scorecardresearch
Tuesday, 22 September, 2026
होममत-विमतभारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए अब सिर्फ कूटनीति से काम क्यों नहीं चलेगा

भारत-बांग्लादेश संबंधों के लिए अब सिर्फ कूटनीति से काम क्यों नहीं चलेगा

भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नज़र रखने वालों के लिए जहां लोगों के बीच संबंधों में काफी निवेश किया गया है, राजनीतिक समझ में बदलाव एक दुविधा पैदा करता है.

Text Size:

ढाका जल्द ही नई दिल्ली में एक नया राजदूत भेज सकता है. दोनों देशों के बीच कूटनीतिक प्रक्रिया कथित तौर पर चल रही है. संभावित नए राजदूत विदेश सचिव असद आलम सियाम बताए जा रहे हैं, जो अक्टूबर में जिम्मेदारी संभाल सकते हैं. हालांकि, भारत ने अभी तक उनकी नियुक्ति को मंजूरी नहीं दी है.

यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब दोनों पक्ष बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की भारत की पहली यात्रा को लेकर फिर से बातचीत कर रहे हैं. यह एक बड़ा कूटनीतिक कार्यक्रम होगा, जिसकी अगुवाई नया राजदूत कर सकता है.

इस नए राजदूत के आने के साथ मौजूदा हाई कमिश्नर रियाज हमीदुल्लाह का कार्यकाल भी खत्म हो जाएगा. उन्होंने 18 महीने तक बांग्लादेश के राजदूत के रूप में काम किया. यह कार्यकाल छोटा था, लेकिन इसे शायद उनके पद पर रहने का सबसे महत्वपूर्ण समय कहा जा सकता है, क्योंकि वह ऐसे समय नई दिल्ली आए थे जब 2024 के ‘जुलाई विद्रोह’ के बाद दोनों देशों के संबंध तनावपूर्ण थे.

नई दिल्ली में बड़े कूटनीतिक, नीति और मीडिया कार्यक्रमों से लेकर सार्वजनिक मंचों पर भारत-बांग्लादेश से जुड़ी चर्चाओं में आगे की कतार में बैठने तक, हाई कमिश्नर को अक्सर तब गंभीरता से नोट्स लेते देखा गया जब पैनल में शामिल लोग तीखी बहस कर रहे होते थे. किसी भी सार्वजनिक कार्यक्रम के अंत में, जहां हमीदुल्लाह मौजूद होते या बोलते, उनसे कोई सवाल पूछा जा सकता था और वह एक अहम जवाब देते थे: “मैं इस रिश्ते में विश्वास करता हूं.” लेकिन जो दिखता है, वही विश्वास करने का आधार बनता है.

आगे जो लिखा गया है, वह एक बांग्लादेशी राजनयिक के भारत में बिताए 18 महीनों को उस सार्वजनिक रिकॉर्ड के जरिए समझने की कोशिश है, जो वह पीछे छोड़ गए हैं—लेक्चर, रिकॉर्ड किए गए कार्यक्रम, सोशल मीडिया अकाउंट और ऐसे कार्यक्रमों के दौरान हुई कुछ बातचीत. इसका मकसद यह समझना है कि यह रिकॉर्ड ‘रिश्ते में विश्वास करने’ के बारे में क्या बताता है.

कूटनीति की दुविधा

हाई कमिश्नर से यह पूछने से खुद को रोकना मुश्किल था—खासकर उन मौकों पर जब उन्होंने दिल्ली में सार्वजनिक कार्यक्रमों में अपनी बात रखी—कि उनके लिए सबसे मुश्किल क्षेत्र कौन से थे: राजनीतिक, आर्थिक या सुरक्षा?

अक्सर वह “कूटनीति की दुविधा” पर बात करते थे. उनका कहना था कि जो क्षेत्र सबसे मुश्किल होना चाहिए था, वही सबसे आसानी से संभाला जा रहा था: सुरक्षा. ‘आपसी हितों’ और ‘एक-दूसरे पर निर्भरता’ के कारण, दोनों देशों के बीच बहुत कुछ जुड़ा हुआ है. साथ ही, दोनों देशों के लोगों के बीच ‘स्वाभाविक’ संबंध भी बने हुए हैं.

हमीदुल्लाह ने नई दिल्ली में एक कार्यक्रम से इतर कहा, “अगर सुरक्षा जिसे सबसे मुश्किल मुद्दा माना जाता है को पूरी गंभीरता और ईमानदारी से संभालना आसान हो जाता है, तो क्या यह पूछना सही नहीं होगा कि राजनीति और अर्थव्यवस्था भी आसान होनी चाहिए? लेकिन मैंने पाया कि ये दोनों ज्यादा मुश्किल थे.”

करीबी पड़ोसियों के साथ संबंधों को संभालने की सामान्य सोच के मुताबिक, सुरक्षा को लेकर भरोसा आर्थिक और राजनीतिक सहयोग के लिए जगह बनाता है. इसका उदाहरण नेपाल में माओवादी विद्रोह (1996-2006) के दौरान देखा गया, जब राजनीतिक स्तर पर मुश्किलों के बावजूद सुरक्षा संबंधों ने स्थिरता बनाए रखने में मदद की. भारत-बांग्लादेश संबंधों में भी ऐसा ही देखने को मिला हो सकता है. हालांकि, सुरक्षा के बड़े दायरे में कुछ मुद्दों पर अभी भी बातचीत चल रही है, खासकर सीमा से जुड़े बुनियादी ढांचे को लेकर.

हालांकि, राजनीतिक और आर्थिक संबंधों पर बात करते हुए, नई दिल्ली में बांग्लादेश के मामलों पर नजर रखने वाले लोग इस बात से सहमत होंगे कि राजनीतिक संबंध अब भी भरोसे की कमी और अलग-अलग तरह की बातों से प्रभावित हैं. ये संबंध अब भी उसी तरह आगे बढ़ रहे हैं.

हाल ही में नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में “मजबूत संबंध बनाना: हितधारक के रूप में लोग” विषय पर एक लेक्चर में हमीदुल्लाह ने भारत-बांग्लादेश संबंधों में लोगों को सबसे अहम बताते हुए भारत के उत्तर-पूर्व की अपनी यात्राओं और वहां मिले लोगों का जिक्र किया. अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने उत्तर-पूर्व भारत की चार बार यात्रा की. आखिरी यात्रा संभवतः गुवाहाटी से अगरतला की ट्रेन से हुई थी. उन्होंने इस यात्रा के बारे में एक्स पर बताया था.

15 घंटे की इस लंबी यात्रा की कुछ झलकियां साझा करते हुए, जबकि विमान से यही सफर सिर्फ 50 मिनट का हो सकता था, उन्होंने लिखा, “यह लंबी यात्रा समय में पीछे जाने जैसी थी. मैं खिड़की से चिपका रहा—झरनों | नदियों | चाय के बागानों | बदलते रंगों वाली हरियाली को देखता रहा. कई जगह मीलों तक इंसानों की मौजूदगी बहुत कम थी. जैव-विविधता अनोखे तरीके से बिना बिगड़े हुए थी.”

यह कहानी उन बातों के समान है जो पश्चिमी यात्री अक्सर अपने संस्मरणों में लिखते हैं, लेकिन पड़ोसी देश के एक व्यक्ति की ऐसी कहानी इसे और व्यक्तिगत बना देती है.

हालांकि, यात्रा लोगों के एक बड़े वर्ग तक प्रभावी कूटनीतिक पहुंच बनाने का एक तरीका भी बन जाती है. इससे दोनों पक्षों के बीच समय के साथ बनी कई ‘पहले से तय धारणाओं’ और झिझक को कम करने में मदद मिल सकती है. ‘भारत की कहानी’ दुनिया के अलग-अलग देशों से भारत आने वाले कई राजनयिकों से जुड़ी है, जो थोड़े समय के लिए भारत आए, लेकिन उनका जुड़ाव लंबे समय तक रहा.

सोशल मीडिया से अलग, जुबीन गर्ग की कहानी उनके भारत से जुड़े अनुभव में प्रमुख रूप से दिखाई देती है. इस मार्च में बांग्लादेश के राष्ट्रीय दिवस समारोह में बोलते हुए उन्होंने गायक को याद किया. उन्होंने कहा, “मुझे अपने एक भारतीय दोस्त की याद आती है, जिनसे मैं पिछले जुलाई में गुवाहाटी में मिला था. जुबीन गर्ग. जुबीन ने मुझसे वादा किया था कि वह इस मंच पर बांग्लादेश और भारत दोनों के राष्ट्रगान गाएंगे. दोनों राष्ट्रगान रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखे हैं. असम, उत्तर-पूर्व और बांग्लादेश के लाखों लोगों के दुख के बीच, वह हमें हमेशा के लिए छोड़ गए.”

गर्ग असम के मशहूर संगीतकार और गायक थे. पिछले साल सितंबर में एक दुखद हादसे के बाद सिंगापुर में उनकी मौत हो गई थी.

जुबीन की तरह, हमीदुल्लाह भारतीय संगीत के दिग्गज भूपेन हजारिका को भी याद करते हैं. वह भी असम से थे और दोनों देशों में उनका संगीत पसंद किया जाता है.

अगर रवींद्रनाथ टैगोर, उत्तम कुमार और भूपेन हजारिका जैसे बड़े नाम भारत और बांग्लादेश की साझा सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा हैं, तो जुबीन जैसे आज के कलाकारों ने भी सीमा के दोनों तरफ इसी तरह के रिश्ते बनाए हैं. हालांकि, सवाल यह है कि क्या यह साझा विरासत आगे भी जारी रहेगी क्योंकि नई दिल्ली और ढाका के राजनीतिक संबंधों को लेकर दोनों पक्षों में अलग-अलग निष्कर्ष निकाले जा रहे हैं.

पीढ़ियों में बदलाव पर ध्यान देने की ज़रूरत

भारत-बांग्लादेश संबंधों पर नज़र रखने वालों के लिए, जहां लोगों के बीच संबंधों में काफी निवेश किया गया है, राजनीतिक समझ में बदलाव एक दुविधा पैदा करता है. राजनीतिक व्यवस्था चाहे कोई भी हो, लोग इस रिश्ते के केंद्र में बने रहते हैं, और यह सिर्फ कहने की बात नहीं है, लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि इस बात को नज़रअंदाज़ किया जाए कि लोगों की समझ पर असर पड़ा है. बातचीत और सोच में बदलाव लंबे समय में धीरे-धीरे और शांत तरीके से हुआ है, लेकिन पिछले दो साल में यह ज्यादा साफ दिखाई दिया है.

इस बीच, इस क्षेत्र में घरेलू स्तर पर हो रहे बदलावों में पीढ़ी का बड़ा असर है, जिसने निश्चित रूप से विदेश नीति को भी प्रभावित किया है. बांग्लादेश से लेकर नेपाल तक, इतिहास अक्सर पीछे चला जाता है और कम इतिहास और वर्तमान पर ज्यादा ध्यान देने वाली नई साझेदारी को प्राथमिकता मिलती है. जनसंख्या में बदलाव को ध्यान में रखें तो वर्तमान और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है.

इसे समझने के लिए, बांग्लादेश में लोगों की औसत उम्र 26 साल है. इस उम्र के लोगों का असर इस साल हुए बांग्लादेश के आम चुनाव में ज्यादा साफ दिखाई दिया. नेपाल में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला. दिलचस्प बात यह है कि पड़ोसी देशों, चाहे नेपाल हो या बांग्लादेश, के नई सोच वाले युवाओं से बातचीत करने पर अक्सर ऐसा लगता है कि वे इतिहास का ‘बोझ’ उठाने के बजाय वर्तमान को ज्यादा महत्व देंगे. विदेश नीति की बातचीत में इस बात को ध्यान में रखना जरूरी हो सकता है. ऐसा होने के बावजूद, इतिहास अब भी इस रिश्ते का अहम हिस्सा है और वर्तमान नए मौके देता है. दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है.

अंत में, बदलाव जरूरी है, लेकिन इसमें अभी समय लग सकता है. इस प्रक्रिया में विदेश नीति पर नजर रखने वाली नई पीढ़ी की भी जरूरत हो सकती है, ताकि यह समझा जा सके कि बदलाव चाहने वाले दूसरी तरफ के युवा विदेश नीति, खासकर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को किस तरह देख रहे हैं. इस बीच, जैसे-जैसे भारत-बांग्लादेश संबंध बातचीत, मतभेद और कूटनीतिक असहमतियों के एक नए दौर में प्रवेश कर रहे हैं, एक राजनयिक का अनुभव हमें याद दिलाता है कि पड़ोसी देशों के बीच संबंध सिर्फ कूटनीतिक माध्यमों के जरिए कायम नहीं रखे जा सकते.

ऋषि गुप्ता ग्लोबल स्ट्रैटेजिक अफेयर्स के एक्सपर्ट हैं.

इस लेख में व्यक्त विचार पूरी तरह लेखक के अपने हैं और किसी भी रूप में उनके वर्तमान या पूर्व संस्थानों के विचारों का प्रतिनिधित्व नहीं करते.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


यह भी पढ़ें: चीन नेपाल में तिब्बत पर एक सेमिनार भी बर्दाश्त नहीं कर सकता, इसकी कीमत काठमांडू को चुकानी पड़ती है


 

share & View comments