scorecardresearch
Tuesday, 18 June, 2024
होममत-विमतऋषि सुनक बेहतरीन प्रधानमंत्री हो सकते हैं, बस इमिग्रेशन पर उनका रवैया अलग है

ऋषि सुनक बेहतरीन प्रधानमंत्री हो सकते हैं, बस इमिग्रेशन पर उनका रवैया अलग है

ब्रिटेन में कंजरवेटिव पार्टी के प्रधानमंत्री पद के लिए दो उम्मीदवारों की होड़ आखिरकार चमड़ी के रंग पर आकर ठहर सकती है.

Text Size:

ब्रिटेन में प्रधानमंत्री पद के लिए कंजरवेटिव पार्टी में ऋषि सुनक और लिज ट्रुस सोमवार की रात बीबीसी पर टीवी डिबेट में सीधे टकराए, लेकिन दर्शकों-श्रोताओं का दिल किसने जीता, यह कम से कम तीन वजहों से खास मायने नहीं रखता.

एक, पिछले हफ्ते कंजरवेटिव पार्टी के सदस्यों के बीच यूगोव पोल के मुताबिक, ट्रुस के 62 फीसदी के मुकाबले 38 फीसदी से सुनक को पीछे छोड़ रही हैं. यह अच्छी-खासी बढ़त है, भले 6 सितंबर के पहले और टीवी डिबेट और भाषण वगैरह हों. 6 सितंबर को विजेता का ऐलान होगा.

दूसरे, यह ब्रिटिश कंजरवेटिव पार्टी है और उसके मतदाता टीवी या सोशल मीडिया से प्रभावित होने के बदले द डेली मेल जैसे टेबलॉयड या द टाइम्स जैसे अखबार ज्यादा पढ़ते हैं. इसके विपरीत अमेरिका में टीवी का असर भारी है. आखिरी बात यही सुनी गई कि लिज ट्रुस के ‘हाथ में मेल है….(जो) उनके लिए निर्णायक साबित हो सकता है.’

इसके अलावा, लगता है, कंजरवेटिव वोटर कम तड़क-भड़क वाले नेताओं को पसंद करते हैं. इसलिए सुनक के वायरल लॉन्च वीडियो को तो ‘चालाकी भरा’ और ‘कुछ ज्यादा ही पेशेवर’ की तरह देखा गया, जिसमें वे अपने ‘मूल की कथा’ कहते हैं कि कैसे उनका परिवार पूर्वी अफ्रीका से इंग्लैंड आया. इसके उलट, ट्रुस के अभियान को ‘ज्यादा घरेलू या व्यावहारिक’ माना गया.

ट्रुस की करीबी माने जाने वाली कल्चरल सेक्रेटरी नडीने डोरिस ने इधर सुनक की 3,500 पाउंड के सूट और 450 पाउंड के पारदा लोफर पहनने के लिए नुक्ताचीनी की. उन्होंने कहा, इसके उलट ट्रुस 4.50 पाउंड की कान की बाली पहनकर देश भर में प्रचार कर रही हैं.

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

तीसरे, दोनों के वादों की भी कुछ समीक्षा हो रही है. बेशक, अर्थव्यवस्था फेहरिस्त में सबसे ऊपर है. पूर्व वित्त मंत्री होने के नाते सुनक का मानना है कि मुद्रास्फीति को काबू में रखना बेहद जरूरी है, जबकि ट्रुस का मानना है कि कड़े उपायों की ख्वाहिश को टालना सही है, जिससे कुछ जेब सख्त करनी होती है, क्योंकि पिछले कुछ साल कठिनाइयों में बीते हैं. ब्रेक्सिट पर सुनक कहते हैं कि वे सभी कानूनों और अफसरशाही में सुधार करने के प्रति संकल्पबद्ध हैं. हालांकि 2016 की रायशुमारी में यूरोपीय संघ में रहने के पक्ष में वोट कर चुकीं ट्रुस अब बोरिस जॉनसन की सही उत्तराधिकारी की तरह पेश आ रही हैं.

सुनक के ‘दोहरे मानदंड’

फिर सुनक-ट्रुस के बीच इमिग्रेशन को लेकर करार दुनिया भर में खौफ पैदा कर रहा है. पूर्वी अफ्रीका के मार्फत आए पंजाब के आप्रवासी के पोते सुनक ने एक से एक सनकी विचार आगे किया. एक, आप्रवासियों को होटलों के बदले क्रूज शिप में लाद देना चाहिए. वे और ट्रुस दोनों का मानना है कि आप्रवासियों को 6,500 किमी. दूर रवांडा भेज दिया जाना चाहिए.

सुनक ने एक टीवी इंटरव्यू में कहा, ‘जब मेरे दादा-दादी यहां आए तो इसलिए आए क्योंकि ब्रितानी सरकार ने उन्हें यहां बुलाने का फैसला किया था.’ उन्होंने जोर दिया कि ब्रिटेन को अपनी सीमाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए. सुनक ने कहा, रवांडा के अलावा वे दूसरे देशों से भी ‘माइग्रेशन साझेदारी’ को आगे बढ़ाएंगे. ट्रुस ने इमिग्रेशन सुधार के मामले में मानवाधिकारों पर यूरोपीय दस्तूर के आगे न ‘झुकने’ का वादा किया.

तो, इसे झेलिए. पिछले हफ्ते तक सुनक और ट्रुस के बीच भारी फर्क की वजह यह है कि ब्रिटेन शायद किसी गैर-गोरे प्रधानमंत्री के लिए तैयार नहीं है. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सुनक कितने तीक्ष्ण बुद्धि या तर्कसंगत या मेहनती हैं; फिलहाल लोग एकदम नए ढंग से सोचने की काबिलियत के लिए वोट नहीं कर रहे हैं, जैसा कोविड के वक्त उन्होंने कर दिया था. तब वे ऐसी योजनाएं ले आए, जिससे लोगों की नौकरी-रोजगार न छूटे. अलबत्ता खजाने से कुछ ज्यादा खर्च करना पड़ा था.

इस वजह से भी सुनक के इमिग्रेशन सुधार पर कट्टर विचारों से झटका लगा है. तो, क्या वे मोटे तौर पर गोरों से भरी कंजरवेटिव पार्टी में कुछ ज्यादा ही वफादारी दिखाने की कोशिश कर रहे हैं? उन्हें संदेह का लाभ दें तो सुनक शायद देश के शरणार्थी व्यवस्था पर भारी खर्च को घटाना चाहते हैं. फिलहाल बेघर आप्रवासियों के होटल में रखने पर सालाना 1.5 अरब पाउंड या हर रोज 47 लाख पाउंड खर्च होता है, क्योंकि आप्रवासियों की आमद 10 साल में सबसे अधिक है. सुनक कहते हैं, ब्रिटेन अब और यह नहीं झेल सकता और उसे अपनी सीमाओं पर नियंत्रण रखना होगा.

विदेश मंत्री लिज ट्रुस बेहतर जानती हैं, इसलिए फिलहाल वे कई मामलों में मुंह सिए रहती हैं. आप्रवासियों को क्रूज शिप पर लाद देने के सुनक के विचार पर ट्रुस ने कुछ कहने से इनकार कर दिया, न ही उन्होंने आप्रवासियों को जबरन रवांडा के विमान पर चढ़ा देने और उसके खर्च पर कोई टिप्पणी की.

तो, पहली बार रवांडा की योजना किस दिमाग की उपज थी? भारतीय मूल की एक और शख्स, गृह मंत्री प्रीति पटेल की दलील थी कि लोगों को ब्रिटेन में आने देने से सस्ता यह पड़ेगा कि किगाली की जहाज पर बैठा दिया जाए.


यह भी पढ़ें: पैगंबर के खिलाफ BJP नेताओं की टिप्पणी पर बांग्लादेश ने इस कदर चुप्पी क्यों साध रखी है


क्रूरता और बदलाव की काबिलियत

वैसे, हाल के हफ्तों में सुनक ने अपनी पत्नी अक्षता मूर्ति के टैक्स विवाद को काफी ढंग से सुलझाया कि उन्हें अपने पिता इंफोसिस के संस्थापक एन.आर. नारायणमूर्ति से हासिल संपत्ति पर टैक्स देना चाहिए, जबकि वे अभी ब्रिटेन की नागरिक नहीं हैं.

हालांकि, आज, ब्रिटेन कुछ हद तक ऋषि सुनक के इमिग्रेशन पर पाखंड से भौचक है, आखिर खुद व्यवस्था का लाभ उठाने वाला दूसरों को उससे क्यों रोकना चाहता है? शायद इसी वजह से लिज ट्रुस रेस में आगे हैं. स्वाभाविक बढ़त दिलाने वाली अपनी चमड़ी के रंग के अलावा कम से कम फिलहाल उन्होंने ऋषि सुनक जैसी क्रूरता का परिचय नहीं दिया है.

सुनक में बराक ओबामा बनने की काबिलियत थी, चाहे वे रेस हार ही क्यों न जाते. वे दुनिया को दिखा सकते थे कि कभी उनके पुरखों के देश भारत पर राज करने वाले ब्रिटेन में बदलाव की अनोखी काबिलियत है, और कि वे और हजारों ऐसे ब्रिटिश नागरिक इस बदलाव की जिंदा मिसाल हैं, जिनके परिजन कभी दुनिया भर के उपनिवेशों में ब्रितानी प्रजा थे.

इसके बदले, सुनक इतनी तेजी से उभरे और सूर्य के इतने करीब पहुंच गए कि वे यही भुला बैठे कि कहां से आए हैं. वे कहते हैं कि वे हिंदू हैं, बतौर सांसद उन्होंने भगवद् गीता पर हाथ रखकर शपथ ली और जनेऊ धारण करते हैं.

शायद सुनक को इस पहले टीवी डिबेट के बाद भगवत गीता और शेक्सपियर को भी ज्यादा ध्यान से पढ़ना चाहिए. गीता उन्हें बताएगी कि अपने ‘धर्म’ का पालन करो, यानी लोगों के लिए सही करो, और शेक्सपियर उनमें करुणा भर देते. लेकिन इमिग्रेशन सुधार पर उनके विचारों का कुछ भी लेना देना है तो वे दोनों की नैतिक शिक्षा को समझने में शायद नाकाम रहते.

(ज्योति मल्होत्रा ​​दिप्रिंट की सीनियर कंसल्टिंग एडिटर हैं. वह @jomalhotra पर ट्वीट करती हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)

share & View comments