बेंगलुरु: सिद्धारमैया बुधवार को कर्नाटक के सबसे लंबे समय तक रहने वाले मुख्यमंत्री बन गए. उन्होंने डी. देवराज उर्स का रिकॉर्ड तोड़ दिया.
उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर 2,792 दिन पूरे कर लिए हैं, जबकि उर्स ने दो कार्यकालों (1972-77 और 1978-80) में 2,790 दिन पूरे किए थे. कर्नाटक की राजनीति के ऐतिहासिक रूप से अस्थिर रहने के कारण यह एक बड़ा मुकाम माना जा रहा है.
उर्स का कार्यकाल राष्ट्रपति शासन के कारण टूटा था, लेकिन वह दो महीने बाद फिर सत्ता में लौट आए थे.
77-वर्षीय सिद्धारमैया ने मंगलवार को अपने गृह जिले मैसूरु में पत्रकारों से कहा, “मैंने कभी किसी का रिकॉर्ड तोड़ने के लिए राजनीति नहीं की. मुझे बस मौका मिला. मुझे यह भी नहीं पता कि देवराज उर्स ने (मुख्यमंत्री के तौर पर) कितने साल या कितने दिन काम किया.”
नेतृत्व परिवर्तन की अटकलों के बावजूद सिद्धारमैया दूसरे पूरे कार्यकाल को पूरा करने को लेकर आश्वस्त और कुछ हद तक चुनौतीपूर्ण नज़र आए. उन्होंने कहा, “यह सब (कांग्रेस) हाईकमान के फैसले पर निर्भर करता है.”

अगर वह ऐसा कर पाते हैं, तो यह एक और ऐतिहासिक उपलब्धि होगी, क्योंकि यह ऐसा राज्य है जहां टूटे जनादेश, अस्थिर राजनीति और बार-बार सरकारें बदलना आम बात रही है. अब तक सिर्फ तीन मुख्यमंत्री ही पूरा कार्यकाल पूरा कर पाए हैं—उर्स, एस. निजलिंगप्पा और सिद्धारमैया.
विश्लेषकों और राजनीतिक जानकारों का कहना है कि सिद्धारमैया का राजनीतिक सफर बेहद तेज़ रहा है और इसमें गहरी राजनीतिक समझ दिखती है.

अज़ीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी के फैकल्टी मेंबर और राजनीतिक विश्लेषक ए. नारायण ने दिप्रिंट से कहा, “हमारे समय में सिद्धारमैया की अहमियत यह है कि वह अकेले ऐसे मुख्यमंत्री हैं जो सामाजिक न्याय की भाषा बोलते हैं क्योंकि राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर कोई और नेता उतने साहसिक बयान नहीं दे रहा है, जैसे सिद्धारमैया दे रहे हैं—भले ही किसी को उनकी भाषा या सामाजिक न्याय की कल्पना से असहमति हो.”
विश्लेषकों के मुताबिक, पिछड़े वर्गों के समर्थक के रूप में सिद्धारमैया की छवि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पर लगातार हमले, हिंदी थोपे जाने के खिलाफ समर्थन जुटाना, केंद्र से ज्यादा टैक्स हिस्सेदारी की मांग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और बीजेपी पर लगातार हमले—ये सभी बातें कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए उन्हें हटाना और भी मुश्किल बना देती हैं.
‘एक चरवाहे को वित्त की क्या समझ?’
सिद्धारमैया का जन्म अगस्त 1948 में मैसूरु जिले (जिसे तब मैसूर कहा जाता था) के एक साधारण से गांव सिद्धारमनहुंडी में हुआ था. वे कुरुबा समुदाय से आते हैं (परंपरागत रूप से चरवाहे). उन्होंने सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को तोड़ते हुए पहले कानून की डिग्री हासिल की और फिर 1978 में अपने पहले चुनाव में मैसूरु में तालुक बोर्ड के सदस्य बनने के बाद लगातार चुनाव जीतते चले गए.
बतौर वकील अपने शुरुआती वर्षों में सिद्धारमैया समाजवादी चिंतक डॉ. राम मनोहर लोहिया से गहराई से प्रभावित रहे. बाद में वे प्रोफेसर एम.डी. नंजुंडास्वामी के मार्गदर्शन में आए, जो 1980 में शुरू हुए शक्तिशाली किसान आंदोलन कर्नाटक राज्य रैयत संघ के संस्थापक थे.
सिद्धारमैया ने याद किया, “जब मैं वित्त मंत्री के रूप में पहला बजट तैयार कर रहा था, तब लोग ताने मारते थे कि ‘एक चरवाहे को वित्त की क्या समझ?’ लेकिन मैंने ऐसे अपमान पर ध्यान नहीं दिया.”

कुरुबा समुदाय, जो कर्नाटक के ज्यादा पिछड़े समुदायों में से एक है, सालों में राज्य की गहराई से जाति-केंद्रित राजनीति और समाज में एक बड़ी ताकत बनकर उभरा है.
सिद्धारमैया की राजनीतिक यात्रा उनके शुरुआती वर्षों में झेले गए भेदभाव से आकार लेती है, जिसे उन्होंने अपनी सबसे बड़ी ताकत में बदल दिया.
उर्स की तरह ही सिद्धारमैया को भी AHINDA (कन्नड़ में अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलितों का संक्षिप्त रूप) का समर्थन मिला, हालांकि, अब वह अपनी विरासत को उर्स से अलग रखते हैं.
यह कहते हुए कि दोनों नेताओं ने अलग-अलग समय में काम किया है, सिद्धारमैया ने कहा, “मेरे और देवराज उर्स के बीच कोई तुलना नहीं है.”
उर्स और सिद्धारमैया दोनों मैसूरु से हैं और मुख्यमंत्री का इशारा है कि समानताएं यहीं तक सीमित हैं.
लेकिन विश्लेषक दोनों नेताओं के बीच कई समानताओं और अंतर की ओर भी इशारा करते हैं.
‘पार्टी नहीं, बल्कि गठबंधन बनाने वाले’
सिद्धारमैया ने 1980 में मैसूर लोकसभा चुनाव लड़ा, लेकिन वह जीत नहीं पाए. इसके तीन साल बाद, 1983 में, उन्होंने चामुंडेश्वरी से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ते हुए इंदिरा कांग्रेस के डी. जयदेवराज उर्स को हराकर राज्य विधानसभा में प्रवेश किया. चार दशक से ज्यादा के अपने राजनीतिक करियर में उन्होंने 13 चुनाव लड़े और आठ में जीत हासिल की.
उन्होंने बतौर विधायक अपनी पारी की शुरुआत तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार को समर्थन देकर की. इसके साथ ही वह कन्नड़ कवलु समिति (कन्नड़ वॉचडॉग कमेटी) के अध्यक्ष बने. इससे यह साफ झलकता है कि वह आगे चलकर एक चतुर राजनीतिज्ञ बनने वाले थे.

बेंगलुरु के एक विश्लेषक ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, “कर्नाटक की राजनीति में सफल होने के लिए गठबंधन बनाना आना चाहिए और सिद्धारमैया ने यह काम बहुत सफलता से किया है.”
सिद्धारमैया ने पशुपालन, रेशम उद्योग, परिवहन, शिक्षा और अन्य विभागों के मंत्री के रूप में काम किया. 1994 में वह एच. डी. देवगौड़ा के नेतृत्व वाली सरकार में वित्त मंत्री बने. इसके बाद से अब तक वह रिकॉर्ड 16 बजट पेश कर चुके हैं और आज भी राज्य के खजाने पर उनका खास प्रभाव माना जाता है.
विश्लेषकों ने सिद्धारमैया की तुलना उर्स से की और दोनों नेताओं की राजनीति को लेकर नज़रिए पर चर्चा की.
उर्स ने उस समय की कांग्रेस नेता इंदिरा गांधी के खिलाफ बगावत की थी और एक अलग गुट बनाया था, जबकि सिद्धारमैया ने अपने राजनीतिक गुरु जनता दल (सेक्युलर) के नेता देवगौड़ा के खिलाफ विद्रोह किया.
माना जाता है कि उर्स ने राजनीति एक “राजनेता” की तरह की, जबकि सिद्धारमैया ज्यादा एक राजनेता और प्रशासक की तरह काम करते हैं.
हालांकि, वीरप्पा मोइली, एस. बंगारप्पा और कई अन्य नेता सीधे तौर पर उर्स के मार्गदर्शन में रहे, लेकिन सिद्धारमैया उनकी मृत्यु के एक साल बाद विधानसभा में पहुंचे.
नारायण ने दिप्रिंट से कहा, “उर्स पार्टी बनाने वाले नेता थे और उन्होंने खुद अपने लिए मौके बनाए. सिद्धारमैया के मामले में वह पार्टी बनाने वाले नहीं हैं. उनकी राजनीति खाली जगहों को भरने और सही समय पर सही जगह पर रहने तक सीमित रही.”
जनता पार्टी और बाद में जनता दल (सेक्युलर) में मुख्यमंत्री पद न मिलने के बाद, 2005 में देवगौड़ा ने सिद्धारमैया को पार्टी से बाहर कर दिया.

इसके बाद उन्होंने 2006 में कांग्रेस जॉइन की. 2008 के विधानसभा चुनावों के बाद उन्हें कर्नाटक में नेता प्रतिपक्ष बनाया गया. फिर 2013 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, जबकि कांग्रेस ने इस पद के लिए मल्लिकार्जुन खरगे समेत कई वरिष्ठ नेताओं को नज़रअंदाज़ कर दिया.
उर्स ने पार्टी अध्यक्ष रहते हुए अपना पहला कार्यकाल जीता था और फिर बतौर मुख्यमंत्री कांग्रेस को चुनावों में नेतृत्व दिया. इसके उलट, 2018 में मौजूदा मुख्यमंत्री होते हुए भी सिद्धारमैया चामुंडेश्वरी सीट से चुनाव हार गए और अपनी दूसरी सीट बादामी से बहुत कम अंतर से जीत पाए.
2023 में भी सिद्धारमैया को अपनी घरेलू सीट वरुणा से चुनाव लड़ने के लिए कहा गया क्योंकि कांग्रेस को नए क्षेत्र से उनके जीतने को लेकर भरोसा नहीं था.
उर्स और सिद्धारमैया की नीतियां
जो लोग सिद्धारमैया को करीब से जानते हैं, उनके मुताबिक वे इस बात को लेकर चिंतित रहते हैं कि वह अपने पीछे कैसी विरासत छोड़ेंगे, जबकि उर्स को कर्नाटक में सामाजिक न्याय का एक प्रतीक माना जाता है.
पूर्व मुख्यमंत्री उर्स ने 1974 में भूमि सुधार लागू किए. उनकी “उलिधावनिगे भूमि” (ज़मीन जोतने वाले की होगी) नीति ने राज्य के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे में बड़ा बदलाव किया. इससे भले ही कई ज़मीनों के मालिक समुदाय कांग्रेस से दूर हो गए, लेकिन पार्टी को गरीबों, भूमिहीनों और शोषित वर्गों का एक नया समर्थन आधार मिला.
बेंगलुरु के एक विश्लेषक ने कहा, “असल में, उन्होंने (उर्स ने) ज़मीन गंवाने वालों को अदालत जाने का मौका नहीं दिया. उन्होंने भूमि न्यायाधिकरण बनाए और यह सुनिश्चित किया कि हर गांव में ज्यादातर लोगों को जमीन मिले. इससे उन्होंने एक मजबूत राजनीतिक आधार तैयार किया.”
सिद्धारमैया ने भी इसी राह पर चलते हुए कल्याणकारी राजनीति को आगे बढ़ाया. अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने ‘भाग्य’ योजनाएं शुरू कीं और दूसरे कार्यकाल में कल्याणकारी गारंटियां दीं.
उर्स ने कर्नाटक में पिछड़ा वर्ग आरक्षण नीति की भी शुरुआत की और राज्य का पहला पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया. सिद्धारमैया ने भी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को सशक्त करने की कोशिश की, लेकिन इसके ठोस नतीजे सामने नहीं आ सके.
विश्लेषकों का कहना है कि उर्स आपातकाल के दौर में काम कर रहे थे, जिससे उन्हें बड़े और क्रांतिकारी सुधार लागू करने के ज्यादा अधिकार मिले.
सिद्धारमैया के नेतृत्व में, कर्नाटक 2015 में व्यापक सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराने वाला पहला राज्य बना. हालांकि, इस रिपोर्ट को लागू न करने को लेकर उनकी आलोचना होती है, क्योंकि सत्ता में बने रहना सामाजिक न्याय से ज्यादा प्राथमिकता माना गया.
नारायण के मुताबिक, सिद्धारमैया की सामाजिक न्याय की बातों के पीछे “दूरदृष्टि” की कमी है. हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि उर्स और सिद्धारमैया अलग-अलग परिस्थितियों और अलग-अलग हाईकमान के तहत काम कर रहे थे.
उन्होंने समझाया, “व्यक्तिगत कामों के मामले में आप सिद्धारमैया से यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वह उर्स की तरह काम करें क्योंकि दोनों ने अलग-अलग समय में काम किया, लेकिन सार के स्तर पर देखें तो उर्स के कामों में दूरदृष्टि थी, जबकि सिद्धारमैया के कदमों में वह बात नहीं दिखती. सिद्धारमैया ने कुछ खास काम ज़रूर किए, लेकिन वे ज़रूरी नहीं कि क्रांतिकारी हों.”
सिद्धारमैया ने अनुसूचित जाति उपयोजना और जनजातीय उपयोजना को मजबूत किया, सरकारी ठेकों में आरक्षण लागू किया, ओबीसी के लिए छात्रवृत्तियां और अन्य प्रोत्साहन शुरू किए, लेकिन उनके “क्रांतिकारी सुधार” ज्यादा एससी/एसटी समुदायों पर केंद्रित रहे, न कि ओबीसी पर. वह कुरुबा समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) में शामिल कराने की भी कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इसका कड़ा विरोध हो रहा है.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)
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