Saturday, 4 December, 2021
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राजस्थान में भी पंजाब जैसे सियासी हालात उत्पन्न कर रहा कांग्रेस आलाकमान

पंजाब में जो कुछ हुआ उससे न अमरिंदर सिंह को फायदा हुआ, न नवजोत सिंह सिद्धू को और न कांग्रेस पार्टी को. राजस्थान में भी वही सब दोहराया जा रहा है.

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कांग्रेस पार्टी के ‘प्रथम परिवार’ को आज पंजाब में जो कुछ नज़र आ रहा होगा वह 10, जनपथ या 12, तुग़लक लेन के बाहर के लोग नहीं देख सकते. विवादास्पद कृषि कानूनों को वापस लेने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद सियासी हलक़ों में लगभग एक बात पर लगभग सहमति दिख रही है कि इससे कांग्रेस के लिए हवा उलट सकती है.

पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह का भाजपा के साथ गठबंधन लगभग तय है और शिरोमणि अकाली दल के साथ भी उनकी आपसी आंतरिक समझदारी बन सकती है. इसलिए जाहिर है कि पंजाब में कैप्टन एक बड़ी ताकत के रूप में उभर रहे हैं. निजी बातचीत में कांग्रेसी नेता यह कहते सुने जा सकते हैं कि चुनाव के बाद त्रिशंकु विधानसभा भी बन जाए तो वे इसे बड़ी गनीमत मानेंगे. और ये तो अभी शुरू के दिन ही हैं. अगर ‘बड़े भाई’, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के प्रति पंजाब प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू के प्यार ने आगामी हफ्तों में और ज़ोर पकड़ लिया तो यह गनीमत भी नामुमकिन हो जाएगी.

लेकिन ऐसा लगता है कि गांधी परिवार ने पंजाब की राजनीतिक स्थिति का काफी अलग आकलन कर रखा है. उसे अमरिंदर सिंह सरकार को अस्थिर करने में ही राजनीतिक बुद्धिमत्ता नज़र आई होगी. इसलिए, रविवार को उसने राजस्थान में जो प्रक्रिया शुरू की उसने पंजाब जैसे संकट के लिए जमीन तैयार कर दी. अब अगले कुछ महीनों में इस मरु प्रदेश में शक्ति प्रदर्शन का खेल हो सकता है.


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मंत्रिमंडल में फेरबदल : नये संकट के बीज

रविवार को अशोक गहलोत सरकार के मंत्रिमंडल में सचिन पायलट खेमे के पांच नेताओं को शामिल करने से दोनों नेताओं के रिश्तों में जमी बर्फ शायद ही पिघलने वाली है. उलटे यह बर्फ और जम जाएगी. इस समाधान से दोनों ही खुश नहीं होने वाले हैं.

पायलट को गहलोत के खिलाफ बगावत करने में उनका साथ देने वाले 18 विधायकों में से पांच को मंत्री पद के रूप में भले ही पुरस्कार मिला हो, और कुछ बागियों को विभिन्न बोर्डों तथा निगमों में जगह दी जा सकती है. लेकिन खुद पायलट को क्या मिला? सिर्फ भविष्य में पुरस्कृत किए जाने का आश्वासन?

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मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया भी वर्षों तक ऐसे आश्वासन के भरोसे इंतजार करते-करते धीरज खो बैठे. पायलट में भी असीम धैर्य शायद ही होगा. वे उप-मुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे. मुख्यमंत्री की गद्दी के लिए उन्होंने सब कुछ गंवा देने का जोखिम भी उठाया. आज जो स्थिति है उसमें वे राजस्थान छोड़कर कांग्रेस महासचिव और कुछ दूसरे प्रदेशों के प्रभारी बनना शायद ही चाहेंगे. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, आलाकमान चाहता है कि फिलहाल वे यही करें, और मुख्यमंत्री वाले मामले पर अगले साल विचार किया जाएगा. पायलट फिलहाल तो राजी हो गए हैं मगर वे राज्य के मुख्यमंत्री को परेशान करते रह सकते हैं और गांधी परिवार पर उन्हें उनका देय देने का ‘वादा पूरा करने’ का दबाव डालते रह सकते हैं. इसलिए, आगामी विधानसभा चुनावों के खत्म होने के बाद राजस्थान में फिर सियासी नौटंकी देखने के लिए तैयार रहिए.

गांधी परिवार का फॉर्मूला गहलोत के लिए भी तकलीफदेह है. अपने मंत्री पद के लिए मुख्यमंत्री के मुख्य प्रतिद्वंद्वी का आभारी होने और उनके प्रति वफादारी रखने वाले पांच मंत्री गहलोत के लिए गड्ढे खोदते रह सकते हैं. सो, गहलोत जल्द ही यह महसूस कर सकते हैं कि उनकी हालत तो कैप्टन अमरिंदर सिंह जैसी ही हो गई है, जिन्हें उनके वे मंत्री ही रोज परेशान करते रहते थे और सार्वजनिक रूप से हमले करते रहते थे, जो सिद्धू के साथ हो गए थे. कल्पना कीजिए कि गहलोत को पायलट के साथ जाने वाले और उनके खिलाफ सार्वजनिक तौर पर हमला करने वाले उन दो मंत्रियों को मंत्रिमंडल में वापस लेना पड़ा जिन्हें पिछ्ले साल उन्होंने बरखास्त किया था. ये मंत्री गहलोत की क्या सुनेंगे क्योंकि कुर्सी तो उन्हें उनकी वजह से नहीं मिली है. गांधी परिवार ने राजस्थान की सरकार में सत्ता के दो केंद्र बना दिए हैं.

इसके अलावा, पायलट के वफ़ादारों को जगह देने के लिए गहलोत को मजबूर करके कांग्रेस आलाकमान ने शायद यह संकेत भी दिया है कि उसने गहलोत की विदाई की योजना बना ली है. आगामी हफ्तों और महीनों में कई विधायक और मंत्री जिन्हें उभरता सितारा मानते हैं उन पायलट को सलाम ठोकते नज़र आ सकते हैं.

पंजाब में ठीक यही हुआ था. और इससे किसी का मकसद नहीं पूरा हुआ— न अमरिंदर सिंह का, न सिद्धू का और न ही कांग्रेस पार्टी का.


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गहलोत-पायलट का क्या होगा

पंजाब और राजस्थान की स्थितियों के बीच इस तरह की समानता खोजना ऊपर से तो बात को ज्यादा खींचना ही लग सकता है. आखिर, दोनों के पात्र अलग-अलग चरित्र के हैं. शुरुआत के लिए, राजस्थान में चुनौती पेश करने वाले पायलट को ही लें. वे तो पके हुए राजनीतिक नेता हैं जबकि सिद्धू एक अगंभीर नेता हैं जो क्रिकेट में छक्के लगाने वाले खिलाड़ी की अपनी छवि को राजनीति में भी जीना चाहते हैं. लेकिन भाजपा में वे खुद ही हिट विकेट हो गए; और कांग्रेस में भी वे स्टंप हो जाते अगर 12, तुगलक लेन में उनके प्रति मेहरबान थर्ड अंपायर बैठा न होता. पायलट ने छह साल तक प्रदेश कांग्रेस का नेतृत्व किया और पार्टी को 2018 में यहां सत्ता दिलाने में अहम भूमिका निभाई. पिछले साल 18 कांग्रेसी विधायकों के साथ विद्रोह का झंडा फहराने में उन्होंने भले अधीरता का परिचय दिया, लेकिन वे सबक सीख चुके हैं और अपना समय आने का इंतजार करने को तैयार दिखते हैं.

इसके अलावा, अशोक गहलोत को अमरिंदर सिंह के विपरीत गांधी परिवार का भरोसा हासिल है. अमरिंदर सिंह इस मुगालते में थे कि राजीव गांधी से उनकी दोस्ती हमेशा उनके काम आएगी.

पंजाब और राजस्थान की परिस्थितियों और पात्रों में बेशक कई असमानताएं हैं और इसके साथ यह तथ्य भी जुड़ा है कि राजस्थान वाले आजीवन कांग्रेसी रहे हैं इसलिए गांधी परिवार उनके प्रति ज्यादा सहानुभूतिपूर्ण रुख अपना सकते हैं. लेकिन गांधी परिवार के कथित लक्ष्य— नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन—पर गौर करें तो दोनों राज्यों में समानताएं देखी जा सकती हैं.

पहली बात यह कि अमरिंदर 79 के हैं और सिद्धू 58 के; उधर गहलोत 70 के हैं तो पायलट 44 के. पार्टी के पुराने नेता को जिस अशालीनता के साथ बाहर किया गया, उसे और व्यक्तिगत पसंद और मनमानी की खातिर पार्टी की चुनावी संभावनाओं को अनावश्यक खराब किया गया उसके पीछे के राजनीतिक विवेक—या उसके अभाव—पर ध्यान न दें, तो पंजाब में नेतृत्व में पीढ़ीगत परिवर्तन की पहल पर बहुत लोग सवाल नहीं उठाएंगे. गहलोत गांधी परिवार के वफादार हैं लेकिन वे उन ‘ओल्ड गार्डों’ में शुमार हैं जिन्हें राहुल गांधी दरकिनार करने को काफी तत्पर दिखते हैं.

दूसरे, अमरिंदर की छुट्टी करने के पीछे गांधी भाई-बहन जोड़ी का आकलन इस तथ्य पर आधारित था कि पंजाब में भाजपा-अकाली दल गठजोड़ जबकि हाशिये पर पहुंच गया है और ‘आप’ बिखरी तथा पतवार विहीन दिख रही है तब ऐसे में कांग्रेस मजबूत नज़र आ रही थी. लेकिन इसके बाद से पंजाब के जमीनी समीकरण बदल गए हैं. लेकिन राजस्थान में विपक्ष, मुख्यतः भाजपा की हालत वैसी ही है जैसी पंजाब में विपक्ष की कुछ सप्ताह पहले थी. पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा आलाकमान में अनबन हो चुकी है और भगवा पार्टी के पास वहां नेतृत्व संभालने के लिए दूसरा कोई व्यापक जनाधार वाला नेता नहीं है.

लेकिन कांग्रेस आलाकमान ने पंजाब की तरह राजस्थान में भी विपक्ष को कमतर आंका तो यह बहुत बड़ी भूल होगी. राजे अगर यह मान लेती हैं कि उनके लिए जो भीड़ इकट्ठा होती थी उसमें सारे उनके समर्थक ही थे तो यह उनकी भूल होगी. वे बेशक जननेता हैं, लेकिन भैरोंसिंह शेखावत भी जननेता थे. 2003 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने जब शेखावत की जगह राजे को अपने चेहरे के रूप में पेश करने का फैसला किया तो जनता राजे के साथ हो गई. शेखावत असंतुष्ट तो थे मगर उन्होंने बदलाव की लहर को देख लिया था. वे अनिच्छा से ही सही, पार्टी के फैसले के साथ हो गए और अपने दामाद नरपत सिंह राजवी समेत अन्य वफ़ादारों के लिए मंत्रीपद का सौदा करके सुलह कर ली. अब बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि राजे किसके नक्शेकदम पर चलती हैं—कल्याण सिंह या उमा भारती जैसे जननेताओं के जिन्होंने पार्टी छोडने के बाद खुद को राजनीतिक बियाबान में पाया; या कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के नक्शेकदम पर जिन्होंने 2013 के चुनाव में भाजपा को सत्ता से वंचित करने के लिए अपनी पार्टी खड़ी कर ली थी.

पायलट के समर्थकों के एक गुट ने मेरा ध्यान 1993 के विधानसभा चुनाव के— जब शेखावत ने भाजपा को दोबारा बहुमत दिलाया था— बाद शुरू हुए इस चलन की ओर दिलाया कि हर चुनाव में सत्ता परिवर्तन हो जाता रहा है. अब चेहरा बदलने—सचिन पायलट को सामने लाने से क्या 2023 के चुनाव में यह सिलसिला टूटेगा? या 72 की उम्र के पके-पकाए, आजमाए गहलोत ही 2023 में बेहतर दांव साबित होंगे?

गांधी परिवार को इस या उस चेहरे के पक्ष में इन सवालों के जवाब जल्द खोजने होंगे. अंतिम समय तक गहलोत और पायलट को अनिश्चय में रखने कांग्रेस की वही स्थिति हो जाएगी जो पंजाब में हुई है. या शायद गांधी परिवार पंजाब के चुनाव के नतीजों से जवाब पाने का इंतजार करें.

यहां व्यक्त विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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