नई दिल्ली: ऐसा बहुत कम होता है कि कांग्रेस की किसी राज्य इकाई के प्रमुख, शीर्ष नेतृत्व के साथ होने वाली बैठक से कुछ मिनट पहले ही, अन्य दलों के साथ संभावित गठबंधन पर अपनी “निजी राय” सार्वजनिक कर दें. इस बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और नेता विपक्ष राहुल गांधी भी शामिल थे.
लेकिन गुरुवार को पश्चिम बंगाल प्रदेश कांग्रेस कमेटी (WBPCC) के अध्यक्ष सुभंकर सरकार ने ऐसा ही किया. खरगे के आवास में प्रवेश करते समय उन्होंने कहा कि अगर उन्हें विकल्प दिया जाए तो वे 2026 के बंगाल विधानसभा चुनाव कांग्रेस को अकेले लड़ते देखना चाहेंगे.
सरकार को यह भरोसा इस बात से मिला कि अधीर रंजन चौधरी और प्रदीप भट्टाचार्य जैसे कुछ नेताओं को छोड़कर लगभग पूरी राज्य इकाई अकेले चुनाव लड़ने के पक्ष में है. यह स्थिति 2006 के बाद पहली बार बनी है, जब कांग्रेस ने बंगाल में आखिरी बार बिना किसी गठबंधन के विधानसभा चुनाव लड़ा था.
2011 में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के साथ गठबंधन में थी, जिसने उसी साल बंगाल में लेफ्ट के 34 साल के शासन का अंत किया था. इसके बाद कांग्रेस ने 2016 और 2021 के विधानसभा चुनाव लेफ्ट के साथ मिलकर लड़े थे.
पश्चिम बंगाल कांग्रेस की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी के सदस्य रणजीत मुखर्जी ने कहा कि इस ऐलान पर पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं की प्रतिक्रिया “बहुत सकारात्मक” रही है.
मुखर्जी ने दिप्रिंट से कहा, “मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे कांग्रेस के मजबूत इलाकों में हम मुख्य विपक्षी पार्टी हैं और हम अपनी ताकत पर सीटें जीतेंगे. दक्षिण बंगाल में, जहां पिछले 20 वर्षों से गठबंधन की नीति के कारण कांग्रेस कमजोर होती चली गई, अब हम आखिरकार खुद को एक विकल्प के रूप में पेश कर पा रहे हैं. हमें उम्मीद है कि कांग्रेस से जुड़ा पूरा इकोसिस्टम फिर से हमारे साथ आएगा और हम उस पर आगे काम करेंगे. यह चार-तरफा मुकाबला होगा और कांग्रेस 2026 के विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करेगी.”
पार्टी के अंदरूनी सूत्रों ने बताया कि इस बार कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व भी लेफ्ट के साथ गठबंधन के पक्ष में नहीं था. इसकी वजह पिछले चुनावों में सीमित चुनावी फायदा और केरल में होने वाले आगामी चुनाव हैं. केरल में कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) आने वाले चुनावों में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) को सत्ता से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक रहा है.
सत्तारूढ़ टीएमसी के साथ संभावित गठबंधन के सवाल पर केंद्रीय नेतृत्व इतना सख्त नहीं था. गुरुवार को खरगे के आवास पर हुई समीक्षा बैठक में मौजूद एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक राहुल गांधी ने बंगाल के नेताओं से पूछा कि क्या TMC की ओर से संपर्क की कोई कोशिश हुई है.
नेता ने दिप्रिंट को बताया, “जब उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं हुआ है, तो राहुल ने तुरंत सरकार के प्रस्ताव का समर्थन कर दिया.”
सूत्रों ने कहा कि गठबंधन को लेकर सरकार का रुख बंगाल कांग्रेस के बड़ी संख्या में पदाधिकारियों, जिनमें जिला अध्यक्ष भी शामिल हैं, से मिले फीडबैक पर आधारित है.
एक कांग्रेस पदाधिकारी ने कहा, “बंगाल इकाई में आम सोच यह है कि गठबंधन से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होता. अगर पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी तो कम से कम उसका संगठन उन इलाकों में सक्रिय होगा, जहां वह सालों से चुनाव नहीं लड़ पाई है. इससे पार्टी को सत्ता विरोधी माहौल के आधार पर अपना चुनाव अभियान चलाने का मौका भी मिलेगा.”
नेताओं के दिमाग में एक और बात यह भी थी कि “लेफ्ट के वोट कांग्रेस को ट्रांसफर नहीं हो रहे थे, जिससे गठबंधन का पूरा विचार ही बेकार साबित हो रहा था.”
बैठक में, भले ही वे अल्पमत में थे, अधीर रंजन चौधरी ने लेफ्ट के साथ गठबंधन के पक्ष में दलील दी. उन्होंने कहा कि विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision) के दौरान कांग्रेस राज्य के ज्यादातर बूथों पर बूथ लेवल एजेंट (बीएलए) तैनात नहीं कर पाई थी.
2016 से अब तक कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन में दो विधानसभा चुनाव और एक लोकसभा चुनाव लड़ा है, लेकिन इसके बावजूद वह पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक हाशिए की और संघर्ष करती हुई ताकत बनी रही है.
2011 में, जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस (यूपीए) का हिस्सा थी, उसने 294 सदस्यीय विधानसभा में 184 सीटें जीती थीं, जबकि कांग्रेस को 42 सीटें मिली थीं.
2016 में कांग्रेस ने टीएमसी को सत्ता से हटाने के लिए लेफ्ट के साथ हाथ मिलाया. कांग्रेस ने 44 सीटें जीतीं, जो सीपीआई(एम) की 26 सीटों से ज्यादा थीं, लेकिन वोट शेयर के मामले में वह काफी पीछे रही. कांग्रेस को सिर्फ 12.25 प्रतिशत वोट मिले, जबकि सीपीआई(एम) को 19.75 प्रतिशत वोट मिले. टीएमसी ने 44.9 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 211 सीटें जीतकर चुनाव में बड़ी जीत दर्ज की.
2019 के लोकसभा चुनावों के लिए लेफ्ट-कांग्रेस गठबंधन को फिर से बनाने की कोशिशें नाकाम रहीं, जिसके बाद कांग्रेस को 2006 के बाद पहली बार अकेले चुनाव लड़ना पड़ा. नतीजों ने पार्टी की कमजोर होती संगठनात्मक ताकत को साफ दिखा दिया. कांग्रेस ने जिन 40 सीटों पर चुनाव लड़ा, उनमें से सिर्फ दो सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर महज 5.67 प्रतिशत रहा.
2021 के विधानसभा चुनावों के लिए गठबंधन फिर से बनाया गया, इस बार इसमें एक इस्लामी मौलवी के नेतृत्व वाली इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF) को भी शामिल किया गया. नतीजे दोनों साझेदारों के लिए बेहद खराब रहे. कांग्रेस और लेफ्ट दोनों ही एक भी सीट नहीं जीत सके, जबकि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) टीएमसी के खिलाफ मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरी.
कांग्रेस ने 91 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे सिर्फ 2.93 प्रतिशत वोट मिले. लेफ्ट फ्रंट ने 138 सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 9.32 प्रतिशत वोट शेयर मिला. यही स्थिति 2024 के आम चुनावों में भी देखने को मिली. उस चुनाव में लेफ्ट को एक भी सीट नहीं मिली और कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली, क्योंकि राज्य की राजनीति पूरी तरह टीएमसी और बीजेपी के बीच दो-तरफा मुकाबले में बदल चुकी है.
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