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Saturday, 25 May, 2024
होममत-विमतआखिर क्यों आज के भारत में कांशीराम के राजनीतिक रणनीति की जरूरत है

आखिर क्यों आज के भारत में कांशीराम के राजनीतिक रणनीति की जरूरत है

कांशीराम ने जनता की ज्वलंत समस्याओं पर प्रकाश डालने के लिए जन संसद की अवधारणा पर बल दिया था और तमाम जन संसद आयोजित भी कराया था.

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आजाद भारत में कांशीराम ने जिस रणनीतिक सूझबूझ और मेहनत की बदौलत दलितों और वंचितों में आत्म-सम्मान, स्वाभिमान और मानवीय गरिमा की भावना को संचार करते हुए उनके लिए देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी खड़ी किया और उसे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक सत्ता दिलायी, ऐसा उदाहरण दुनियाभर ख़ासकर द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आज़ाद होने वाले देशों में कम ही मिलता है. विदित हो कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद आज़ाद हुए ज़्यादातर देश सत्तर के दसक तक आते-आते सामाजिक अराजकता का शिकार होते चले गए, क्योंकि वहां की वंचित जनता ने सेना, धार्मिक नेताओं या फिर कम्युनिस्ट नेताओं के साथ मिलकर लोकतंत्र को उखाड़ फेंका.

आपातकाल को छोड़ दिया जाए हो भारत इस तरह के तख्तापलट से दूर रहा जबकि यहां भी हथियारबंद नक्सलवाड़ी और माओवादी आंदोलन साथ के दसक में ही शुरू हो चुका था. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में शामिल होकर धार्मिक कट्टरपंथ भी जनता में अपनी पहुँच बढ़ाते जा रहा था. इन सबके बावजूद भारत में दलितों एवं वंचितों ने अपनी समस्या के समाधान के लिए बुलेट की जगह बैलेट का रास्ता चुना, जोकि भारत में लोकतंत्र की सफलता के पीछे का एक बड़ा कारण रहा है.

इस सबके पीछे अगर कोई नेता प्रमुख रूप से ज़िम्मेदार है तो वह हैं कांशीराम जिन्होंने दलितों और वंचितों को बुलेट की बजाय बैलेट रास्ता चुनने के तैयार किया. हालांकि, वह कहते थे कि अन्याय से निपटने के लिए दलितों एवं वंचितों को तैयारी बुलेट की भी रखनी चाहिए.

इस वर्ष कांशीराम के परिनिर्वाण के 14 वर्ष हो गए हैं, और हाल के वर्षों में जिस तरीक़े से देश में दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों के ऊपर अत्याचार बढ़े हैं, ऐसे समय में इस लेख में उनके द्वारा सुझाये गए कुछ अतिमहत्वपूर्ण तरीको का ज़िक्र करने की कोशिश की गयी है, जोकि अन्याय और आत्याचार से लड़ने के लिए दलितों, वंचितों के लिए आज भी प्रसांगिक हो सकते है. इनमें से तामम ऊपाय आज के विपक्ष के लिए भी अति आवश्यक साबित हो सकता है. कांशीराम के द्वारा सुझाए गए ये ऊपाय उनके द्वारा प्रकाशित किए जाने वाले ‘डिप्रेस्ड इंडियनस’ के सम्पादकीय लेखों से लिया गया है जिसका सम्पादन एआर अकेला ने किया है. अकेला ने कांशीराम के सम्पूर्ण भाषणों और लेखों का भी सम्पादन किया है.


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अपनी समाचार सेवाओं की स्थापना

दलित एवं वंचित वर्गों को अपनी समस्या के समाधान के लिए कांशीराम सबसे पहले जिस चीज़ पर ज़ोर देते हैं वह है अपनी समाचार सेवाओं की आवश्यकता. उनके अनुसार मुख्यधारा का मीडिया दलितों, महिलाओं और वंचितों पर होने वाले अत्याचारों को नाममात्र के लिए जगह देता है, इन वर्गों के प्रबुद्धजनों (इलीट) को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त जगह नहीं देता, अपने प्रति होने वाले अन्याय के प्रतिकार में दलितों और वंचितों द्वारा उठाए जाने वाले कदमों को ब्लैक आउट करता है यानी नहीं छापता, और सरकार द्वारा किए जाने वाले झूठे वादों/खोखले नारों को उजागर नहीं करता है.

आज के परिवेश में अगर कांशीराम की वक़त बातों को देखा जाए तो मुख्यधारा का मीडिया ख़ासकर एलेक्ट्रोनिक मीडिया उक्त बातों से और भी आगे निकल चुका है. ऐसा वह सरकारी दबाव, विज्ञापन की बाध्यता, अपनी सामाजिक संरचना आदि की वजह से कर कर रहा है. ऐसे में अगर वंचित वर्गों एवं विपक्ष को अपनी बात जनता के बीच ले जानी है तो उन्हें अपनी समाचार सेवा स्थापित करनी पड़ेगी. कांशीराम के अनुसार अपनी समाचार सेवा सरकारी नीतियों और योजनाओं पर अपनी बात रखने का अवसर प्रदान करती है, एवं बाहर के देशों को भी अपनी स्थिति के बारे में अवगत कराती है.

अपना स्वतंत्र संगठन

कांशीराम वंचित वर्गों को अपनी समस्या के समाधान के लिए अपना संगठन खड़ा करने पर ज़ोर देते हैं, क्योंकि संगठन आत्म-विश्वास जगाता है और मुद्दों को मुख्यधारा में लाता है. अपनी इस विचारधारा के कारण कांशीराम ने खुद अपनी ज़िंदगी में बामसेफ़, डीएसफ़ोर और बीएसपी का गठन किया था. उनके अनुसार संगठन में गतिशीलता बनी रहनी चाहिए, ऐसा करने के लिए समय-समय पर नए नेताओं को चिन्हित करके उन्हें ज़रूरी ट्रेनिंग वग़ैरह दी जाती रहनी चाहिए.


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जन संसद

कांशीराम ने जनता की ज्वलंत समस्याओं पर प्रकाश डालने के लिए जन संसद की अवधारणा पर बल दिया था और तमाम जन संसद आयोजित भी कराया था. यद्दपि जन संसद बिना किसी शक्ति के होती है लेकिन वह शासकों द्वारा दरकिनार कर दिए गए मुद्दों को मुख्यधारा में लाती है. जन संसद उन समुदायों की आवाज़ को भी मुख्यधारा की आवाज़ बनाने में मदद करती है जिन समुदायों का संसद में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं होता. मसलन आज भी भारत की संसद में महिलाओं, धार्मिक अल्पसंख्यकों और ट्रांसजेंडर का प्रतिनिधित्व कम ही है. पार्टी की ह्विप आदि की वजह से भी कुछ सांसद चाहते हुए भी तमाम मुद्दों को नहीं उठा पाते. इन सब कारण से भी जन संसद की अवधारणा आज भी बहुत प्रसांगिक है.

अन्याय मुक्त क्षेत्र की संकल्पना

कांशीराम की रणनीति का एक अहम हिस्सा था ‘अन्याय मुक्त क्षेत्र की संकल्पना’ करना जिसके तहत वह कुछ ज़िलों को अन्याय मुक्त करने की संकल्पना के तहत ग्रहण करवाते थे. उन ज़िलों में होने वाले शोषण एवं अन्याय पर उनके संगठन के लोग यह ख़ास ध्यान रखते थे, और पीड़ितों को ज़रूरी मदद पहुंचाते थे. कांशीराम की यह रणनीति भी आज की तिथि में काफ़ी कारगर है क्योंकि देश के कुछ ज़िलों में दलितों एवं महिलाओं पर अत्याचार बहुत ज्यादा है. जहां ज़्यादा अत्याचार है, वहां के लिए स्पेसल रणनीति बनाने की ज़रूरत होती है. अन्याय मुक्त क्षेत्र की संकल्पना इसी रणनीति की तरफ़ इशारा करती है.

असमानता की जड़ को पहचानना

कांशीराम का मानना था कि भारत में असमनाता की जड़ को पहचाना जाना अति ज़रूरी है और उसे उखाड़ने की कोशिश की जानी चाहिए, वह ब्राह्मणवाद को असमनाता की एक जड़ मानते थे, जिससे उनका मतलब जन्मजात श्रेष्टता की भावना से था. कांशीराम के हिसाब से ब्राह्मणवाद जन्म के आधार पर श्रेष्टता सिर्फ़ मनुष्य में ही नहीं करता बल्कि जानवरों और प्रकृति में भी करता है. इसके लिए वह जानवरों में गाय की श्रेष्ठता और नदियों में गंगा की पवित्रता का उदाहरण देते हैं. कांशीराम के अनुसार समतामूलक समाज बनाने के लिए इस तरह की जन्मजत श्रेष्ठता/पवित्रता की भावना को नष्ट करना होगा.

आज की तिथि में दुनियाभर में जिस तरीक़े से असमानता बढ़ रही है, जिसके फलस्वरूप ग़रीबी, कुपोषण आदि बढ़ रहा है, ऐसे में असमनाता की नई जड़ों को भी पहचानना बहुत ज़रूरी हो चला है.

(लेखक रॉयल हालवे, लंदन विश्वविद्यालय से पीएचडी स्क़ॉलर हैं .ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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