ईरान का युद्ध चौथे हफ्ते में पहुंच गया है. कई जगह यह उम्मीद की जा रही थी कि ईरान अमेरिका और इज़रायल की संयुक्त सैन्य ताकत का सामना नहीं कर पाएगा, भले ही लड़ाई सिर्फ हवाई ताकत तक सीमित हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ईरान ने युद्ध जीता नहीं है, लेकिन वह हारा भी नहीं है और यह भी संभव है कि वह हारे भी न.
ईरान की मजबूती की वजह क्या है? इसके चार कारण हो सकते हैं. इनमें से दो पर काफी चर्चा हुई है और दो ऐसे हैं जो मुख्य बहस का हिस्सा नहीं हैं. हालांकि, विश्लेषण के लिहाज़ से वे बहुत महत्वपूर्ण हैं.
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी पहला कारण है. तेल बाज़ार में 150 डॉलर प्रति बैरल का खतरा मंडरा रहा है. अब तक सबसे ज्यादा कीमत 147.50 डॉलर प्रति बैरल रही है, जो जून 2008 में देखी गई थी. अगर कीमत फिर इतनी बढ़ती है, तो दुनिया की अर्थव्यवस्था में बड़ा असर पड़ेगा.
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ में व्यापारिक जहाजों को रोकने की क्षमता, जो कीमत बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है, ईरान को बहुत बड़ी ताकत देती है. दुनिया के तेल व्यापार का 20 प्रतिशत और भारत के लगभग आधे तेल आयात स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से होकर गुज़रते हैं. दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत प्राकृतिक गैस निर्यात भी यहीं से जाते हैं. भारत के लिए यह आंकड़े और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं. भारत के आयात किए गए तरलीकृत प्राकृतिक गैस (एलएनजी) का 60 प्रतिशत और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) का लगभग 85-90 प्रतिशत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से आता है.
इसका असर सिर्फ एशिया पर नहीं पड़ता. अमेरिका में लोग पश्चिमी यूरोप के लोगों की तुलना में लगभग दोगुनी दूरी तक गाड़ी चलाते हैं, इसलिए तेल की कीमतें वहां के घरों के बजट पर बड़ा असर डालती हैं. कुछ ही महीनों में मिड-टर्म चुनाव होने वाले हैं. बहुत ज्यादा तेल कीमतों का जोखिम कोई भी अमेरिकी सरकार नहीं लेना चाहती. यही कारण है कि अमेरिका ने अस्थायी रूप से रूसी तेल पर लगे प्रतिबंध हटाए हैं और सबसे विरोधाभासी बात यह है कि ईरानी तेल पर भी कुछ राहत दी है.
‘कमजोरों के हथियार’
ईरान की मजबूती का दूसरा कारण हथियार हैं. जैसा मैंने अपने पिछले लेख में लिखा था, ड्रोन ने आधुनिक युद्ध की प्रकृति बदल दी है. रूस-यूक्रेन युद्ध इस बदलाव का पहला उदाहरण था. ड्रोन पर काफी निर्भर होकर, यूक्रेन रूस जैसी बड़ी सेना का सामना कर सका, और चार साल बाद भी वह हारा नहीं है. ईरान भी कुछ ऐसा ही दिखा रहा है.
विकास के क्षेत्र से एक विचार लेकर उसे युद्ध पर लागू किया जा सकता है. ड्रोन ‘कमजोरों के हथियार’ हैं. यह विचार येल यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जेम्स स्कॉट ने दिया था, जो फार्मिंग पर अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे. इस विचार का मतलब यह था कि छोटे किसान कभी-कभी बड़े जमींदारों की ताकत को कमजोर कर देते हैं. वे बड़े स्तर पर खुलकर विरोध करने के बजाय छोटे-छोटे तरीकों से विरोध करते थे. बड़े विरोध को आसानी से पहचान कर दबाया जा सकता था, लेकिन छोटे-छोटे विरोध को पकड़ना मुश्किल होता था.
एक ड्रोन की कीमत लगभग 15,000 से 30,000 डॉलर के बीच होती है. इसके मुकाबले, उन्हें रोकने वाली मिसाइल की कीमत 20 लाख से 40 लाख डॉलर तक होती है. मिसाइल का उत्पादन उसके आकार और दिखने की वजह से आसानी से रोका जा सकता है, जैसा कि शायद अब ईरान के मामले में हो रहा है, लेकिन ड्रोन का उत्पादन आसानी से छिपाकर जारी रखा जा सकता है. ड्रोन का इस्तेमाल करके ईरान ने खाड़ी क्षेत्र के देशों को निशाना बनाया है. अगर हमले बढ़ते हैं, तो ऊर्जा की कीमतें और बढ़ेंगी. ड्रोन ‘दुबई की छवि’ को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं, जिसने अरब दुनिया में एक नया रास्ता दिखाया है, जहां प्रवासियों को जगह मिली, सामाजिक समावेशन और शांति को बढ़ावा मिला, और दुनिया भर के निवेशक और कारोबारी आकर्षित हुए.
तीसरा कारण, जिसकी वजह से ईरान अभी तक नहीं हारा, एक क्रांतिकारी शासन की संगठनात्मक व्यवस्था से जुड़ा है. 1980 के दशक में, राजनीतिक वैज्ञानिक जीन किर्कपैट्रिक, जो अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन की करीबी सलाहकार थीं, ने तानाशाही और सर्वसत्तावादी व्यवस्था के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर बताया. तानाशाही व्यवस्था सिर्फ राजनीतिक जीवन को नियंत्रित करती है, जबकि सर्वसत्तावादी व्यवस्था राजनीति और समाज दोनों को नियंत्रित करती है और नागरिकों के जीवन के हर क्षेत्र में विरोध को दबा देती है. उन्होंने मिस्र और पाकिस्तान को तानाशाही व्यवस्था कहा, और क्यूबा और सोवियत संघ जैसे देशों को क्रांतिकारी व्यवस्था के उदाहरण के रूप में रखा.
1979 में ईरान में धार्मिक क्रांति हुई और तब से वहां एक क्रांतिकारी व्यवस्था है. समाज पर नियंत्रण और विरोध को दबाने के लिए दो तरह के संगठन बनाए गए: नागरिक और सैन्य. नागरिक संगठन विश्वविद्यालयों, मस्जिदों और बाजारों तक पहुंचे और सरकार के समर्थन वाले विचार फैलाए. सैन्य संगठनों में रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (IRGC) शामिल है, जो सीधे सुप्रीम लीडर को रिपोर्ट करता है. यह नियमित सेना से अलग है और इसमें लगभग 1,50,000 से 1,90,000 सैनिक हैं. इसका मुख्य काम क्रांति की रक्षा करना है. इसके सैन्य हिस्से देश के सभी राज्यों के शहरों और कस्बों में फैले हैं. इसके अलावा, आधे मिलियन से ज्यादा स्वयंसेवकों को जोड़कर बनाया गया बसीज, IRGC का अर्धसैनिक (पैरामिलिट्री) हिस्सा है. यह विरोध को कठोर तरीके से दबाने के लिए जाना जाता है.
धार्मिक व्यवस्था से जुड़े इस बड़े क्रांतिकारी संगठन ने दो चीजें सुनिश्चित करने की कोशिश की है. पहला, अगर मौजूदा नेता मारे जाते हैं, तो नए नेता सामने आकर व्यवस्था को संभाल लेंगे. दूसरा, अगर सरकार के खिलाफ आंदोलन उठते हैं, तो उन्हें दबा दिया जाएगा. व्यवस्था खुद कमजोर नहीं पड़ेगी. इस युद्ध में शासन बदलने की कोशिश, ईरान की इस बहुत मजबूत संगठनात्मक व्यवस्था के कारण कमजोर पड़ती दिख रही है.
शहादत का जश्न
ईरान के अभी तक नहीं हारने का चौथा कारण शिया मत (Shi’ism) के खास चरित्र से जुड़ा है, जो ईरान का आधिकारिक धर्म है. धार्मिक विद्वानों और जानकारों के बीच यह अच्छी तरह जाना जाता है कि शहादत (मार्टरडम) शिया मत का एक बुनियादी विचार है. अली, जो शिया मत के संस्थापक और पैगंबर मोहम्मद के दामाद थे और हुसैन, उनके छोटे बेटे, दोनों शहीद हुए थे.
कर्बला की लड़ाई शिया इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जाती है, जो समुदाय की सामूहिक यादों में दर्ज है. 680 ईस्वी में, हुसैन को उमय्यद खलीफा यज़ीद की बड़ी सेना ने घेरकर हमला किया. कर्बला में हुसैन ने अपने भाइयों और बच्चों सहित अपने कई साथियों के साथ शहादत स्वीकार की, लेकिन अन्यायपूर्ण शासक के प्रति वफादारी की कसम खाने से इनकार कर दिया.
मुहर्रम के महीने में बड़े जुलूस और मर्सिये (दुख भरी कविताएं, जो बड़े जमावड़ों और लाखों घरों में पढ़ी जाती हैं) शहादत की भावना को याद करते हैं. लखनऊ, जो शियाओं का एक महत्वपूर्ण शहर है, वहां मैंने खुद बड़े जमावड़ों में मर्सिये पढ़े जाते देखे हैं. मुहर्रम का मुख्य हिस्सा हुसैन की मौत की दस दिन तक सार्वजनिक याद है. हर साल कर्बला की लड़ाई को लोगों की भागीदारी के साथ दोबारा याद किया जाता है, जिससे यह एक जीवित परंपरा बन गई है. इसके कारण शहादत की भावना, या जैसा एक शिया दोस्त कहता है “जिद भरी मौत को महिमा देना”, लाखों शियाओं के मन में गहराई से बस गई है.
यह बात उन लोगों पर भी लागू होती है जो धार्मिक नहीं रहे, लेकिन आध्यात्मिक संस्कृति के रूप में शिया परंपरा को छोड़ना उनके लिए मुश्किल होता है. उदाहरण के लिए, फिल्म हकीकत (1964) में कैफी आज़मी, जो शिया परिवार में पैदा हुए थे लेकिन बाद में मार्क्सवाद की ओर चले गए और भारतीय सिनेमा के बड़े कवि बने, उन्होंने भारत-चीन युद्ध में शहीद होने वाले सैनिकों के लिए शिया इतिहास से एक प्रतीक लिया:
“जिंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर, जान देने की रुत रोज आती नहीं.”
आज़मी की कविताओं में शिया प्रतीक बार-बार दिखाई देते हैं, जो धर्म से बाहर के उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होते हैं. आज़मी इसका उदाहरण हैं कि शिया संस्कृति कितनी गहराई से जुड़ जाती है, भले ही आस्था बदल जाए.
शिया मत में शहादत को महत्व देने का इस युद्ध पर साफ असर पड़ता है. शिया समाज में दर्द और कष्ट सहने की क्षमता आम तौर पर बहुत ज्यादा होती है. नेताओं की हत्या और भारी बमबारी, चाहे कितनी भी ज्यादा क्यों न हो, जरूरी नहीं कि हार और आत्मसमर्पण करवा दे. इसके लिए लंबा और बहुत कठिन युद्ध लड़ना पड़ सकता है, लेकिन इससे ऊर्जा की कीमतों में भारी बढ़ोतरी, दुनिया की अर्थव्यवस्था को झटका, और खाड़ी देशों के विकास मॉडल—खासकर दुबई और यूएई पर असर पड़ सकता है. इसलिए लंबा युद्ध होने की संभावना कम मानी जा रही है.
सही हो या गलत, ईरान वेनेजुएला नहीं है.
आशुतोष वार्ष्णेय इंटरनेशनल स्टडीज़ और सोशल साइंसेज़ के सोल गोल्डमैन प्रोफेसर और ब्राउन यूनिवर्सिटी में पॉलिटिकल साइंस के प्रोफेसर हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.
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