scorecardresearch
Thursday, 25 April, 2024
होममत-विमतनौसेना ने ड्रेस-कोड में कुर्ता-पजामा को शामिल किया, तो अनुभवी नौसैनिक नाराज़ क्यों हो गए?

नौसेना ने ड्रेस-कोड में कुर्ता-पजामा को शामिल किया, तो अनुभवी नौसैनिक नाराज़ क्यों हो गए?

कुर्ता-पाजामा अपनाने पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया के पीछे वजह शायद यह लिबास उतना नहीं है जितना वह धारणा जिसके तहत अनुभवी सैनिकों और सिविल सोसायटी ने इस फैसले की व्याख्या की है.

Text Size:

मध्य एशिया में ईज़ाद किया गया लिबास कुर्ता-पाजामा दक्षिण एशिया में सदियों से लोकप्रिय रहा है. इस महीने इसे भारतीय नौसेना अधिकारियों के मेसों और नाविकों के इंस्टीट्यूटों की अनौपचारिक पोशाकों की सूची में शामिल कर दिया गया. पिछले दिसंबर में नौसैनिकों के लिए कंधे पर लगाने के लिए नया बिल्ला भी शामिल किया गया, जिसे ‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक नारे ‘विरासत पर गर्व’ के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया गया. 

इस लेख में सेना के सांस्कृतिक मूल्यों की जांच करने और यह पहचान करने की कोशिश की गई है कि लिबास में इस परिवर्तन पर अनुभवी सैनिकों और आम जनता ने व्हाट्सअप ग्रुपों में प्रतिकूल प्रतिक्रियाएं क्यों की.


यह भी पढ़ें: भारत जोखिम लेना सीख ले और नुकसान सहने को तैयार हो तो ड्रोन्स के उत्पादन का बड़ा केंद्र बन सकता है


सेना के सांस्कृतिक मूल्य 

संस्कृति कई रूपों में प्रकट होती है और हरेक रूप की अपनी गहराई होती है. इंडोनेशियाई विद्वानों अज़ीजह एरज़ाद और सुसियाती सुसियाती के इस मॉडल से संकेत लेते हुए कहा जा सकता है कि प्रतीक, नायक, अनुष्ठान, और मूल्य सांस्कृतिक प्रथाओं में प्रतिबिंबित होते हैं और उनकी कल्पना नदी में उभरने वाली वृताकार लहरों के रूप में की जा सकती है जिनमें प्रतीक सबसे बाहरी वृत पर होते हैं. लिबास को उन सांस्कृतिक प्रतीकों के रूप में गिना जा सकता है जो संस्कृति के सबसे सतही पहलुओं का प्रतिनिधित्व करते हैं.  

प्रतीकों को शब्दों, चिह्नों, तसवीरों, चीज़ों, लिबास से प्रस्तुत किया जा सकता है, जो अपना अलग-अलग अर्थ रखते हैं और जिन्हें साझा संस्कृति के लोग आसानी से पहचान सकते हैं. पुराने प्रतीक गायब हो रहे हैं और नए आसानी से प्रकट होते रहते हैं. एक समूह के प्रतीकों को अक्सर दूसरे समूह भी अपना लेते हैं. शायद इसीलिए लिबास जैसे प्रतीक संस्कृति के सबसे बाहरी सतह का प्रतिनिधित्व करते हैं. 

नायक अतीत के हों या वर्तमान के, वास्तविक हों या काल्पनिक, वे ऐसी हस्ती होते हैं जिन्हें ऐसे व्यक्तित्व का स्वामी माना जाता है जिन्हें कोई भी संस्कृति काफी ऊंचा सम्मान देती है. वे आचार संहिता के मॉडल के रूप में भी काम करते हैं.  

अच्छी पत्रकारिता मायने रखती है, संकटकाल में तो और भी अधिक

दिप्रिंट आपके लिए ले कर आता है कहानियां जो आपको पढ़नी चाहिए, वो भी वहां से जहां वे हो रही हैं

हम इसे तभी जारी रख सकते हैं अगर आप हमारी रिपोर्टिंग, लेखन और तस्वीरों के लिए हमारा सहयोग करें.

अभी सब्सक्राइब करें

अनुष्ठान सामूहिक उपक्रम होते हैं, जो अपेक्षित मकसद हासिल करने में सतही होते हैं, लेकिन उन्हें सामाजिक रूप से ज़रूरी माना जाता है. अनुष्ठान अक्सर अभिवादन, दूसरों के प्रति सम्मान, धार्मिक या सामाजिक समारोह आदि के रूप में व्यक्तिगत मतलब से किए जाते हैं. 

मूल्य संस्कृति के मूल होते हैं. वे दूसरों के खास तरह के मामलों के प्रति व्यापक झुकाव (सही-गलत, अच्छा-बुरा, प्राकृतिक-अप्राकृतिक) दर्शाते हैं. अधिकतर मूल्यों से वे लोग बेखबर रहते हैं जो उनका पालन करते हैं. दूसरे उनका प्रत्यक्ष पालन नहीं कर सकते. लोग अलग-अलग परिस्थितियों में जिस तरह का आचरण करते हैं उससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि वे किन मूल्यों का पालन करते हैं. 

प्रतीक, नायक, और अनुष्ठान संस्कृति के नुमाया पहलू हैं. प्रथाओं का वास्तविक सांस्कृतिक अर्थ अमूर्त होता है, लेकिन वे प्रायः तब प्रकट होता है जब किसी संस्कृति के अंदर के लोग प्रथाओं की व्याख्या करते हैं. 

भारतीय नौसेना ने कुर्ता-पजामा को अपनाने का जो फैसला किया है उसे सेना के सांस्कृतिक मूल्यों के सबसे बाहरी वृत में शामिल किया जा सकता है. फिर भी, इसके अंदर के लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाले पुराने अनुभवी सैनिकों ने, जो बेशक दूसरे दौर के हैं, कुर्ता-पजामा को अतिरिक्त औपचारिक लिबास के रूप में अपनाए जाने पर नकारात्मक प्रतिक्रिया की है. ऐसा क्यों हुआ? 


यह भी पढ़ें: सेना में प्रमोशन के लिए योग्यता को तरजीह देनी चाहिए न कि प्रोफेशनल सेगमेंट को, निजी स्वार्थ सबसे बड़ी बाधा


कुर्ता-पजामा की हिमायत  

2005 में आईएनबीआर 11/2005 के जरिए नौसेना ने अपने मेसों, वार्डरूमो और इन्स्टीट्यूट्स में ऐसे दिनों या मौकों पर औपचारिक, अनौपचारिक लिबास के रूप में भारतीय पोशाक के तौर पर पुरुषों के लिए जोधपुरी और सफारी सूट, और महिलाओं के लिए साड़ी और सलवार के इस्तेमाल की मंजूरी दी. 

अब, एक और भारतीय लिबास को मंजूरी दी गई है, जिसमें पुरुषों के लिए कुर्ता-पजामा, बंडी/जैकेट और बंद जूते या सैंडल, महिलाओं के लिए कुर्ता-चूड़ीदार/ कुर्ता-प्लाजो के साथ सैंडल या जूते शामिल हैं. बाकी विस्तृत ब्योरा भी दिया गया है कि उनका रंग क्या हो, कुर्ता कितना लंबा हो, उसमें आस्तीन के साथ कफ हो, पॉकेट कितने बड़े हों. इसी तरह पाजाम का डिजाइन कैसा हो, उसका रंग किस तरह मैचिंग या ‘कंट्रास्टिंग’ हो. बंडी/जैकेट का डिजाइन और उसमें पॉकेट की साइज क्या हो, यह भी बताया गया है. जूते-सैंडल प्लेन मोकासिन/डर्बी/ऑक्सफोर्ड डिजाइन के काले या डार्क टैन रंग के हों. गहरे रंग के बैकस्ट्रैप्स के साथ चमड़े के बंद सैंडल की भी मंजूरी दी गई है. 

इस घोषणा के साथ नौसेना ने जो चित्र जारी किए हैं उन्हें देखकर मुझे कोई कारण नहीं लगता कि इसे पहले से मंजूर अनौपचारिक पोशाकों में अतिरिक्त पोशाक के तौर पर क्यों नहीं शामिल किया जा सकता, लेकिन अनुभवी सैनिकों और दूसरों की ओर से प्रतिकूल प्रतिक्रिया क्यों आई है?  

‘मूल्यों’ का प्रश्न 

कुर्ता-पजामा अपनाने पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया के पीछे वजह शायद यह लिबास उतना नहीं है जितना वो धारणा जिसके तहत इस फैसले की व्याख्या की गई है. कई लोगों के मुताबिक, नौसेना को इस मामले में अकेले कदम बढ़ाने की ज़रूरत नहीं थी और उसे सेना के बाकी दो अंगों को भी साथ लेना चाहिए था. कुछ लोगों के मुताबिक, बिल्ले को लेकर एक्स पर एक पोस्ट में ‘गुलामी की मानसिकता’ से मुक्ति की जो बात कही गई है और उससे पीएमओ को जो जोड़ा गया है वे सेना के इस बुनियादी मूल्य के साथ विश्वासघात है कि वह एक अ-राजनीतिक संगठन है. इस नज़रिए के मुताबिक, उक्त फैसला जिस तरह किया गया वह सेना के अ-राजनीतिक चरित्र और मेलजोल की भावना जैसे मूल्यों के विपरीत है.  

जो भी हो, ऐसी कोई वजह नहीं है कि तीनों सेनाएं अब भी इस लिबास को अपनाने पर विचार न कर सकें और सेना में पहने जाने वाले विभिन्न लिबासों को मौसम के अनुकूल बदलने और रखरखाव तथा प्रदर्शन की दृष्टि से सहज बनाने का फैसला न कर सकें. वे भारत में कपड़ों की विभिन्नता और डिजाइन की विशेषज्ञता में से चुनाव कर सकती हैं. बेशक, यह संभव नहीं है कि कोई भी बदलाव कर दिया जाए, क्योंकि इससे अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है. इसलिए फिलहाल एक सेना के अंदर यह उपक्रम औपचारिक पोशाक तक सीमित किया जा सकता है. तीनों सेनाओं में अनौपचारिक लिबासों का मानकीकरण भी ज़रूरी है क्योंकि भविष्य में संयुक्त मेसों का प्रचलन आम बात बात हो जाएगी, खासकर थिएटर कमांडों के गठन के साथ. 

भारत में पहनावों की जो समृद्ध विविधता है उसका लाभ उठाते हुए सरकार को अपनी सांस्कृतिक विरासत को सामने लाना चाहिए. ज़रूरत यह है कि सरकार अंतरराष्ट्रीय जमावड़ों में भाग लेने वाले अपने कर्मचारियों को दिशानिर्देश जारी करे कि उनमें वे यथासंभव भारतीय लिबासों का उपयोग करें तो बेहतर होगा. इसकी शुरुआत उपनिवेशवाद के स्थायी प्रतीक नेकटाई का विकल्प प्रस्तुत करके की जा सकती है.

(संपादन : फाल्गुनी शर्मा)

(लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) प्रकाश मेनन (रिटायर) तक्षशिला संस्थान में सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक; राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय के पूर्व सैन्य सलाहकार हैं. उनका एक्स हैंडल @prakashmenon51 है. व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


यह भी पढ़ें: भारत-पाकिस्तान भी बन सकते हैं इज़रायल-हमास. सबक ये कि आतंकवाद को केवल ताकत से खत्म नहीं किया जा सकता


 

share & View comments