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अगर आप जान सकें कि बीजेपी के साथ हिंदीपट्टी में क्या होने वाला है तो फिर समझिए आपने 2019 के चुनावी नतीजों को जान लिया.

‘क्या लगता है आपको, अबकी चुनाव में क्या होने जा रहा है?’ मुझे अंदेशा पहले से ही रहता है कि यही सवाल पूछा जायेगा. लोग उम्मीद करते हैं, मैं अपनी जेब में 2019 के चुनावों की भविष्यवाणी की पुड़िया लेकर चलूं. मैं सवाल को टालने के गरज से कहता हूं: ‘पिछले जन्म में जो करता था वह सब अब मुझे याद नहीं है’.

एक चुस्त जुमला जड़कर सवाल का रुख मोड़ना चाहता हूं: ‘पहले भविष्य बताता था, अब भविष्य बनाता हूं’. लेकिन बात इतने से नहीं बनती. फिर मैं ठंडे मन से ठोस वजह गिनाता हूं: ‘देखिए, दरअसल अब अपने मनपसंद सर्वे के आंकड़ों तक मेरी पहुंच नहीं रही’.

उन्हें बात ठीक लगती है लेकिन वे अपनी टेक पर टिके रहते हैं. फिर मैं एकदम हथियार डाल देने के भाव से कहता हूं: ‘राजनेता होने का एक दुख तो यही है कि लोगों को लगता है फलां बात इन्हें अच्छी लगेगी और उतनी ही बात वे मुझे बताते हैं, सो, जितना आपको मालूम है मैं तो अब उतना भी नहीं जानता.’ सुनकर उनके चेहरे पर नायकीनी के भाव आते हैं और मैं जान जाता हूं कि उन्हें मेरी बात पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं है.

तो फिर आइए, यहां शुरु करें 2019 के चुनावों को लेकर उन सारी बातों का सिलसिला जिन्हें आप जानना तो चाहते हैं लेकिन आपको यह नहीं पता कि उन्हें पूछा किससे जाय. [यहां शुरु में ही आगाह कर दूं कि मैं राजनीतिक कार्यकर्ता हूं, सो तटस्थ होने का मेरा कोई दावा नहीं. हां, जहां तक मुमकिन हो सीधी-सच्ची बात कहने की कोशिश बेशक करुंगा]

सच ये है कि 2019 के चुनावी मुकाबले की बुनियादी बातों को समझने के लिए आपको चुनाव-विश्लेषक यानि सेफोलॉजिस्ट (चाहे इसका अर्थ जो भी हो) का जामा पहनने की ज़रुरत नहीं. आपके पास बस राजनीति की बुनियादी सूझ होनी चाहिए. पिछले चुनावों के नतीजे पर नज़र डालना उपयोगी होगा, खासकर- 2014 के चुनावी नतीजे पर. इसके बाद से जनमत ने क्या रुख अख्तियार किया है इसे जानने के सबसे बेहतर तरीका है इंडिया टुडे की मूड ऑफ नेशन ऋंखला या फिर एबीपी-सीएसडीएस की स्टेट ऑफ नेशन सीरिज़ देखना.

वैसे मुझे देखना हो तो मैं सीएसडीएस-लोकनीति टीम की विस्तृत रिपोर्ट देखता हूं. [एक स्पष्टीकरण: मैं सीएसडीएस-लोकनीति की संस्थापक टोली में शामिल था लेकिन अब इसके सर्वे या रिपोर्ट से मेरा कोई संबंध नहीं है. सीएसडीएस-लोकनीति की टोली से अलग हुए मुझे एक अरसा हुआ और इस दौरान इसके सर्वे और रिपोर्ट में बहुत सुधार हुआ है!].

अगर आप बीते कुछ हफ्तों में आये बदलाव पर नज़र दौड़ाना चाहें तो इंडिया टुडे के पॉलिटिकल स्टॉक एक्सचेंज और एबीपी के लिए किये गये सी-वोटर के ऑल इंडिया पोल को देख सकते हैं. हाल के इन दो सर्वेक्षणों से कई बिन्दुओं पर मेरा मतभेद है लेकिन चौपाल की गप्प-गोष्ठी से चुनाव-सर्वेक्षण हमेशा बेहतर साबित होता है, भले ही उसमें बहत्तर पेंच हों.

या, आप कोई आसान तरीका अपनाना चाहते हैं तो फिर नीचे लिखी बातों के गुणा-भाग पर गौर कीजिए. फर्ज कीजिए कि भारत पांच प्रमुख क्षेत्रों में बंटा है और हर क्षेत्र में चुनावी मुकाबले का रंग और मिजाज़ अलग रहने वाला है.

ग्राफिक: अरिंदम मुखर्जी/दिप्रिंट

दक्षिण [तमिलनाडु, केरल, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक +अंडमान, लक्षद्वीप]: 132 सीट

पश्चिम [गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, दमन ]: 78 सीट

पूर्व [ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, सिक्किम, पूर्वोत्तर]: 88 सीट

उत्तर [पंजाब, जम्मू-कश्मीर]: 19 सीट

हिंदीपट्टी [बिहार, झारखंड, यूपी, उत्तराखंड,मध्यप्रदेश,छत्तीसगढ़,राजस्थान,दिल्ली, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल प्रदेश]: 226 सीट

सौभाग्य कहिए कि इस चुनाव में आपके लिए सभी पांच प्रमुख क्षेत्रों पर नज़र डालना ज़रूरी नहीं. साल 2019 के चुनावी दंगल का फैसला इन पांच क्षेत्रों में से एक में होना है और वह क्षेत्र है हिंदीपट्टी. गणित एकदम सीधा सा है. पूरब में 2014 के मुकाबले बीजेपी की सीटें कुछ बढ़ सकती हैं जबकि पश्चिम में सीटों का हल्का सा नुकसान हो सकता है और यह नुकसान दक्षिण तथा पूर्वोत्तर के छोटे से हलके में कुछ और बढ़ सकता है.

फायदे और नुकसान के गणित में बीजेपी की एक क्षेत्र में बढ़ी हुई सीटें दूसरे क्षेत्र में हुए घाटे की भरपायी कर देंगी और पार्टी की सीटें कमोबेश बराबर रहेंगी या फिर हद से हद बीजेपी की सीटों में हल्की सी कमी आयेगी लेकिन सीटों के मामले में पार्टी को अभी की बढ़त को देखते हुए यह कोई बड़ा नुकसान नहीं कहलाएगा. ऐसे में सारा दारोमदार हिंदीपट्टी पर आ टिकता है. अगर आप जान सकें कि बीजेपी के साथ हिंदीपट्टी में क्या होनेवाला है तो फिर समझिए आपने 2019 के चुनावी नतीजों को जान लिया.

आईए, अब पांच क्षेत्रों को बारी-बारी से देखते हैं.

सिर्फ पूर्वी क्षेत्र (88 सीट) में ही बीजेपी 2014 के मुकाबले सीटों की संख्या बढ़ने की आस लगा सकती है. बीजेपी ने पूरे पूर्वी क्षेत्र में सिर्फ 11 सीटें जीती थीं और इस कारण क्षेत्र में बीजेपी के लिए बढ़वार की संभावना है. सभी भरोसेमंद चुनाव-सर्वेक्षणों का इशारा है कि ओड़िशा में कांग्रेस और पश्चिम बंगाल में वाममोर्चे की चुनावी ज़मीन बीजेपी के पाले में खिसक रही है. कांग्रेस ने पूर्वोत्तर में बढ़ने के लिए पार्टियों को अपने में समेटने और नेताओं को शामिल करने की रणनीति अपनायी थी और इसी रीत पर बीजेपी ने वहां अप्रत्याशित बढ़त बनायी है.

ग्राफिक: अरिंदम मुखर्जी/दिप्रिंट

सवाल बस एक ही है कि बीजेपी अपने अतिरिक्त वोटों को ज़्यादा सीटों में बदल पाती हैं या नहीं. फिलहाल बीजेपी ओड़िशा में तो ऐसा कर पाने में सक्षम है लेकिन पश्चिम बंगाल में नहीं. चुनाव-सर्वेक्षण के आंकड़ों का इशारा है कि बीजेपी बंगाल में सीटों की दौड़ में दूसरे मुकाम पर रहेगी लेकिन ममता बनर्जी के दबदबे को चुनौती दे पाना अभी की हालत में उसके लिए मुमकिन नहीं.

बीजेपी असम में अब और आगे नहीं बढ़ सकती लेकिन पूर्वोत्तर के पहाड़ी राज्यों में बीजेपी कुछ और सीटें जीत सकती है. कुल मिलाकर देखें तो बीजेपी को इस क्षेत्र में वोटों का दूरगामी फायदा होगा और तकरीबन 20 अतिरिक्त सीटें उसकी झोली में जायेंगी.

पश्चिम (78 सीट) में चुनावी मुकाबला पुराने तर्ज पर ही रहेगा और यहां बीजेपी के गढ़ में बस हल्की-फुल्की सेंध लग सकती है. छह सीटों को छोड़ क्षेत्र की सारी सीटें बीजेपी ने अपनी झोली में समेट ली थीं. गुजरात के ग्रामीण इलाकों का असंतोष, महाराष्ट्र में किसानों का आंदोलन, शिवसेना के साथ बीजेपी की खींचतान और गोवा में तिकड़मबाज़ी के बूते बनी सरकार के कारण हवा का रुख बीजेपी के खिलाफ़ है. इसके बावजूद सर्वे का इशारा है कि बीजेपी सीटों के अपने नुकसान पर लगाम लगा सकती है.

ग्राफिक: अरिंदम मुखर्जी/दिप्रिंट

प्रधानमंत्री गुजरात के हैं और पार्टी गुजरात में विधानसभा चुनावों में कुछ सीटों पर हुई हार को अपने पक्ष में पलट सकती है. महाराष्ट्र में, अगर शिवसेना बीजेपी के साथ रहती है तो एनडीए एनसीपी-कांग्रेस गठबंधन को टक्कर देने की हालत में होगा. कुल मिलाकर देखें तो इस क्षेत्र में बीजेपी की हार 15 से 20 सीटों तक सीमित रहेगी.

दक्षिण (132 सीट) में, सिलसिलेवार चुनाव बहुत अहम साबित हो सकते हैं. इन चुनावों से सूबों की चुनावी राजनीति का भविष्य तय हो सकता है. लेकिन ठीक इसी वजह से इलाके में लोकसभा का चुनाव क्षेत्रीय मुद्दों और राजनीति के मुकामी चेहेरों पर केंद्रित रहेगा. मोदी बनाम राहुल के मुकाबले से झलक कुछ ऐसी मिलती है मानों होड़ अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए चल रही हो. दक्षिण में ऐसी होड़ के कोई मायने नहीं. बीजेपी का इस क्षेत्र में ज़्यादा कुछ दांव पर नहीं लगा है. पिछले चुनाव में पार्टी की यहां सिर्फ 22 सीटों पर जीत हुई थी जिसमें 17 सीटें कर्नाटक से मिली थीं. किसी भी कोण से देखें, लगता यही है कि बीजेपी इस क्षेत्र के चुनावी दंगल में पहले की तरह फिसड्डी साबित होगी.

ग्राफिक: अरिंदम मुखर्जी/दिप्रिंट

एआईएडीएमके में सेंधमारी करने की बीजेपी की कोशिश लगता है, नाकाम रही. करुणानिधि और जयललिता की मौत के बाद पहली दफे होने जा रहे इस चुनाव में लगता है डीएमके ने शुरुआत में ही बढ़त बना ली और बीजेपी सकते में रह गई. सबरीमाला में बीजेपी ने बड़ी बेहयाई से सांप्रदायिक भावनाओं को उभारा है और यह केरल में बीजेपी के शुरुआती सफर के लिए मददगार साबित होगा. यह अहम तो है लेकिन इसे सांकेतिक ही माना जायेगा.

आंध्रप्रदेश और तेलंगाना में चुनावी मुकाबले का स्वरूप क्षेत्रीय रहेगा. इसमें बीजेपी या एनडीए के लिए जगह ना के बराबर है क्योंकि नायडू एनडीए से नाता तोड़ चुके हैं. कर्नाटक में हुए हाल के उपचुनाव के नतीजों का इशारा है कि लोग सूबे की सरकार के राजकाज से नाराज़ तो हैं लेकिन कांग्रेस और जेडीएस के बीच जारी बेमेल ब्याह के सहारे इस नाराज़गी को थामा जा सकता है. निष्कर्ष यह कि क्षेत्र में बीजेपी को 5 से 10 सीटों का घाटा उठाना पड़ सकता है.

उत्तर (19 सीट) यों कोई बहुत अलग क्षेत्र नहीं है. बात इतनी भर है कि पंजाब और जम्मू-कश्मीर की राजनीति हिन्दीपट्टी के राज्यों के खांचे में फिट नहीं बैठती. अगर स्थानीय निकायों के चुनाव तथा आम आदमी पार्टी के भीतर हुई उठा-पटक पर नज़र रखें तो कहा जा सकता है कि कांग्रेस को पंजाब में चंद सीटों का फायदा होगा. लेकिन पंजाब के नतीजे या फिर जम्मू-कश्मीर में आये खंडित जनादेश का राष्ट्रीय समीकरण पर शायद ही कोई असर पड़े. भाजपा को यहां पर कुल 3-4 सीटों का नुकसान हो सकता है.

अब हम उन 317 सीटों की चर्चा करते हैं जिनके बारे में हमने बात की. 2014 में भाजपा ने यहां 91 सीटें जीती थीं. इस बार इस गिनती में बदलाव आ सकता है. भाजपा दक्षिण में हार सकती है. खासतौर पर उसे कर्नाटक में नुकसान होगा. कुल मिलाकर हम यह मान लेते हैं कि भाजपा को देश के गैर हिंदी भाषी इलाकों से 80-90 सीट पर जीत मिल सकती है. चलिए अभी हम इसे 91 मान लेते हैं. मतलब कोई फायदा या नुकसान नहीं. आसानी के लिए हम यह भूल जाते हैं कि 2019 में भाजपा गैर हिंदी भाषी इलाकों में कैसा प्रदर्शन करती है. अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि भाजपा का प्रदर्शन हिंदीपट्टी के राज्यों में कैसा होता है.

ग्राफिक: अरिंदम मुखर्जी/दिप्रिंट

हिंदी पट्टी (226 सीट) ही इस बार चुनावी दंगल का असली अखाड़ा है. बीजेपी ने इस क्षेत्र से 192 सीटें (अगर बिहार और यूपी में एनडीए के साथी दलों को जोड़ लें तो सीटों की संख्या 204 हो जाती है) बटोर ली थीं. और, मुश्किल भी यही है. बीजेपी 2014 में जहां पहुंची थी वहां से उसे नीचे ही खिसकना है. सारे संकेत यही कह रहे हैं कि बीजेपी इस पूरे इलाके में सीटों के मामले में 2014 के मुकाबले नीचे खिसकेगी.

एक अपवाद बिहार हो सकता है जहां बीजेपी ने एकजुट और ताकतवर होकर उभरते विपक्ष से मुकाबले के लिए अपने गठबंधन का विस्तार किया है. लेकिन झारखंड में ऐसा मामला नहीं है. चुनाव-सर्वेक्षणों से यह भी पता चलता है कि हरियाणा तथा उत्तराखंड में बीजेपी की सूबाई सरकार बहुत अलोकप्रिय है. पार्टी दिल्ली में भी अपना पुराना शानदार प्रदर्शन दोहरा पाने की हालत में नहीं. होने जा रहे विधानसभा चुनावों को लेकर मतदाताओं के रुझान के बारे में सर्वेक्षणों में अलग-अलग अनुमान लगाये गये हैं लेकिन सभी सर्वेक्षणों से एक सामान्य बात निकलकर आयी है कि बीजेपी का राजस्थान में सूपड़ा साफ हो सकता है और छत्तीसगढ़ तथा मध्यप्रदेश में मुकाबला कांटे का साबित होगा. पुराने रिकॉर्ड बताते हैं कि इन राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणाम का असर लोकसभा चुनावों पर दिखा है. यदि ऐसा होता है तो भाजपा को इन चुनावी राज्यों में 30 सीटों का नुकसान हो सकता है. कुल मिलाकर भाजपा को हिंदीपट्टी के इन राज्यों में 50 सीटों से ज्यादा का नुकसान हो सकता है.

ग्राफिक: अरिंदम मुखर्जी/दिप्रिंटयह उत्तर प्रदेश को छोड़कर है. फिर, इस बात को समझने के लिए कोई बहुत गुणा-भाग करने की ज़रुरत नहीं कि अभी तक मज़बूत जान पड़ता एसपी-बीएसपी का गठबंधन यूपी में 2014 के चुनावी जनादेश को सिरे से पलट सकता है. चुनाव-सर्वेक्षण इशारा कर रहे हैं कि सूबे में योगी सरकार अपनी ऐतिहासिक जीत के दो साल के भीतर ही अपना आकर्षण गंवा रही है.

अभी की हालत में बीजेपी यूपी में 50 सीटें गंवाती जान पड़ रही है. हिंदीपट्टी में बाकी जगहों पर भी उसे 50 सीटों का घाटा होता दिख रहा है. इस क्षेत्र में 100 सीटों के नुकसान के साथ बीजेपी की सीटों का आंकड़ा घटकर 200 पर आ जाता है. मोदी के सत्ता पर फिर से काबिज होने की संभावनाओं पर सीटों की यह कमी सवाल खड़ा करती है.


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लेकिन क्या हिंदीपट्टी में लोकसभा का चुनाव बिल्कुल उसी टेक पर होने जा रहा है जैसा ऊपर बताया गया है? हम इस बारे में निश्चित नहीं हो सकते. यही एकमात्र इलाका है जहां चुनावी-मुकाबले का रुप सिर्फ सूबों तक सिमटकर नहीं रहने वाला. इस क्षेत्र में बीजेपी चुनावी टक्कर को मोदी बनाम राहुल का रुप देकर हवा का रुख मोडने की कोशिश करेगी.

बीजेपी ने अभी राममंदिर विवाद और सांप्रदायिक घृणा को तूल देना शुरु किया है और हिंदीपट्टी में इस दुष्प्रचार के जड़ पकड़ने की आशंका ज़्यादा है. लेकिन साथ में एक बात यह भी है कि मोदी ने जिस विकास का वादा किया था उसके दर्शन इस इलाके में सबसे कम हुए हैं. क्षेत्र में बड़ी तादाद में लोगों ने नौकरियां गंवायी हैं और किसान बदहाल हैं. हिंदीपट्टी में भारत के भविष्य की लड़ाई जवान-किसान बनाम हिंदू-मुसलमान के लकीर पर लड़ी जानी है.

आज के जो हालात हैं उस हिसाब से भाजपा को 100 सीटों का नुकसान होता दिखाई दे रहा है. अगर कुछ बहुत नाटकीय नहीं होता है तो भाजपा को बहुमत तक पहुंचने के लिए जरूरी 200 सीट पाने का कोई तरीका नहीं हैं. मोदी के एक बार फिर प्रधानमंत्री बनने की कोशिशें नाकाम हो सकती हैं. हालांकि अभी और चुनाव के समय के बीच बहुत कुछ बदल सकता है. पर फिलहाल तो हालात ऐसे ही दिख रहे हैं. फिलहाल.

(योगेंद्र यादव स्वराज इंडिया पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.)

(इस लेख का अंग्रेजी से अनुवाद किया गया है. मूल लेख को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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