Friday, 27 May, 2022
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EVM से जुड़ी जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-A की संवैधानिकता को SC में चुनौती के क्या हैं मायने

देखना है कि जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए के तहत ईवीएम के इस्तेमाल के बाद अब अचानक इस प्रावधान की संवैधानिकता के सवाल पर उच्चतम न्यायालय क्या रुख अपनाता है और अगर वह विचार करने का निश्चय करता है तो उसकी क्या व्यवस्था होगी.

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देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतपत्रों के माध्यम से मतदान कराना भले ही अब अतीत की बात हो चुकी है लेकिन आज भी एक वर्ग किसी न किसी तरह मतपत्रों के माध्यम से मतदान प्रणाली लागू कराने के लिए प्रयत्नशील है. चुनाव नजदीक आते ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये जाने लगते हैं. ईवीएम की विश्वसनीयता पर संदेह का मुद्दा बहुत अधिक सफल नहीं हो पाया है.

इस बार भी उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर विधानसभा के चुनावों की घोषणा के साथ ही ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाये गए हैं और अब चुनाव में ईवीएम के उपयोग से संबंधित जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए की संवैधानिकता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दे दी है.

चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों पर कब्जा और मतपेटियों को लूटने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाने के लिए करीब चार दशक पहले चुनाव प्रक्रिया को हिंसा मुक्त रखने के इरादे से शुरू की गयी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की विश्वसनीयता पर यदा कदा सवाल उठते रहे हैं. इसकी विश्वसनीयता का सवाल किसी न किसी रूप में न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता रहता है.

लेकिन अब तो जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए की संवैधानिकता को चुनौती दी गयी है जिसके अंतर्गत निर्वाचन आयोग चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल करता है.

इस प्रावधान की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका में न्यायालय से यह व्यवस्था देने का अनुरोध किया गया है धारा 61-ए की आड़ में चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता.

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स्थानीय अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा चाहते हैं कि जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए को अवैध और असंवैधानिक घोषित किया जाये क्योंकि इसकी आड़ में ईवीएम थोपी नहीं जा सकती. याचिका में दलील दी गयी है कि धारा 61-ए संविधान के अनुच्छेद 100(1) और अनुच्छेद 21 के विपरीत है.

सोचने वाली बात है कि संसद से कोई कानूनी प्रावधान पारित हुए बगैर ही क्या उसे कानून में शामिल किया जा सकता है. लेकिन इस याचिका में कुछ इसी तरह का दावा किया गया है. अब यह तो आने वाला वक्त ही बतायेगा कि इस याचिका का नतीजा क्या निकलता है.

कितना अजीब सा लगता है कि जब मतदान मशीनों के साथ किसी प्रकार की हेराफेरी के संदेह को दूर करने के इरादे से इन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को वीवीपैट प्रणाली से लैस किया जा रहा है तो अचानक ही जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए की संवैधानिकता को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी जा रही है.

इस प्रावधान की संवैधानिकता को चुनौती देने वाले शर्मा ने प्रधान न्यायाधीश एनवी रमन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ से इस पर यथाशीघ्र सुनवाई करने का आग्रह किया है.

प्रधान न्यायाधीश ने इतना ही कहा कि हम देखेंगे. हो सकता है कि यह किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध हो.


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केरल में हुआ पहली बार ईवीएम का इस्तेमाल

निर्वाचन आयोग ने चुनावी हिंसा और मतपेटियों की लूट पर लगाम कसने के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का सहारा लिया था. इसी प्रक्रिया के तहत पहली बार 1982 में केरल विधानसभा के 50 मतदान केन्द्रों पर इन मशीनों का इस्तेमाल हुआ था जबकि शेष मतदान केन्द्रों पर मतपत्रों का इस्तेमाल किया गया था.

चुनाव में इन केंद्रों पर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल का मामला उसी समय न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ गया था और उच्च न्यायालय के फैसले के बाद यह शीर्ष अदालत पहुंचा था.

शीर्ष अदालत के तीन न्यायाधीशों- न्यायमूर्ति एस एम फजल अली, न्यायमूर्ति ए वर्धराजन और न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र- की तीन सदस्यीय पीठ ने A. C. Jose vs Sivan Pillai & Ors प्रकरण में 5 मार्च, 1984 को अपने फैसले में इन 50 केंद्रों के संबंध में चुनाव निरस्त कर दिया था और पुनर्मतदान का आदेश दिया था.

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन का इस्तेमाल प्रमुखता से चर्चा में आया. चूंकि उस समय जन प्रतिनिधित्व कानून में मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल का प्रावधान नहीं था, इसलिए संसद ने इस कानून में दिसंबर, 1988 में संशोधन किया और एक नयी धारा 61-ए इसमें शामिल की जो 15 मार्च, 1989 से प्रभावी हुई है.

इस नये प्रावधान के माध्यम से ही मतदान के लिए इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल की व्यवस्था की गई. बाद में टी एन शेषन के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बनने पर चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल के विचार ने गति पकड़ी और अंततः इसका इस्तेमाल शुरू हो गया.

इसके बाद, केन्द्र सरकार ने जनवरी, 1990 में चुनाव सुधार समिति का गठन किया था. इसमें राष्ट्रीय और राज्य स्तर के मान्यता प्राप्त दलों के प्रतिनिधि शामिल थे. चुनाव सुधार समिति ने इन इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के आकलन के लिए एक तकनीकी विशेषज्ञ समिति नियुक्त की थी. यह समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन एक सुरक्षित प्रणाली है और इसके बाद ही विशेषज्ञों की समिति ने सर्वसम्मति से अप्रैल, 1990 में और समय गंवाये बगैर ही चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल की सिफारिश की थी.

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का उपयोग शुरू में प्रयोग के तौर पर कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में किया गया लेकिन 2000 से नियमित रूप से मतदान के लिए ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है. स्थिति यह है कि मौजूदा दौर में लगभग सभी स्तर के चुनावों में ईवीएम का प्रयोग हो रहा है क्योंकि इन्हें अधिक भरोसेमंद पाया गया है और इनके माध्यम से चुनाव के नतीजे भी काफी जल्दी मिलते हैं.

देश में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से होने वाले मतदान में हालांकि पारदर्शिता थी लेकिन इसके बावजूद इसमें हेराफेरी की संभावना की आशंका व्यक्त की जा रही थी. इस संबंध में भी कई न्यायिक व्यवस्थाएं हैं.

सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर मशीन में जोड़ी गई वीवीपैट

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ छेड़छाड़ की आशंका के समाधान के लिए भाजपा के नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने इन मशीनों के साथ कागज की पर्ची प्रदान करने वाली मशीन लगाने का अनुरोध करते हुए शीर्ष अदालत में याचिका दायर की थी.

तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की पीठ ने Dr. Subramanian Swamy Vs Election Commission of India यह प्रकरण में 8 अक्टूबर, 2013 को अपने फैसले में ईवीएम के साथ ही चरणबद्ध तरीके से ईवीएम को वीवीपैट प्रणाली से जोड़ने का आदेश दिया.

न्यायालय का स्पष्ट मत था कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ ‘पेपर ट्रेल’ जोड़ना स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए अपरिहार्य है. न्यायालय का कहना था कि इस तरह की पेपर ट्रेल या वीवीपैट प्रणाली लागू करके इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के प्रति मतदाताओं का विश्वास हासिल किया जा सकता है.

डॉ स्वामी की इस याचिका पर सुनवाई के दौरान भी जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए के प्रावधान पर चर्चा हुई थी. इस दौरान निर्वाचन आयोग ने दलील दी थी कि ईवीएम के साथ किसी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती लेकिन एक तर्क यह भी था कि किसी भी अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की तरह ही इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों में भी हैकिंग हो सकती है.

इस संबंध में डॉ स्वामी का कहना था कि ईवीएम के साथ अगर ‘पेपर ट्रेल’ प्रणाली जोड़ी जानी चाहिए क्योंकि यह मतदान प्रक्रिया की सहयोगी होगी और ईवीएम पर मत देने के बाद कागज की एक पर्ची निकलेगी जिससे मतदाता को पता चल सकेगा कि उसका मत सही दर्ज हुआ है और यह पर्ची एक डिब्बे में जमा कर दी जायेगी. विवाद होने की स्थिति में सिर्फ निर्वाचन आयोग ही इस डिब्बे का इस्तेमाल कर सकता ताकि मतों की पुष्टि हो सके.

डॉ स्वामी के इस सुझाव से न्यायालय भी सहमत था. निर्वाचन आयोग भी प्रारंभिक ना-नुकुर के बाद इसके लिए विशेषज्ञों से सलाह मशविरा करने और इस पर विचार के लिए सहमत हो गया था. निर्वाचन आयोग ने अंतत: पहली बार नागालैंड की एक विधानसभा सीट पर सितंबर 2013 में हुए उप चुनाव के दौरान ईवीएम और वीवीपैट प्रणाली का इस्तेमाल किया जो सफल रहा.

ईवीएम के साथ वीवीपैट प्रणाली जुड़ने से चुनाव प्रक्रिया में पहले से अधिक पारदर्शिता आई. इस पर शीर्ष अदालत ने कहा था कि चुनाव प्रक्रिया में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के साथ वीवीपैट प्रणाली जुड़ने से मतदान सही तरीके से होना सुनिश्चित होगा. इस प्रणाली के प्रति मतदाताओं का पूरा भरोसा बनाये रखने के लिए पारदर्शिता जरूरी है और इसके लिए ईवीएम को वीवीपैट प्रणाली से जोड़ना आवश्यक है. यह और कुछ नहीं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में अभिव्यक्ति का एक महत्वपूर्ण कृत्य है.

फिलहाल तो देखना यह है कि विभिन्न चुनावों में जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 61-ए के तहत ईवीएम के इस्तेमाल के बाद अब अचानक इस प्रावधान की संवैधानिकता के सवाल पर उच्चतम न्यायालय क्या रुख अपनाता है और अगर वह विचार करने का निश्चय करता है तो उसकी क्या व्यवस्था होगी.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जो तीन दशकों से शीर्ष अदालत की कार्यवाही का संकलन कर रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं)


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