नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को कहा कि वह फिर से “हैरान” हैं, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 19वीं सदी के संत श्री रामकृष्ण परमहंस की जयंती पर उन्हें “स्वामी” कहकर संबोधित किया.
बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले बनर्जी ने प्रधानमंत्री पर बंगाल के आध्यात्मिक प्रतीकों के प्रति “सांस्कृतिक असंवेदनशीलता” का आरोप लगाया और तृणमूल कांग्रेस की इस बात को और तेज किया कि भाजपा राज्य की संस्कृति और सोच को नहीं समझती.
“अभूतपूर्व और अनुचित” बताते हुए बनर्जी ने कहा कि रामकृष्ण को परंपरागत रूप से “ठाकुर” कहा जाता है, न कि “स्वामी”. “स्वामी” की उपाधि उन संन्यासी शिष्यों के लिए है जिन्होंने बाद में रामकृष्ण मठ और रामकृष्ण मिशन की स्थापना की. उन्होंने कहा कि बंगाल की आध्यात्मिक परंपरा में रामकृष्ण परंपरा की “पवित्र त्रयी” को ठाकुर–मा–स्वामीजी के रूप में याद किया जाता है. यहां ठाकुर से मतलब रामकृष्ण, मा से मतलब शारदा देवी और स्वामीजी से मतलब स्वामी विवेकानंद है.
उन्होंने एक्स पर लिखा, “एक बार फिर हमारे प्रधानमंत्री बंगाल की महान हस्तियों के प्रति अपनी सांस्कृतिक असंवेदनशीलता आक्रामक तरीके से दिखा रहे हैं. आज युगावतार श्री श्री रामकृष्ण परमहंसदेव की जन्मतिथि है. इस मौके पर महान संत को सम्मान देने की कोशिश में हमारे प्रधानमंत्री ने उनके नाम के आगे एक अभूतपूर्व और अनुचित उपसर्ग ‘स्वामी’ जोड़ दिया.”
उन्होंने आगे लिखा, “जैसा कि सब जानते हैं, श्री रामकृष्ण को व्यापक रूप से ठाकुर यानी भगवान के रूप में सम्मान दिया जाता है.”
बनर्जी ने मोदी से बंगाल के पुनर्जागरण काल की हस्तियों को नए नाम या उपाधियां देने से भी रोकने को कहा. उन्होंने लिखा, “मैं प्रधानमंत्री से आग्रह करती हूं कि आधुनिक भारत को आकार देने वाले बंगाल के महान पुनर्जागरण पुरुषों के लिए नए उपसर्ग और प्रत्यय खोजने की कोशिश न करें.”
टीएमसी के राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर राय ने भी भाजपा पर हमला तेज किया और रामकृष्ण की बहुलतावादी सोच का जिक्र किया. उन्होंने एक्स पर लिखा, “श्री श्री परमहंस देव दक्षिणेश्वर में मां भवतारिणी देवी के पुजारी थे. वह ईश्वर की खोज में चर्च और मस्जिद भी जाते थे और मानवता का अनमोल संदेश देते थे, ‘जितने मत, उतने पथ’. क्या प्रधानमंत्री या उनकी पार्टी इस पर विश्वास करती है?”
आलोचना पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा विधायक अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि संत को ‘स्वामी’ कहना अपमान नहीं है.
उन्होंने समाचार एजेंसी आईएएनएस से कहा, “सुबह से रात तक ममता बनर्जी, उनके प्रवक्ता और उनकी पार्टी नकारात्मकता फैलाते रहते हैं.”
भाजपा के अमित मालवीय ने भी एक्स पर लिखा कि ‘स्वामी’ शब्द का इस्तेमाल “सम्मान के रूप में” किया गया था, न कि रामकृष्ण परंपरा के भीतर किसी औपचारिक उपाधि के तौर पर.
यह घटना उन कई सांस्कृतिक विवादों में से एक है, जिनका इस्तेमाल टीएमसी भाजपा को बाहरी ताकत के रूप में दिखाने के लिए करती रही है. टीएमसी का कहना है कि भाजपा बंगाल की महान हस्तियों को अपने तरीके से पेश करने की कोशिश करती है. यह ममता बनर्जी की उस छवि को मजबूत करता है जिसमें वह खुद को बंगाली गौरव और क्षेत्रीय पहचान की संरक्षक के रूप में पेश करती हैं.
ऐसा ही विवाद तब हुआ था जब मोदी ने बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय को “बंकिम चंद्र चटर्जी” कहा था और एक अलग मौके पर “बंकिम दा” कहा था. आलोचकों ने कहा था कि यह स्थापित परंपरा से अलग है. भाजपा ने इस आलोचना को राजनीतिक बहस बताया, जबकि टीएमसी ने इसे बंगाली इतिहास की सतही समझ का सबूत बताया.
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