Thursday, 20 January, 2022
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UP में हो रहे इस्तीफों से वफादारों की कीमत पर दूसरी पार्टियों से नेताओं को लाने की BJP की नीति पर उठे सवाल

इस सप्ताह भाजपा का साथ छोड़ने वाले यूपी के सभी मंत्री और विधायक इस पार्टी में अन्य दलों से आए थे. इनका आरएसएस या भाजपा से कोई वैचारिक लगाव नहीं था. बंगाल और अन्य राज्यों में भी इसी तरह के लोग पार्टी से बाहर गए हैं.

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नई दिल्ली: 72 घंटों के अंतराल में, 11 से 13 जनवरी के बीच, उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दस विधायकों – जिनमें योगी आदित्यनाथ कैबिनेट के तीन मंत्री भी शामिल हैं – ने पार्टी छोड़ दी. उन्हें आपस में जोड़ने वाला एक ही सामान्य सूत्र था: उनमें से किसी को भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा वैचारिक रूप से तैयार नहीं किया था, न हीं उनमें से किसी ने भी भाजपा के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू की थी. वे सब-से-सब राजनीतिक दलबदलू थे – उनमें से नौ बहुजन समाज पार्टी (बसपा) से और एक कांग्रेस से भाजपा में आये थे.

आगामी महत्वपूर्ण विधानसभा चुनावों से कुछ ही हफ्तों पहले अपनी वफादारी को फिर से बदलने के उनके फैसले को पुल (खिंचाव) और पुश (दुराव) दोनों कारकों से जोड़कर समझाया जा सकता है: खिंचाव वाला कारक अखिलेश यादव द्वारा समाजवादी पार्टी, जो यादव-मुस्लिम पार्टी के रूप में अपनी छवि से बाहर निकलना चाहती है और गैर-यादव अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) को गले लगाना चाहती है, एक प्रमुख चुनौती के रूप में पेश करने में मिली अपेक्षाकृत अधिक सफलता से जुड़ा है और दुराव वाला कारक सरकार और पार्टी दोनों में केंद्रीकृत सत्ता संरचना होने के कारण महत्वाकांक्षी नेताओं का हतोत्साहित होना बताया जा रहा है.

लेकिन, जो बात भाजपा नेताओं को विशेष रूप से चुभ रही है, वह है इस विचार का एक बार फिर से प्रमाणित होना कि अच्छे वक्त में अन्य दलों के नेताओं को आयात करना आसान होता है लेकिन जब मुश्किल की घडी आती है तो उन पर भरोसा नहीं किया जा सकता.

विधायकों का यह पलायन प्रभावशाली ओबीसी नेता और मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य के पार्टी से बाहर निकलने के साथ शुरू हुआ था. इसके बाद उसी दिन उनके करीबी तीन विधायकों – भगवती सागर रोशन लाल वर्मा और बृजेश प्रजापति – ने अपना इस्तीफा दे दिया था. कुछ समय बाद राज्य के एक अन्य मंत्री दारा सिंह चौहान और विधायक अवतार सिंह भड़ाना ने भी इस्तीफा दे दिया. गुरुवार को यूपी के एक अन्य मंत्री धर्म सिंह सैनी और भाजपा के तीन अन्य विधायकों – विनय शाक्य, मुकेश वर्मा और बाला अवस्थी – ने भी पार्टी छोड़ दी है.

दिल्ली में भाजपा के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने दिप्रिंट को बताया कि ‘जहां कई ऐसे नेता हैं जो अन्य पार्टियों से शामिल हुए और उन्हें भाजपा में एडजस्ट (समायोजित) करने में कोई समस्या नहीं हुई, वहीं कुछ ऐसे भी नेता हैं जिन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ता है क्योंकि वे ‘नेता-आधारित पार्टी’ से आते हैं. ऐसे नेताओं के इतने कम अंतराल के बाद पार्टी ही छोड़ने के पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि वे आरएसएस की पृष्ठभूमि से नहीं आते हैं, जैसा कि भाजपा में कई नेता करते हैं और इसलिए वे .वैचारिक रूप से से अधिक प्रेरित होते हैं.

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इस पदाधिकारी ने कहा, ‘जो लोग अन्य पार्टियों को छोड़कर आते हैं वे हर समय हरियाली की तलाश में रहते हैं. वे अपना सारा ध्यान सत्ता हासिल करने पर देते हुए हीं आते हैं. जिस क्षण वे सत्ता के समीकरण में कोई बदलाव देखते हैं या फिर जैसे ही वे कोई बेहतर सौदा कर पाने में सक्षम होते हैं, उसी क्षण वे पार्टी छोड़ने को तैयार हो जाते हैं. यूपी के ये सभी नेता, जिन्होंने हाल-फिलहाल में पार्टी छोड़ने की घोषणा की है, उनमें से ज्यादातर बसपा से हैं. वे सिर्फ अपने लिए सत्ता-सुख और अपने रिश्तेदारों के लिए टिकट पाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. भाजपा इस तरह के दृष्टिकोण से वास्ता नहीं रखती है. पश्चिम बंगाल में भी ऐसा ही कुछ हुआ था.’

उदाहरण के लिए, श्रम मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य, जिनके सोमवार को इस्तीफे के बाद से यह पलायन शुरू हुआ है, कथित तौर पर अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे. हालांकि उन्होंने इस बात से इनकार किया है, मगर उनकी बेटी संघमित्रा पहले से ही बदायूं से भाजपा सांसद हैं. एक अन्य मंत्री, दारा सिंह चौहान, जिन्होंने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया, पहले से ही पाला बदलने के लिए जाने जाते रहें हैं. उन्होंने बसपा के साथ अपना राजनीतिक जीवन शुरू किया था और इसके बाद सपा में शामिल हो फिर से बसपा में वापिस आ गए थे. साल 2015 में वह बसपा से भाजपा में आ गए थे. यह बसपा द्वारा उन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए निष्कासित कर दिए जाने के करीब एक महीने बाद हुआ था.’

भाजपा के एक दूसरे पदाधिकारी ने कहा, ‘भाजपा में शामिल होने वाले कई नेताओं का यहां घुल-मिल पाना मुश्किल होता है क्योंकि वे एक अलग तरह की शैली के कामकाज के अभ्यस्त होते हैं, जहां वे अपने आप में मुख्य नेता होते हैं.’ उन्होंने आगे कहा, ‘भाजपा एक कैडर-बेस्ड (कार्यकर्त्ता आधारित) पार्टी है न कि कोई नेता-आधारित पार्टी. इसलिए स्वाभाविक रूप से इन आयातित नेताओं के लिए अपने आप को समायोजित करना मुश्किल होता है. भाजपा एक संयुक्त परिवार की तरह है जहां सभी को महत्व दिया जाता है. ये लोग एकल परिवारों से आते हैं जहां व्यक्ति विशेष का अधिक महत्व होता है.’

इस बीच, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गुरु प्रकाश पासवान ने पार्टी से बाहर निकलने वाले इन नेताओं द्वारा लगाए गए आरोपों को खारिज कर दिया. उन्होंने कहा, ‘हमने स्वामी प्रसाद मौर्य और दारा सिंह चौहान जैसे नेताओं को इस आधार पर पार्टी छोड़ते हुए देखा है कि भाजपा ओबीसी और दलितों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दे रही है, जो सत्य से बहुत परे है. हम अन्य पिछडा वर्ग, अनुसूचित जाति, अथवा अनुसूचित जन जाति, को वोट बैंक के रूप में नहीं बल्कि विचार बैंक के रूप में देखते हैं. हमारे पीएम खुद ओबीसी समुदाय से आते हैं. भाजपा ने उनके लिए कई कल्याणकारी उपाय किए हैं.’

पासवान ने कहा, ‘अगर कोई मंत्री रहने के बाद भी बाहर जा रहा है तो लोग बखूबी समझते हैं कि वह राजनीतिक अवसरवाद की वजह से बाहर जा रहा है. जहां तक अन्य दलों के नेताओं के भाजपा में शामिल होने का सवाल है, तो किसी भी व्यक्ति के किसी भी राजनीतिक दल में शामिल होने पर कोई संवैधानिक रोक नहीं है.’


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दलबदलुओं का जमघट

भाजपा में शामिल राजनीतिक दलबदलुओं द्वारा पार्टी छोड़ने की घटानाएं सिर्फ उत्तर प्रदेश तक ही सीमित नहीं है. पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों से पहले भाजपा में शामिल होने के लिए तृणमूल कांग्रेस छोड़ने वाले कई नेता भी तृणमूल की जीत के बाद जल्द ही अपनी पुरानी पार्टी में लौट गए थे.

मुकुल रॉय, जो साल 2017 में भाजपा में शामिल हुए थे, ने कृष्णानगर उत्तर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की. भाजपा ने उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष भी बनाया था. फिर भी, जून 2021 में रॉय अपने बेटे और पूर्व विधायक सुभ्रांशु के साथ टीएमसी के पाले  में वापस लौट आए थे.

जनवरी 2021 में भाजपा में शामिल हुए राजीव बनर्जी भी अक्टूबर में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से माफी मांगने के साथ टीएमसी में वापस लौट गए. भाजपा ने उन्हें अपनी राष्ट्रीय कार्यकारिणी का सदस्य बनाया था. इससे पहले उन्होंने ममता सरकार में मंत्री के रूप में भी कार्य किया था.

इसी तरह, सब्यसाची दत्ता (कोलकाता के पूर्व महापौर जो 2019 में भाजपा में शामिल हुए थे ), बिस्वजीत दास (बगदा विधायक, 2019 में भाजपा में शामिल हुए), सौमेन रॉय (कालियागंज विधायक, 2020 में भाजपा में शामिल हुए), और तन्मय घोष (विष्णुपुर विधायक, 2002 में भाजपा में शामिल) जैसे नेता भी पिछले कुछ महीनों में दुबारा टीएमसी में शामिल हुए हैं.

दिल्ली स्थित लेखक और पत्रकार नीलांजन मुखोपाध्याय का कहना है कि भाजपा के लिए इस बात के आकलन का समय आ गया है कि कहां ‘गलती’ हुई है.

मुखोपाध्याय ने दिप्रिंट से कहा, ‘यह सच है कि 2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा एक आकर्षक पार्टी थी. इसी तरह पश्चिम बंगाल में भी, 2021 में, भाजपा फिर से उतनी ही आकर्षक दिख रही थी जिसके वजह से इतने सारे लोग इसके साथ आये. हालांकि, इस्तीफों का सिलसिला इस ओर इशारा करता है कि अब वह बात नहीं रही. यह चुनाव से पहले भाजपा के लिए परेशानी का सबब भी है, और वह जरूर यह आकलन करना चाहेगी कि क्या गलती हुई है और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है.’

उन्होंने आगे बताया, ‘इसी के साथ हमें यह भी याद रखना चाहिए कि 2017 में यह मोदी-शाह की जोड़ी थी जो पार्टी के सभी मामलों के लिए जिम्मेदार थी. लेकिन, 2021 में हमारे पास योगी आदित्यनाथ के रूप में राज्य में एक और शीर्ष नेतृत्व है. उनके कारण, अन्य भाजपा शासित राज्यों की तुलना में यहां राज्य और केंद्र के बीच संबंधों का एक अलग मॉडल है.’

उन्होंने कहा,  ‘पहली नजर में ऐसा प्रतीत होता है कि योगी के भाजपा द्वारा बनाये गए सामाजिक गठबंधन के प्रति वफादार नहीं होने के आरोप, और राज्य सरकार के कोविड कुप्रबंधन के कारण पार्टी की लगातार गिरती लोकप्रियता भी इस पलायन के पीछे के कारण हो सकते हैं.’

दूसरी तरफ भाजपा शासित उत्तराखंड में भी पार्टी की परेशानी बढ़ रही है. वहां के मंत्री यशपाल आर्य ने अपने बेटे संजीव आर्य के साथ कांग्रेस में लौटने के लिए अक्टूबर में इस्तीफा दे दिया था. वे जनवरी 2017 में कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हुए थे.

महाराष्ट्र में भी, पूर्व मंत्री और भाजपा नेता सुनील देशमुख ने पार्टी छोड़ दी और जून 2021 में राहुल गांधी के जन्मदिन पर कांग्रेस में शामिल हो गए. पिछले साल ही नांदेड़ के पूर्व सांसद भास्कर पाटिल खतगांवकर ने सात साल के अंतराल के बाद भाजपा छोड़ दी थी और फिर से कांग्रेस में शामिल हो गए थे.

कई विधायकों के भाजपा में शामिल होने और कुछ ही दिनों के अंतराल में पार्टी छोड़ने के कुछ मामले भी सामने आए हैं. पंजाब में, हरगोबिंदपुर विधायक बलविंदर सिंह लड्डी भाजपा में शामिल होने के कुछ दिनों बाद ही इस महीने की शुरुआत में कांग्रेस में दुबारा वापस चले गए, जिसकी वजह से भाजपा को शर्मिंदगी उठानी पड़ी.


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‘यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह रणनीति उलटी साबित हो रही है’, इसने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है’

आरएसएस से जुड़े सूत्रों ने दिप्रिंट को बताया कि हालांकि संघ ने भाजपा के मामलों में कभी भी हस्तक्षेप नहीं किया, फिर भी उसे अन्य दलों से दलबदल करवाने की कवायद करने या फिर सिर्फ सत्ता हासिल करने के लिए दलबदलुओं को शामिल करने की रणनीति के बारे में हमेशा से आपत्ति रही है.

इस सूत्र ने कहा, ‘लेकिन एक सच्चाई यह भी है कि भाजपा भले ही अलग दिखने वाली पार्टी  (पार्टी विथ ए डिफरेंस) न रह गई हो, परन्तु यह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है. सफलता के समान कामयाब कुछ भी नहीं होता.’

इस सूत्र का कहना था, ‘भाजपा और आरएसएस में हमेशा इस बारे में संशय रखने वाले लोग रहे हैं लेकिन वे तब तक चुप रहते हैं जब तक कि यह रणनीति पार्टी को अपना प्रभाव बढ़ाने और इसकी सरकारें स्थापित करने के मामले में अच्छा परिणाम देती रहती है.’

दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (सीएसडीएस) के प्रोफेसर संजय कुमार ने कहा कि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि अन्य पार्टियों से नेताओं को अपनी पार्टी में लाने की भाजपा की रणनीति उलटी पड़ रही है.

उन्होंने कहा, ‘देखिए, हम अभी यह नहीं कह सकते कि यह कदम एकदम से उल्टा पड़ रहा है. हां, हम जानते हैं कि जिन लोगों ने भाजपा छोड़ी है, उन्हें दूसरी पार्टियों से आयात किया गया था. इसलिए चाहे सीमित तरीके से ही सही पर यह काम नहीं कर रहा है.’

प्रोफेसर कुमार ने कहा, ‘लेकिन हमें यह भी याद रखने की जरूरत है कि इसी रणनीति ने 2017 में इसके पक्ष में काम किया था, और इसी तरह के दलबदल ने उन्हें मध्य प्रदेश में भी अपनी सरकार दुबारा बनाने में मदद की है.  इसलिए मैं सीधे- सीधे यह नहीं कह सकता कि यह उल्टा असर कर रही है. अभी यह कहना जल्दबाजी होगी. हां, अगर पलायन जारी रहता है और, मान लीजिए, अन्य दलों से पार्टी में लाए गए 10-15 नेता पार्टी छोड़ देते हैं, तो फिर माना जा सकता है कि यह रणनीति विफल हो रही हो.‘

इसी तरह दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के फेलो (शोधकर्ता) राहुल वर्मा का दावा है कि नेताओं को आयात करने की रणनीति ने अपने उद्देश्य को पूरा कर दिया है और यह हमेशा के लिए फलदायक नहीं हो सकती है.

वर्मा ने दिप्रिंट को बताया, ‘देखिए, कोई भी रणनीति आपको हमेशा के लिए लाभ नहीं पहुंचाने वाली है. इसका (दलबदल करवाने का) एक खास उद्देश्य था और 2014, 2017 और 2019 में, इसने उनका अच्छी तरह से साथ दिया. इसलिए अब भाजपा 2000 के दशक आयी अपनी राजनैतिक गिरावट के दौर से निकलकर उत्तर प्रदेश में एक प्रमुख चुनावी ताकत बन गई है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘अब, सवाल यह है कि हम दारा सिंह चौहान और स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे लोगों को क्यों (पार्टी छोड़ते हुए) देख रहे हैं? आप देख सकते हैं कि यह बहुत सामान्य बात है और यह हर समय – खासकर सभी चुनावों के दौरान –  होता रहता है. लोग पार्टियों को छोड़ देते हैं, यहां तक कि जो लोग सत्ता में हैं वे भी कुछ उससे भी अच्छी जगहों की तलाश में अपनी पार्टियां बदल लेते हैं. बेशक, इस बारे में कुछ वैध चिंताएं भी हो सकती हैं.’

वर्मा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, ‘क्या ये नेता भाजपा को इसकी कीमत चुकाने पर मजबूर कर सकते हैं? क्या यह भाजपा के लिए हानिकारक साबित होगा? मुझे ऐसा नहीं लगता. हां कुछ हद तक इनमें से प्रत्येक राजनेता का अपने जिलों में किसी-न-किसी प्रकार का प्रभाव है, इसलिए वे वहां पार्टी की थोड़ा नुकसान पहुंचा सकते हैं, लेकिन भाजपा के लिए वोट काफी हद तक पार्टी, उसके कार्यक्रमों, उसके एजेंडे तथा राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर उसके शीर्ष नेतृत्व द्वारा प्रेरित होता है.‘

उन्होंने कहा, ‘जहां तक भाजपा का सवाल है, स्थानीय उम्मीदवार इस पार्टी की झोली में कोई अतिरिक्त वजन नहीं डालते हैं. यही वजह है कि वह सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए अगले चुनाव में अपने लगभग आधे विधायकों का पत्ता साफ़ करने की रणनीति अपनाती है.’

(इस खबर को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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