्री का मामला, JD (U) बोली- BJP विधायक ने लिखा कि वह महिला कॉलेज से पढ़े हैं

जद (यू) का दावा है कि विधायक हरिभूषण ठाकुर बचौल के 2020 के हलफनामे से पता चलता है कि उनकी डिग्री महिला कॉलेज से है. बचौल का कहना है कि यह एक टाइपो है. बिहार में 'फर्जी डिग्री' का मामला आम बात है.

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पटना: बिहार से एक बार फिर फर्जी डिग्री का विवाद उठ खड़ा हुआ है. सत्तारूढ़ जनता दल (यूनाइटेड) ने भारतीय जनता पार्टी के एक विधायक के पास फर्जी डिग्री होने का आरोप लगाया है. पार्टी ने कहा है कि यह हम नहीं कह रहे हैं चुनाव आयोग के 2020 के हलफनामे में कहा गया है.

जद (यू) ने सोमवार को एक संवाददाता सम्मेलन में आरोप लगाया कि विधायक हरिभूषण ठाकुर बचौल की ग्रैजुएशन की डिग्री एक महिला कॉलेज से है. बचौल ने दावा किया है कि यह टाइपिंग की गलती है.

जद (यू) के प्रवक्ता नीरज कुमार ने संवाददाताओं से कहा कि बचौल के हलफनामे में उल्लेख है कि उन्होंने 1993 में सीतामढ़ी जिले के राम सेवक सिंह कॉलेज से स्नातक किया था. कुमार ने चुनाव आयोग से जांच की मांग करते हुए कहा, “वह कॉलेज वास्तव में एक महिला कॉलेज है. तो बचौल उस कॉलेज से कैसे पास हो सकता हैं?”

मंगलवार को फोन पर दिप्रिंट से बात करते हुए कुमार ने कहा, ‘ये चीजें केवल बीजेपी में ही हो सकती हैं जहां पीएम की डिग्री पर भी सवाल उठाया जा रहा है.’

इस बीच, बचौल ने दावा किया कि 2020 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने जो हलफनामा जमा किया था, उसमें “टाइपिंग की गलती” थी.

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उन्होंने फोन पर दिप्रिंट से कहा, “दरअसल, सीतामढ़ी में दो कॉलेज हैं. एक राम सकल सिंह कॉलेज है, जो लड़कों के लिए है, और दूसरा राम सेवक सिंह कॉलेज है, जो एक महिला कॉलेज है. मैंने 1993 में राम सकल कॉलेज से स्नातक की उपाधि प्राप्त की, लेकिन गलती से राम सेवक सिंह कॉलेज टाइप हो गया था.”

उन्होंने कहा, “मैं किसी भी जांच के लिए तैयार हूं. जद (यू) ने मुझ पर निशाना साधा है क्योंकि मैं तब भी नीतीश कुमार का मुखर आलोचक रहा हूं जब पार्टी भाजपा के साथ गठबंधन में थी.

बिहार में फर्जी डिग्री की समस्या के बारे में बात करते हुए पटना विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एन.के. चौधरी ने फोन पर दिप्रिंट को बताया कि राज्य में शिक्षा व्यवस्था चरमरा रही है, जैसा कि बड़ी संख्या में फर्जी डिग्रियों से साफ है.

“विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों को संदिग्ध ट्रैक रिकॉर्ड और अक्सर, संदिग्ध डिग्री वाले लोगों को सौंप दिया गया है. इसलिए कुलपतियों के खिलाफ सतर्कता मामले दर्ज किए गए हैं और विश्वविद्यालय सेवा आयोग के अध्यक्ष को जेल में डाल दिया गया है [चौधरी यहां दो दशक पुराने मामले का जिक्र कर रहे हैं].

उन्होंने दावा किया, “मैंने 2007 में बिहार के विश्वविद्यालयों में सड़ांध का मुद्दा उठाया और निलंबित कर दिया गया.”

नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी के पूर्व मुख्य सचिव व कुलपति वी.एस. दुबे ने कहा कि उन्होंने कुलपति के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान फर्जी डिग्रियों पर अंकुश लगाने के लिए कदम उठाए थे.

उन्होंने कहा, “मैंने डिग्री पर उम्मीदवारों की तस्वीरें लगवाईं और उसमें अनूठी विशेषताएं जोड़ीं. मैंने हस्तनिर्मित कागज का भी इस्तेमाल किया, जो केवल ऑर्डर पर उपलब्ध है. मुझे लगता है कि अन्य सभी विश्वविद्यालयों को इसका पालन करना चाहिए.’ उन्होंने कहा कि ऐसे घोटालों से संस्थानों की प्रतिष्ठा प्रभावित होती है.


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पहली बार नहीं है

यह पहली बार नहीं है जब राज्य में कोई शैक्षणिक संस्थान कथित फर्जी डिग्री को लेकर विवाद में फंसा हो. दिल्ली की आप सरकार में पूर्व कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर पर बिहार के तिलका मांझी भागलपुर विश्वविद्यालय से कानून की फर्जी डिग्री हासिल करने का आरोप लगा है.

उत्तरी दिल्ली के त्रिनगर के एक विधायक तोमर को 9 जून 2015 को दिल्ली पुलिस द्वारा दिल्ली की बार काउंसिल की एक शिकायत पर जांच के बाद गिरफ्तार किया गया था कि उन्होंने एक फर्जी कानून की डिग्री प्राप्त की थी. एक आरटीआई के जवाब में विश्वविद्यालय ने कहा कि मार्कशीट गढ़ी गई थी और डिग्री आधिकारिक रिकॉर्ड में नहीं थी. तोमर को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन जमानत पर रिहा कर दिया गया.

पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा, जिन्हें उनके अनुयायी प्यार से “डॉक्टर साहेब” कहते हैं, उन पर बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर से फर्जी डॉक्टरेट होने का भी आरोप लगाया गया था. 1980 के दशक की शुरुआत में, सोशलिस्ट पार्टी के तत्कालीन विधायक मुंशी लाल राय ने आरोप लगाया कि मिश्रा की पीएचडी थीसिस भूत-प्रेत लिखी हुई थी. उन्होंने मिश्रा की थीसिस के अंश भी पढ़े, जो उनके गाइड डॉ. हरगोविंद सिंह की थीसिस के कुछ अंशों के समान थे. इसने बिहार विधानसभा में एक बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया लेकिन आगे कोई कार्रवाई नहीं की गई. मीडिया ने मिश्रा के हवाले से कहा कि वह किसी भी जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं.

2015 में पटना हाई कोर्ट में एक याचिका के परिणामस्वरूप राज्य सरकार ने अपने स्कूलों में नियुक्त शिक्षकों की आंतरिक जांच की. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार ने कोर्ट को बताया कि 3,000 शिक्षकों की डिग्रियां फर्जी पाई गईं और उन्होंने इस्तीफा दे दिया है.

हाईकोर्ट फिलहाल शिक्षकों की फर्जी डिग्री से जुड़े एक और मामले की सुनवाई कर रहा है और धीमी प्रगति पर नाराजगी जताई है. राज्य कैबिनेट ने अब बिहार लोक सेवा आयोग के माध्यम से स्कूल शिक्षकों की नियुक्ति करने का निर्णय लिया है, जहां उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र देने से पहले उनकी डिग्री की जांच की जाएगी.

बिहार में, 2016 में एक टॉपर घोटाले का पर्दाफाश हुआ था. जब मीडिया ने उस वर्ष के ह्यूमैनिटीज और साइंस स्ट्रीम के 12वीं कक्षा के टॉपर्स का इंटरव्यू लिया, तो वे अपने विषयों से संबंधित सवालों का जवाब देने में विफल रहे, जिससे बिहार राज्य बोर्ड परीक्षाओं के बारे में संदेह पैदा हुआ. उस समय जद (यू) की पूर्व विधायक उषा सिन्हा के पति एल.पी. सिंह बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के अध्यक्ष थे.

जांच में पता चला कि छात्रों को पैसे देकर अच्छे अंक दिए गए. बाद में खबर आई कि सिन्हा की खुद की डिग्री फर्जी हो सकती है. अंतत: दंपति जेल गए और सिन्हा को पार्टी से निकाल दिया गया. बाद में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया.

(संपादनः पूजा मेहरोत्रा)

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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