प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर पेज से.
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नरेंद्र मोदी भारतीय राजनीति के दबंग नेता है. उनकी यही छवि बीजेपी ने बनाई है और इस पर नरेंद्र मोदी को कभी एतराज भी नहीं रहा है. 2013 में बाबा रामदेव ने नरेंद्र मोदी को भारत का शेर बताया था. मीडिया के एक हिस्से ने भी नरेंद्र मोदी को एक ऐसे नेता के रूप में पेश किया जो शेर की तरह दहाड़ लगाता है. बीजेपी के नेता भी अक्सर मोदी को शेर बताते रहते हैं. हरियाणा की बीजेपी सरकार के मंत्री अनिल विज के मुताबिक शेर अकेला चलता है और सैकडों कुत्ते भी उसका मुकाबला नहीं कर सकते.

लेकिन क्या मोदी सचमुच अकेले चलते हैं?

बीजेपी ने 2014 का लोकसभा चुनाव जीतने के लिए जब गठबंधन की सेना सजाई थी, तो उसमें 29 दल थे. गिनती कीजिए- बीजेपी, शिवसेना, तेलुगु देशम, लोकजनशक्ति पार्टी, अकाली दल, राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी, अपना दल, नगा पीपुल्स फ्रंट, नेशनल पीपुल्स पार्टी, पीएमके, स्वाभिमान पक्ष, ऑल इंडिया एनआर कांग्रेस, डीएमडीके, हरियाणा जनहित कांग्रेस, एमडीएमके, आईजेके, केएमडीके, आरपीआई (ए), जन सेना, यूडीएफ (मिजोरम), गोरखा जनमुक्ति मोर्चा, मणिपुर पीपुल्स पार्टी, आरएसपी(बी), एमजीपी और केरल कांग्रेस (एन)…

हालांकि 2014 में बीजेपी के अपने दम पर लोकसभा में बहुमत मिला, लेकिन इसके लिए माहौल सभी सहयोगी दलों ने मिल कर बनाया था. बाद में विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने और भी कई गठबंधन किए.


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लेकिन गठबंधन बनते-बिगड़ते रहते हैं. किसी भी चुनाव से पहले राजनीतिक शक्तियां अपनी पोजिशन बदलती हैं. इसलिए अगर 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले कुछ दल अपनी पोजिशन बदल रहे हैं या नई पोजिशन ले रहे हैं तो इसमें चौंकने की कोई बात नही है.

लोकसभा चुनाव से पहले देश में राजनीति के दो ध्रुव नजर आ रहे हैं, जिसके आसपास बड़ी राजनीतिक गोलबंदियां बनती दिख रही हैं. पहला ध्रुव बीजेपी और दूसरा ध्रुव कांग्रेस है. एक तीसरा ढीला-ढाला गठबंधन और बन सकता है जिसे तीसरा मोर्चा या संयुक्त मोर्चा या राष्ट्रीय मोर्चा जैसा कुछ कहा जा सकता है. लेकिन वह बनेगा या नहीं, यह कोई नहीं कह सकता.

कई पार्टियों ने बदला पाला

2014 के मुकाबले देखें तो एनडीए का मोर्चा पिछली बार से कमजोर पड़ा है. जम्मू कश्मीर में उसका सहयोगी दल पीडीपी अब उसके साथ नहीं है. पीडीपी अब कांग्रेस के साथ मोर्चा बनाना चाहती है. आंध्र प्रदेश की उसकी सहयोगी तेलुगु देशम पार्टी अब कांग्रेस के पाले में जा चुकी है. बिहार में बीजेपी के सहयोगी रहे दो दल जीतन राम मांझी की हम पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी अब बीजेपी का खेमा छोड़कर राष्ट्रीय जनता दल-कांग्रेस गठबंधन में जा चुके हैं.

महाराष्ट्र में राजू शेट्टी का स्वाभिमान पक्ष एनडीए से बाहर निकल चुका है. यूपी में सहय़ोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी बीजेपी गठबंधन में किस हद तक है, यह कोई नहीं जानता. उसके नेता ओम प्रकाश राजभर हर दूसरे दिन बीजेपी के खिलाफ बयान देते हैं. यूपी के ही दूसरे सहयोगी दल – अपना दल (सोनेलाल) को लगता है कि गठबंधन में उसका अपमान हो रहा है. अपना दल ने भी अपनी नाखुशी जाहिर कर दी है. शिव सेना हालांकि गठबंधन में है, लेकिन लगातार आंख तरेर रही है. अब वो कह रही है कि महाराष्ट्र में उसे उतनी ही सीटें चाहिए, जितनी सीटों पर बीजेपी लड़ेगी.

बीजेपी ने 2019 के लिए अपना पहला गठबंधन बिहार में फाइनल किया है, जहां उसे एक अजीब सा चुनावी तालमेल करना पड़ा है. पिछली लोकसभा में बीजेपी के बिहार से 22 सांसद थे. अब उसने एक ऐसा तालमेल किया है, जिसमें उसे पांच मौजूदा जीती हुई सीटें छोड़नी पड़ रही हैं. बिहार में 40 में से 17 सीट पर बीजेपी, 17 पर जेडीयू और 6 पर लोक जनशक्ति पार्टी चुनाव लड़ेगी. यहीं नहीं लोक जनशक्ति पार्टी ने राज्यसभा में अपने लिए एक सीट का सार्वजनिक वादा भी बीजेपी से करवा लिया है.


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अब ये सवाल पूछे जाने लगे हैं कि बिहार में 22 सीटें जीत चुकी बीजेपी अबकी बार 17 सीटों पर ही लड़ने को क्यों राज़ी हो गयी? जाहिर है कि ये शिकार करने निकले अकेले शेर के लक्षण नहीं हैं.

दरअसल बीजेपी एक परसेप्शन से बचने के लिए जूझ रही है. वह नहीं चाहती कि ऐसा कोई मैसेज जनता में जाए कि सहयोगी दल बीजेपी का साथ छोड़ रहे हैं. सहयोगी दलों के आने जाने से केंद्र में उसकी सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन इससे बीजेपी का मूड खराब होता है. बीजेपी जब बिहार में जब अपनी पिछली बार की पांच जीती हुई सीट छोड़ देती है, तो उसकी इस कुर्बानी को इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए.

भारत के ज़्यादातर क्षेत्रीय दलों ने अलग अलग समय में बीजेपी की पालकी उठायी है या उसके साथ कदम ताल किया है. ममता, नीतीश, पासवान, जयललिता, महबूबा, नवीन, चन्द्रबाबू, चौटाला, अब्दुल्ला, मायावती, वाइको, रामदास, शरद जैसे कितने ही छोटे-बड़े नेताओं ने एक या दूसरे समय में बीजेपी के साथ चलने का रास्ता चुना था. इनमें से ज्यादातर अब बीजेपी विरोधी खेमे में हैं. शिवसेना और अकाली दल ही बीजेपी के टिकाऊ दोस्त रह गए हैं. बाकी दल कब किधर जाएंगे ये सिर्फ उन दलों के नेता जानते हैं.

यह राजनीति के अवसरवाद के साथ बीजेपी की मौजूदा राजनीतिक हैसियत को भी दर्शाता है. 2014 में 29 दल इस भरोसे के साथ बीजेपी के साथ आए थे कि केंद्र में बीजेपी की सरकार बनती दिख रही थी. अगर ऐसी आश्वस्ति होगी तभी बीजेपी 2019 के लिए ऐसा बड़ा गठबंधन बना पाएगी.

ताज़ा विधानसभाओं चुनाव ने बीजेपी के मुंह का ज़ायक़ा बुरी तरह से बिगाड़ दिया. ऐसे में 2014 में बिहार की जीती हुई पांच सीटों की क़ुर्बानी, बहुत मामूली बात है. नीतीश भी 17 सीट पाकर गदगद हैं. 2014 में बेचारे अकेले लड़कर 2 सीट पर ही सिमट गये थे. रामविलास पासवान को तो सबसे अच्छी डील मिली है.

क्या यह इस बात का प्रमाण है कि बीजेपी अपने सहयोगी दलों को एडजस्ट करने के मूड में है? लगता तो यही है. साढ़े चार साल तक बेलगाम सरकार चलाने वाली बीजेपी के सहयोगी दल बीजेपी से अपनी मांग मनवा पा रहे हैं, यह एक नई राजनीतिक परिस्थिति है. इससे यही बात साबित होती है कि 2014 के अपवाद को छोड़ दें, तो भारत अब भी गठबंधन युग में है और कोई बड़ी पार्टी अहंकार करके छोटे दलों को दबाना चाहेगी, तो ये हमेशा हो नहीं पाएगा. चुनाव के मौसम में तो कतई नहीं हो पाएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक प्रेक्षक हैं.)


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