Thursday, 7 July, 2022
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ABVP की JNU शाखा आखिर क्यों RSS की छात्र इकाई का भयानक चेहरा पेश करती है

अब सार्वजनिक बहसों में दो परस्पर विरोधी, भ्रामक तर्कों का बोलबाला रहने वाला है. एक यह कि जेएनयू हिंदू विरोधी, ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ का अड्डा बन गया है. दूसरा यह कि आरएसएस हमारे खानपान पर भी रोक लगाता है

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दिल्ली का जेएनयू यानी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय फिर से खबरों में है— इस बार हॉस्टल के मेस में खानपान के मेनू को लेकर हिंसक मारपीट के लिए. वामपंथी रुझान वाले छात्रों का कहना है कि अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के कार्यकर्ता रामनवमी के दिन चिकन बनाने से रोक रहे थे, तो एबीवीपी का कहना था कि वामपंथी छात्र उन्हें पूजा करने से रोक रहे थे. सो, आगामी दिनों और हफ्तों में जेएनयू पर तीखी बहस के लिए तैयार हो जाइए. इसमें धुआं भी उठेगा और आईने भी दिखाए जाएंगे. लेकिन अपनी दो कौड़ी की बातें करने से पहले कुछ बातें साफ कर दूं.

पहली बात यह कि मैं जेएनयू का छात्र रहा हूं. लेकिन मैं खुद को किस विचारधारा का मानूं, इसी उधेड़बुन में रहता हूं. मैं शुरू में मुक्त विचार का था और फिर कई विचारधाराओं से उलझते हुए वापस वहीं पहुंच गया जहां से शुरुआत की थी.

दूसरे, मैंने अपने उस सहपाठी को वोट दिया था जो एबीवीपी उम्मीदवार के रूप में पार्षद पद का चुनाव लड़ रहा था. वह घोर मांसाहारी था और कभी कोई पूजा नहीं करता था. वह चुनाव जीत गया था. लेकिन मुझे आश्चर्य होता है कि जेएनयू के छात्रों ने हॉस्टल में हवन कब से शुरू कर दिया.

तीसरी बात, नवरात्रि में जब मैं उपवास पर रहता हूं, पूर्णतः शाकाहारी रहता हूं. लेकिन इस बार नवरात्रि में मैंने खूब मांसाहार किया, क्योंकि मैं उपवास पर नहीं था.

मैं कहना यह चाहता हूं कि जिस विश्वविद्यालय जेएनयू में रविवार को जो घटना हुई उसके कारण उसके पूर्व छात्र आज खुद को उस विश्वविद्यालय से जोड़ पाने में कठिनाई महसूस कर रहे होंगे. हमारे समय में और उससे पहले, डाइनिंग टेबल वामपंथी, दक्षिणपंथी और मध्यमार्गी संगठनों के पर्चों से भरे होते थे. हम उन पर्चों में जो छपा होता था उसका मज़ाक उड़ाया करते थे जबकि उन संगठनों के सदस्य भी उतने ही मज़ाकिया ढंग से जवाब दिया करते थे. खानपान की पसंद को लेकर जेएनयू कैंपस में खूनखराबा हो, यह पचने वाली बात नहीं है.

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जेएनयू को लेकर विरोधाभासी बातें

आगामी दिनों में सार्वजनिक बहसों में दो परस्पर विरोधी तर्कों का बोलबाला रहने वाला है. पहला यह कि जेएनयू राष्ट्र विरोधी, हिंदू विरोधी, ‘टुकड़े टुकड़े गैंग’ का अड्डा बन गया है. यह तर्क पेश करने वाले लोग कन्हैया कुमार, उमर खालिद, आदि पर 2016 में लगाए गए देशद्रोह के आरोपों का हवाला देंगे. दूसरा यह कि एबीवीपी तो आरएसएस से जुड़ा है जिसकी विचारधारा विभाजनकारी और असहिष्णु है, चाहे यह आस्था का अधिकार हो, पहनावे या खानपान का मामला हो.
ये दोनों तर्क पूर्वाग्रहग्रस्त और मुख्यतः निराधार हैं. लेकिन ये तर्क पेश करने वाले जिस दावे और ज़ोर का प्रदर्शन करते हैं वह आश्चर्यजनक है.

2018 के शुरू में, जब भीमा-कोरेगांव की हिंसा के खिलाफ विरोध बढ़ता जा रहा था तब मैंने एक महत्वपूर्ण सरकारी अधिकारी से अनौपचारिक बातचीत की थी. मैंने उनसे पूछ था कि वे इस घटना और इसके बाद जो कुछ हो रहा है उसके बारे में क्या सोचते हैं? उन्होंने जवाब में यह सवाल किया था, ‘आपको पता है, कौन इसके पीछे है?’ मैं सिर हिला रहा था कि उन्होंने कहा, ‘इसके पीछे सारे जेएनयू वाले हैं.’ मैं इतना स्तब्ध रह गया था कि यह भी नहीं पूछ पाया कि वे ऐसा कैसे कह रहे हैं. महाराष्ट्र पुलिस ने इसे ‘माओवादी साजिश’ कहा था. लेकिन एक जिम्मेदार सरकारी अधिकार इसमें ‘जेएनयू वालों’ को ला रहे थे.

ऊपर से नीचे तक पहुंचने वाले सिद्धांत पर कई लोग संदेह कर सकते हैं लेकिन प्रोपेगंडा की राजनीति में तो यह काम करता ही है. दिल्ली में उक्त बातचीत के कुछ सप्ताह बाद मैं कर्नाटक विधानसभा चुनाव को कवर करने चला गया था. वहां उडुपी में एक रिटायर्ड बैंकर से बात कर रहा था. वे काफी जानकार व्यक्ति थे, और राजनीति में भी काफी दिलचस्पी रखते थे. मैं इस बातचीत के मजे ले रहा था. अचानक वे मुझसे पूछ बैठे कि मैंने किस विश्वविद्यालय से पढ़ाई की. जैसे ही मैंने जेएनयू का नाम लिया, उन्होंने मेरा विजिटिंग कार्ड मुझे लौटाते हुए कहा, ‘मैं किसी जेनेयू वाले से बात नहीं कर सकता.’ और वे उठ खड़े हो गए. मैंने पूछा, ‘लेकिन क्या हो गया?’ वे कोई जवाब देने के लिए नहीं रुके. उनके शब्द आज भी मेरे कानों में गूंजते हैं.

जेएनयू में ऐसा क्या है जो लोग नाराज हो जाते हैं? उसकी निंदा करने वाले जो कुछ कहते हैं उस पर सचमुच यकीन भी करते हैं? या जेएनयू की शैक्षिक संस्कृति में तर्कवादी, सवाल उठाने वाला रवैया उन्हें परेशान करता है? या कन्हैया कुमार अथवा उमर खालिद के कथित कामों ने इस विश्वविद्यालय के प्रति नफरत का बहाना बना दिया है?

नरेंद्र मोदी की सरकार की रैंकिंग के मुताबिक जेएनयू भारत का दूसरा सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालय है. उनकी टीम में जेएनयू वाले भरे हुए हैं, जिनमें दो तो सुरक्षा मामले की उनकी कैबिनेट कमिटी के सदस्य हैं—विदेश मंत्री एस. जयशंकर और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण. जेएनयू के निंदकों को चुप कराने के लिए यही काफी होना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ है.


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मांसाहार आरएसएस के एजेंडे में नहीं है

अब हम दूसरे तर्क पर विचार करें, जो विपक्षी खेमे से दिया जा सकता है. जेनयू में एबीवीपी के मुहिम को उसके मातृ संगठन आरएसएस से जोड़ सकते हैं और आरोप लगा सकते हैं कि वह हमारे खानपान पर भी अपना एजेंडा थोप रहा है. यह तर्क काफी भ्रामक है.

1960 के दशक में, जब उप-राष्ट्रपति वेंकैया नायडु कॉलेज में पढ़ रहे थे तब उनके एक परिचित ने उनसे आरएसएस में शामिल होने का सुझाव दिया था. नायडु हिचक रहे थे क्योंकि वह यह सोच रहे थे कि संघ उन्हें मांसाहार बंद करने के लिए कहेगा. उन्हें मांसाहार इतना पसंद था कि वे किसी ऊंचे लक्ष्य के लिए इसे छोड़ने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे. उनके उस परिचित ने उन्हें संघ के एक पदाधिकारी से मिलाया, जिसने उन्हें बताया कि ‘परिवार’ किसी के खानपान की आदतों में हस्तक्षेप नहीं करता.

दशकों बाद, नायडु यह कहानी दिल्ली में अपने मेहमानों को आंध्र प्रदेश के लज़ीज़ नॉन-वेज व्यंजन परोसते हुए बड़े प्यार से सुनाया करते. मोदी और अमित शाह निरामिष हैं लेकिन उनके कई मंत्री, भाजपा के कई सांसद तथा नेता पक्के मांसाहारी हैं. इसी तरह, आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत और वरिष्ठ पदाधिकारी किसी आदेश के कारण नहीं बल्कि अपनी पसंद से शाकाहारी हैं लेकिन स्वयंसेवकों को जहां मिले वहां मुर्गा और मांस खाने की पूरी छूट है.

किसे दोष दें

तो, जेएनयू में रविवार को जो हिंसक झड़प हुई उसका क्या कारण है? ऐसी कोई योजना या साजिश नहीं है. जेएनयू के पूर्व कुलपति एम. जगदीश कुमार, जिनहन हाल में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया, और दिल्ली पुलिस को इसका श्रेय दिया जा सकता है. कुमार ने कुलपति पद पर अपनी नियुक्ति को राजनीतिक और सैद्धांतिक उत्तरदायित्व मान लिया, जबकि दिल्ली पुलिस ने दिखा दिया कि उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी विश्वविद्यालय में बाहर के कुछ राजनीतिक किस्म के तत्व लाठी-डंडा लेकर घुस जाएं और छात्रों की पिटाई करके बेखौफ निकल जाएं.

अगर उन हमलावरों को छूट दी जाती है, और प्रमोद मुथालिक बजरंग मुनि जैसे लोग लोकप्रिय होने लगें तो एबीवीपी वालों को भी जगह क्यों नहीं मिलेगी? लेकिन आरएसएस को इस बात का एहसास एबीवीपी को बजरंग दल में बदलना उसके लिए उलटा पड़ सकता है. धर्म 21वीं सदी के युवाओं के लिए अफीम का काम नहीं कर सकता. पिछली पीढ़ियों के विपरीत, डिजिटल क्रांति के कारण ये युवा बाहर की दुनिया से जुड़ गए हैं और अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अवसरों की तलाश में हैं. इसीलिए वे मोदी के जादू में गिरफ्तार हुए. जो भी संगठन उन्हें उक्त अफीम का चस्का लगाने की कोशिश करेगा वह उन्हें आज न कल अपने से अलग-थलग करने का खतरा मोल लेगा. एबीवीपी की जेएनयू शाखा आरएसएस की छात्र इकाई का जोरदार विज्ञापन नजर आती है.

(इस लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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