नरेंद्र मोदी की फाइल फोटो| वेइे लेंग ते
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असल मुद्दा अर्थव्यवस्था का है.

तीन राज्यों के चुनाव परिणामों ने इस संभावना को बढ़ा दिया है कि नरेंद्र मोदी शायद अगले छह महीनों में प्रधानमंत्री नहीं रहें. इसका मतलब ये नहीं है कि परिणाम तय हैं, पर आखिरकार खेल दिचलस्प हो गया है.

धर्मनिरपेक्ष गिरावट

भाजपा जहां ‘ब्रांड मोदी’ के अपने ब्रह्मास्त्र पर भरोसा करती रही है, वहीं पिछले दिसंबर से ही इसकी चुनावी पूंजी में गिरावट की स्पष्ट प्रवृति दिख रही है.

पार्टी प्रधानमंत्री के गृहप्रदेश गुजरात में पराजय के बहुत करीब आ गई थी. दिग्गज प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखे जाने वाले अमित शाह कर्नाटक में भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं दिला पाए. (मदद का प्रयास करने वाले एक हितैषी राज्यपाल की मौजूदगी के बाद भी वह राज्य में कांग्रेस-जेडीएस सरकार का गठन नहीं रोक सके.) भाजपा एक-एक कर लोकसभा उपचुनावों में हारती रही, विशेषकर गोरखपुर, अजमेर और बेलारी जैसे अपने गढ़ों में. अब यदि आप तीन राज्यों के हाल के चुनाव परिणामों को इस प्रवृति के तहत देखें तो एक बड़ी तस्वीर उभरती है.

हमें लगातार इन चुनावों को स्थानीय मुक़ाबलों के रूप में देखने को कहा गया. भाजपा के नहीं जीतने की स्थिति में ये नरेंद्र मोदी पर जनमत संग्रह नहीं हैं. 2014 की मोदी लहर की तुलना में वोट शेयर में थोड़ी गिरावट के कारण को समझा जा सकता है. यहां तक कि उत्तर प्रदेश में भी, जहां कि भाजपा को 2017 में दो तिहाई बहुमत मिला था, वोट शेयर में 2014 के मुक़ाबले गिरावट आई. 2015 में दिल्ली जैसे कुछ उदाहरणों को छोड़ दें तो पार्टी के वोट शेयर में गिरावट सामान्य स्तर की रही थी. राजस्थान के मामले में ऐसा नहीं है जहां पार्टी ने 2014 के बाद 16 फीसद अंक की गिरावट दर्ज़ की है, या मध्य प्रदेश में जहां इसने अपने 13 फीसद वोट गंवा दिए हैं, या छत्तीसगढ़ में जहां यह अपने वोट शेयर में से करीब 16 प्रतिशत अंक खो चुकी है. संभवत: इन राज्यों में ऐसा कुछ चल रहा है जो पत्रकार और रायशुमारी वाले, दोनों ही देख नहीं पा रहे हैं. शायद यहां व्यापक मोहभंग की स्थिति है, भले ही उसकी अभिव्यक्ति मात्र स्थानीय विधायकों या राज्य के मुख्यमंत्री के खिलाफ़ होती हो.

 

मोदी अच्छे हैं, पर…

ये सच है कि मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के मतदाताओं ने कहा कि वे केंद्र सरकार के खिलाफ़ नहीं, बल्कि स्थानीय एंटी-इनकंबेंसी के अनुरूप मत डाल रहे हैं. मेरे जैसे चुनावी पर्यटकों को भी ऐसे वोटर मिले जिन्होंने कहा कि वे स्थानीय विधायक को हराने के लिए कांग्रेस को वोट दे रहे हैं, पर 2019 में उन्होंने ‘मोदी’ को वोट देने का मन बना रखा है.

पर, इस बात पर गौर करें: जनता ने पसंद करने के बाद भी शिवराज सिंह चौहान को सत्ता से बाहर कर दिया. इसलिए ये संभव है कि लोग मोदी को अच्छा बताते रहें, लेकिन फिर भी उन्हें हरा दें. ऐसा ही उत्तर प्रदेश में हुआ था, जहां लोगों ने कहा था कि उन्हें अखिलेश यादव पसंद हैं, पर उनकी पार्टी नहीं. ‘अखिलेश अच्छे हैं, पर…’ या ‘शिवराज अच्छे हैं, पर…’ का राग ऐसे मामलों में अक्सर सुनाई देता है. यही बात मोदी के मामले में भी हो सकती है. पहले ही मोदी ‘बेहतरीन’ से नीचे गिरकर ‘ठीक’ पर आ चुके हैं.

मोदी के प्रवक्ता अक्सर दावा करते हैं कि उनकी रैलियां भाजपा को जीत दिलाती हैं. हमें बताया गया कि उत्तर प्रदेश में जिन सीटों पर मोदी ने रैलियों को संबोधित किया वहां पार्टी के पक्ष में चार प्रतिशत का स्विंग देखा गया. पर राज्यों के हाल के चुनावो में मोदी ने जहां-जहां रैलियां संबोधित की थी उनमें से 70 फीसदी सीटों पर भाजपा को पराजय का सामना करना पड़ा.

वही पुरानी कहानी

लोकप्रिय नेता शिवराज सिंह चौहान की हार में नरेंद्र मोदी के लिए एक और सबक है. लोगों ने शिवराज से ‘थक’ जाने की बात की. वे बस उनसे ऊब गए. वही भाषण, वही पंक्तियां, वही जुमले. लोग नई फिल्म देखना चाहते थे.

चुनाव में सफल होने के लिए अच्छा कथानक प्रस्तुत करना होता है, और मोदी विगत में अपनी बातों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे. पर पिछले साल भर से मोदी बोर करने लगे हैं. हिंदुत्व से इसकी भरपाई नहीं हो रही है.

मोदी के पास कहने को नया कुछ नहीं है, सिवाय कांग्रेस पर हमले करने के. तीन राज्यों में हार के सप्ताह भर बाद वह वही पुराने तर्क पेश कर रहे हैं. अभी भी उनका कहना है कि उनका ‘कोई विकल्प नहीं है’, लेकिन तीन राज्यों ने दिखा दिया कि ‘कोई विकल्प नहीं है’ की स्थिति ‘क्या कोई विकल्प नहीं है?’ में भी तब्दील हो सकती है.

असल मुद्दा अर्थव्यवस्था का है

नरेंद्र मोदी अब भी 2019 में हार सकते हैं, और ऐसा ठोस आर्थिक वज़हों से हो सकता है.

लोग नरेंद्र मोदी, उनकी भाषण कला और कड़क नेता की छवि को चाहे जितना पसंद करें, चाहे जिस हद तक उनके व्हाट्सएप प्रचार की गिरफ्त में पड़ें, यदि उनकी आमदनी नहीं बढ़ी तो वे मोदी का साथ छोड़ सकते हैं. इस प्रक्रिया में निसंदेह विपक्षी एकता की बढ़ती संभावना का भी योगदान होगा, जब तमाम राजनीतिक दल हर सीट पर भाजपा का एकजुट होकर मुक़ाबला करने का प्रयास कर रहे हों.

नोटबंदी से लेकर जीएसटी और बैंकिंग संकट की उपेक्षा तक, नरेंद्र मोदी के शासन में अर्थव्यवस्था में नकदी का संकट बना रहा. जब नकदी उपलब्ध नहीं हो और बैंक ऋण अपर्याप्त हो, और उपज कौड़ी के भाव बिके, तो भला मोदी कैसे जीत सकते हैं? शौचालय, गैस सिलिंडर और आवास अच्छे हैं, पर आमदनी में ठहराव की कीमत पर नहीं, और ना ही बेरोज़गारी के इस भयानक स्तर पर होते हुए कि जब सरकार बेरोज़गारी के आंकड़े छापने से बचती हो.

मोदी के हारने की संभावना बहुतों को असंभव लग सकती है. मोदी समर्थकों को तो लगता है कि भाजपा अब भी करीब 250 सीटों के साथ वापस आएगी. मोदी के आलोचक अब भाजपा की सीटें 200 से कम रहने पर सहमत हैं. पर राजनीति महज आंकड़ेबाज़ी नहीं होती है. यदि हफ्ते भर पहले कोई आपसे कहता कि टीआएएस तेलंगाना में 88 सीटें जीतने जा रही है, या कांग्रेस छत्तीसगढ़ में 68 सीटों पर जीतेगी, आप शायद उसका मज़ाक उड़ाते.

यदि भाजपा की सीटें कम होती हैं, तो स्वाभाविक है कि कांग्रेस की सीटों की संख्या बढ़ेगी. वर्ष 2014 में 224 सीटों पर कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही थी. अपनी सिर्फ 145 सीटों के बल पर कांग्रेस ने यूपीए-1 की सरकार बनाई थी. 11 दिसंबर के परिणामों ने कांग्रेस को एक बार फिर 2004 जैसी स्थिति में ला खड़ा किया है.

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