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Friday, 3 April, 2026
होममत-विमतOIC कहां है? जो खुद को 'मुस्लिम दुनिया की आवाज़' कहता है, वह सिर्फ बयान देकर चुप नहीं रह सकता

OIC कहां है? जो खुद को ‘मुस्लिम दुनिया की आवाज़’ कहता है, वह सिर्फ बयान देकर चुप नहीं रह सकता

इस संगठन की स्थापना केवल नुकसान हो जाने के बाद बयान जारी करने के लिए नहीं की गई थी. इसका चार्टर संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित है.

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मध्य-पूर्व में जारी मौजूदा युद्ध के बीच सबसे अधिक ध्यान खींचने वाली कमी सैन्य नहीं, बल्कि संस्थागत है. ईरान, इज़रायल और अमेरिका के बीच टकराव जब पूरे खाड़ी क्षेत्र में फैलता जा रहा है, तब इस्लामिक सहयोग संगठन (ओआईसी) की भूमिका हैरान करने वाली हद तक हाशिये पर नज़र आती है. यह स्थिति सुनने में जितनी मामूली लग सकती है, वास्तव में उससे कहीं अधिक गंभीर है. ओआईसी कोई साधारण संगठन नहीं है. इसके 57 सदस्य देश हैं और यह स्वयं को “मुस्लिम जगत की सामूहिक आवाज़” बताता है. ऐसे संकट में, जिसका असर खाड़ी की सीमाओं से निकल कर वैश्विक अर्थव्यवस्था तक पहुंच चुका है, इस दावे का असर केवल शब्दों में नहीं, राजनीतिक रूप से भी स्पष्ट दिखना चाहिए.

ओआईसी की स्थापना केवल नुकसान हो जाने के बाद बयान जारी करने के लिए नहीं हुई थी. उसके घोषणापत्र की बुनियाद संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता, विवादों के शांतिपूर्ण समाधान और शांति को खतरा होने पर बातचीत, मध्यस्थता तथा कूटनीतिक हस्तक्षेप पर टिकी है. सरल शब्दों में कहें तो, ओआईसी इसलिए अस्तित्व में है कि उसके सदस्य देशों को प्रभावित करने वाले संकटों को बिखरी हुई राष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं और देर से व्यक्त की गई चिंताओं के भरोसे न छोड़ा जाए. ऐसे संगठन का उद्देश्य ही यह है कि वह रोकथाम, संयम और समाधान के लिए एक मान्य राजनीतिक ढांचा उपलब्ध कराए.

यह केवल सैद्धांतिक बात नहीं है. इतिहास में ऐसे मौके भी आए हैं जब ओआईसी केवल भाषणों का मंच बनकर नहीं रहा. दक्षिणी फिलीपींस के संघर्ष में उसने 1976 के त्रिपोली समझौते से जुड़ी वार्ताओं का समर्थन किया और अपनी चतुष्पक्षीय समिति के माध्यम से सक्रिय भूमिका निभाई. यह उदाहरण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे स्पष्ट होता है कि आवश्यकता पड़ने पर ओआईसी ने स्वयं को केवल निंदा या औपचारिक प्रतिक्रिया तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसने एक सक्रिय कूटनीतिक भूमिका भी निभाई.

इसी इतिहास के कारण आज उसकी चुप्पी का बचाव करना और कठिन हो जाता है. 19 मार्च 2026 को शांति और संवाद पर ओआईसी संपर्क समूह के राजदूतों ने खाड़ी के पड़ोसी देशों पर ईरान के सैन्य हमलों, उकसावों और धमकियों को तुरंत रोकने की मांग की थी. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2817 को लागू करने का समर्थन भी किया था. यह सही कदम था, लेकिन जब संगठन ने सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर लिया कि ऐसे हमले रुकने चाहिए, तो स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उस निर्णय को प्रभावी बनाने के लिए सामूहिक और दिखाई देने वाला प्रयास कहां है?

यही इस प्रश्न का मूल है. खाड़ी के पड़ोसी देशों पर ईरान के हमलों को केवल “क्षेत्र में अमेरिकी परिसंपत्तियों” पर हमला बताकर हल्का नहीं किया जा सकता. यह भाषा प्रचार के काम आ सकती है, लेकिन इससे मूल तथ्य नहीं बदलता. जिन अनेक ठिकानों को निशाना बनाया गया, वे असैन्य थे और उनका अमेरिका से कोई सीधा संबंध नहीं था. जिस भूभाग पर हमला हुआ, वह खाड़ी देशों का संप्रभु क्षेत्र है, न कि अमेरिका का. कोई भी देश बार-बार अपने पड़ोसियों की भूमि पर हमला करके केवल निशाने का नाम बदल देने से उस उल्लंघन को मिटा नहीं सकता.

यही कारण है कि ओआईसी के लिए अब अधिक स्पष्टता से बोलना आवश्यक हो गया है. यह युद्ध उसके लिए कोई हाशिये का मुद्दा नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी कसौटियों में से एक है. यदि खाड़ी के पड़ोसी देशों पर हुए हमलों को “अमेरिकी ठिकानों” जैसी भाषा के नीचे दबने दिया जाता है, तो ओआईसी उन्हीं सिद्धांतों को कमजोर करता है, जिन पर उसकी सदस्यता टिकी है: संप्रभु समानता, क्षेत्रीय अखंडता और सदस्य देशों या क्षेत्रीय शक्तियों द्वारा बल प्रयोग से सुरक्षा. ऐसी स्थिति में उसकी चुप्पी केवल कूटनीतिक सतर्कता नहीं मानी जाएगी, बल्कि यह उसके अपने राजनीतिक संकल्प की कमजोरी के रूप में देखी जाएगी.

ओआईसी का दायित्व और उसकी सीमा

इस स्थिति की एक वजह संगठन की संरचना में भी छिपी है. ओआईसी अपने सदस्य देशों के माध्यम से काम करता है, उनसे ऊपर उठकर नहीं.उसका शिखर सम्मेलन सर्वोच्च प्राधिकरण है. विदेश मंत्रियों की परिषद फैसले और प्रस्ताव पारित करती है. असाधारण सत्रों के लिए सदस्य देशों का समर्थन ज़रूरी होता है और बड़े निर्णय आम सहमति या विशेष बहुमत पर निर्भर करते हैं. दूसरे शब्दों में, ओआईसी के पास वैधता तो है, लेकिन स्वतंत्र पहल की क्षमता सीमित है. वह तभी निर्णायक ढंग से आगे बढ़ता है, जब उसके प्रभावशाली सदस्य देश ऐसा चाहें.

लेकिन यही कारण है कि उसकी मौजूदा चुप्पी और भी अधिक महत्व रखती है. संगठन के पास मजबूत भूमिका निभाने के लिए आवश्यक ढांचा पहले से मौजूद है. वह असाधारण कूटनीतिक पहल कर सकता है, सामूहिक प्रस्ताव पारित कर सकता है, परामर्श प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है और अधिकृत प्रतिनिधियों को जिम्मेदारी भी दे सकता है. इसलिए सवाल यह नहीं है कि ओआईसी के पास साधन हैं या नहीं. असली सवाल यह है कि क्या उसके प्रमुख सदस्य देश उन साधनों का इस्तेमाल करने को तैयार हैं? इस समय इसका सीधा अर्थ है, खाड़ी की संप्रभुता पर हो रहे हमलों पर स्पष्ट शब्दों में बोलना और मध्यस्थता के प्रयासों को अलग-अलग देशों के भरोसे छोड़ देने के बजाय ओआईसी को स्वयं एक स्पष्ट मध्यस्थता तंत्र स्थापित करना चाहिए.

यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि मध्यस्थता की गुंजाइश अभी खत्म नहीं हुई है. यदि अलग-अलग देश इस कार्य में जुट सकते हैं, कूटनीतिक रास्ते टटोल सकते हैं और तनाव कम करने की कोशिश कर सकते हैं, तो इसका अर्थ है कि यह विकल्प अभी भी खुला हुआ है. समस्या यह नहीं है कि दूसरे देश इस युद्ध को शांत करने की कोशिश कर रहे हैं. समस्या यह है कि जिस संगठन का अस्तित्व ही ऐसे समय में एक साझा और प्रभावी भूमिका निभाने के लिए बना था, वह आज केंद्र में कहीं नजर नहीं आता.

यह केवल क्षेत्रीय चिंता का विषय भी नहीं है. यह युद्ध विश्व अर्थव्यवस्था के एक अत्यंत संवेदनशील केंद्र पर दबाव बना रहा है. खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता कभी स्थानीय नहीं रहती. जब-जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, उसका असर पूरे विश्व पर पढ़ता है. ऐसी परिस्थिति में मध्यस्थता कोई बयानबाजी नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता को बनाए रखने का एक महत्वपूर्ण साधन है.

सब जानते हैं कि ओआईसी बलपूर्वक शांति स्थापित करने वाला संगठन नहीं है. वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद नहीं है. उसके पास न अपनी कोई सेना है और न प्रतिबंध लागू करने की व्यवस्था, लेकिन कसौटी यह नहीं है. असली प्रश्न यह है कि क्या वह अपनी सामूहिक वैधता को समय रहते राजनीतिक प्रभाव में बदल सकता है? 57 मुस्लिम देशों की आवाज़ होने का दावा करने वाले संगठन को यह याद दिलाने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए कि खाड़ी के पड़ोसी देशों पर लगातार हमले और उसके साथ फैलता क्षेत्रीय युद्ध वही परिस्थितियां हैं, जिनमें उसके उद्देश्य को सबसे स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए.

ओआईसी को किसी नए घोषणापत्र की ज़रूरत नहीं है. ज़रूरत सिर्फ इस बात की है कि वह अपने संविधान और अपने घोषित दायित्वों के अनुरूप आचरण करे. उसका इतिहास बताता है कि कूटनीति उसके लिए कोई पराई चीज़ नहीं है. उसका संविधान स्पष्ट करता है कि संयम और मध्यस्थता कोई अतिरिक्त विकल्प नहीं, बल्कि उसकी बुनियादी जिम्मेदारियां हैं. आज के संकट में, जब खाड़ी देशों की संप्रभुता और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों पर ओआईसी के ही एक सदस्य देश की कार्रवाइयों का असर दिख रहा है, तब यह पहले से कहीं अधिक स्पष्ट है कि ऐसी भूमिका अब अत्यंत आवश्यक हो चुकी है.

खतरा केवल युद्ध के फैलने का नहीं है. बड़ा खतरा यह भी है कि ऐसे ही क्षणों के लिए बनाई गई संस्था शब्दों में मौजूद दिखे, लेकिन परिणामों में अनुपस्थित रहे. यदि ओआईसी अपने ही एक सदस्य देश द्वारा बलपूर्वक परखी जा रही खाड़ी देशों की संप्रभुता के प्रश्न पर भी स्पष्ट और दृश्यमान भूमिका नहीं निभा सकता, तो कहीं ऐसा ना हो की कल को उसका संविधान एक मार्गदर्शक की बजाय केवल इरादों का दस्तावेज़ बनकर रह जाए.

रामिष सिद्दीकी इस्लाम के जानकार हैं और ‘द ट्रू फेस ऑफ इस्लाम’ किताब के लेखक हैं. विचार निजी हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)


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