Friday, 21 January, 2022
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रोजगार में भारतीय युवा महिलाओं की भागीदारी कितनी है, और इसमें उनकी दिक्कतें क्या-क्या हैं

भारत में ‘नायका’ नामक ब्युटी कंपनी की सफलता पर खुश होने के साथ हमें यह भी जानना चाहिए कि आज कितनी युवा महिलाएं रोजगार करने का फैसला कर सकती हैं या वाकई रोजगार कर सकती हैं

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महिला उद्यमी फाल्गुनी नायर द्वारा शुरू की गई भारतीय ब्युटी कंपनी ‘नायका’ पिछले दिनों शेयर बाज़ार में कदम रखने की शानदार शुरुआत के कारण चर्चा में रही. इसकी जोरदार कामयाबी पर खुश होने के साथ हमें इसकी मुख्य ग्राहकों, भारत की युवा महिलाओं के जीवन की दिशा का भी आकलन करना चाहिए.

युवा महिलाओं से हमारा आशय 20-29 आयुवर्ग की महिलाओं से है. अधिकतर महिलाओं के जीवन में इस आयु अवधि में महत्वपूर्ण बदलाव आते हैं— वे पढ़ाई पूरी करती हैं, कमाई वाला काम करने का फैसला करती हैं, शादी करके नयी जगह और नये परिवार में जाती हैं और अपना परिवार बनाना शुरू करती हैं. 2018-19 में, भारत में युवा महिलाओं की आबादी करीब 9.24 करोड़ थी, जिनमें से करीब 10.7 प्रतिशत पढ़ाई कर रही थीं, 9.5 प्रतिशत उद्योग और सेवा क्षेत्र (औपचारिक तथा अनौपचारिक) में मजदूरी कर रही थीं, और 66 प्रतिशत से ज्यादा युवा महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियां संभाल रही थीं. ये अनुमानित आंकड़े आवधिक श्रमबल सर्वे पर आधारित हैं.

‘नायका’ की नायर जैसी कई दूसरी भारतीय महिलाओं ने स्टार्ट-अप की दुनिया में कामयाबी के साथ कदम रखा है. वे बैंकिंग, सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) और दूसरे सेक्टरों में ऊंचे ओहदों पर पहुंची हैं. भारत ने 50 साल पहले ही एक महिला को प्रधानमंत्री को चुना था, राष्ट्रपति की कुर्सी पर भी महिला को बिठाया, कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्री भी बनीं. लेकिन शोध बताता है कि भारत में आम महिला के लिए शादी और बच्चे पालने आम मानक के रूप में मजबूती से स्थापित है और यह पुरुषों और महिलाओं, दोनों के आचरण को प्रभावित करता है.

भारत में कौन महिला रोजगार करती है, विवाहिता या अविवाहिता?

विवाहिता बनाम अविवाहिता युवा महिला के समीकरण पर नज़र डालने से कैसी तस्वीर उभरती है? 2018-19 में भारत में 72 प्रतिशत से ज्यादा युवा महिलाएं विवाहित थीं. 15 प्रतिशत से ज्यादा अविवाहित युवा महिलाएं उद्योग और सेवा क्षेत्र में कमाई वाला रोजगार कर रही थीं. करीब 7 प्रतिशत विवाहित युवा महिलाएं इस तरह के रोजगार में लगी थीं. इसके विपरीत, करीब 80 फीसदी विवाहित महिलाएं पूरे समय घर और परिवार चलाने में लगी थीं, जबकि 32 प्रतिशत अविवाहित महिलाएं इसमें व्यस्त थीं और उनमें से अधिकतर अपने माता-पिता के साथ रह रही थीं.

क्षेत्रवार विवाह के बाद महिलाओं के जीवन में आने वाली क्षेत्रीय बदलाव

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उद्योग और सेवा क्षेत्र (कृषि से इतर रोजगार) में कमाई वाला रोजगार कर रहीं युवा महिलाओं का अनुपात सबसे ज्यादा गुजरात और तमिलनाडु में था. कृषि से इतर क्षेत्रों में कमाई वाला रोजगार कर रहीं विवाहित महिलाएं सबसे ज्यादा तमिलनाडु में हैं, तो गुजरात में केवल 6.5 प्रतिशत विवाहित युवा महिलाएं ही उद्योग और सेवा क्षेत्र में रोजगार कर रहीं थीं. इस तरह, गुजरात उन राज्यों में शुमार है जहां कृषि से इतर क्षेत्रों में कमाई वाला रोजगार कर रहीं विवाहित युवा महिलाओं का अनुपात सबसे कम है. कर्नाटक, महाराष्ट्र, और पश्चिम बंगाल में भी कृषि से इतर क्षेत्रों में कमाई वाला रोजगार कर रहीं विवाहित और अविवाहित युवा महिलाओं के अनुपातों में अंतर बड़ा है. इसके विपरीत, तमिलनाडु की तरह आंध्र प्रदेश, केरल और ओडिशा में कृषि से इतर क्षेत्रों में कमाई वाला रोजगार कर रहीं विवाहित और अविवाहित युवा महिलाओं के अनुपातों में अंतर कम है. बिहार और उत्तर प्रदेश में लगभग सभी विवाहित और अविवाहित युवा महिलाएं कृषि से इतर क्षेत्रों में आर्थिक रूप से निष्क्रिय हैं.

आश्चर्य की बात यह है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में लगभग सभी विवाहित और अविवाहित युवा महिलाएं कृषि क्षेत्र में भी निष्क्रिय दिखती हैं (देखें फिगर 2). राजस्थान, मध्य प्रदेश, और आंध्र प्रदेश में बड़े अनुपात में विवाहित युवा महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं. केरल, तमिलनाडु, पंजाब, और हरियाणा जैसे समृद्ध राज्यों में यह अनुपात 5 प्रतिशत से भी कम है.

ग्राफिकः रमनदीप कौर | दिप्रिंट

जाहिर सवाल यह उठता है कि अगर युवा महिलाएं, खासकर विवाहित, अगर रोजगार नहीं कर रही हैं तो उनमें से कितनी ऐसी हैं जो रोजगार ढूंढ रही हैं? (देखें फिगर 3). विवाहित युवा महिलाओं में बेरोजगारी सबसे ज्यादा केरल में है. इसके विपरीत तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, और राजस्थान में अविवाहित युवा महिलाओं में बेरोजगारी अपेक्षाकृत ज्यादा है, तो यह विवाहित युवा महिलाओं में कम है, जो बताता है कि बड़े अनुपात में विवाहित महिलाएं रोजगार की तलाश बंद कर देती हैं.

ग्राफिकः रमनदीप कौर | दिप्रिंट

विवाहित महिलाएं रोजगार क्यों नहीं करतीं

यह हमें उस मुद्दे पर लाता है जिसे विवाहित भारतीय महिलाओं की ओर से आर्थिक भागीदारी में कमी के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार बताया जाता है, वह है— घरेलू काम और बच्चे पालना. (देखें फिगर 4). केरल में ऐसी महिलाओं का अनुपात सबसे कम है जो पूरे समय घरेलू जिम्मेदारियों में व्यस्त रहती हैं, जबकि बिहार में 2018-19 में लगभग सभी, 96.5 प्रतिशत युवा विवाहित महिलीन आर्थिक रूप से निष्क्रिय थीं.

ग्राफिकः रमनदीप कौर । दिप्रिंट

मौजूदा शोध में सुझाव दिए गए हैं कि मांग के पक्ष से यानी महिलाओं के लिए उपयुक्त रोजगार पैदा करने; और आपूर्ति के पक्ष से यानी आर्थिक अवसरों में भाग लेने की क्षमता महिलाओं में विकसित करने के लिए भी क्या-क्या नीतिगत कार्रवाई की जा सकती है. मांग वाले पक्ष में उन सेक्टरों को बढ़ावा देने का प्रावधान है, जिन्हें महिलाओं के लिए अनुकूल माना जाता है. और उनके लिए नौकरी में आरक्षण का भी कानूनी प्रावधान शामिल है. आपूर्ति वाले पक्ष में ये बातें शामिल हैं— युवतियों की आकांक्षाओं को बढ़ाना; स्कूल के स्तर पर लैंगिक मानकों में ढील देना, रोजगार के अवसरों की जानकारी देना, महिला नेताओं से संपर्क, महिलाओं की सक्रियता बढ़ाना, और बच्चों की देखभाल की सस्ती व्यवस्था. यह भी एक कारण है जो महिलाओं को आमदनी कराने वाला रोजगार करने में बाधा बनता है. इस मुद्दे पर कम चर्चा हुई है.

भारत में घरेलू हिंसा का शिकार होने वाली विवाहित महिलाओं में उनका अनुपात ज्यादा है जो आय कराने वाले रोजगार में लगी हैं, और उनका अनुपात कम है जो आय न कराने वाले रोजगार में लगी हैं. राष्ट्रीय पारिवारिक स्वास्थ्य सर्वे के 2015-16 के आंकड़ों पर आधारित हमारे अनुमान बताते हैं कि भारत में आय कराने वाले रोजगार में लगी 20-29 आयुवर्ग की विवाहित युवा महिलाओं में 34 प्रतिशत महिलाओं को सर्वे से पहले के 12 महीनों में पति से घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ा था, जबकि आय न कराने वाले रोजगार में लगी ऐसी महिलाओं का अनुपात 24 प्रतिशत था.

विवाहित युवा महिलाओं को दो कारणों से ज्यादा घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है— अपने पति के अत्याचार के कारण और घर बाहर जाकर काम करने के खुद महिला में अपराधबोध के कारण. इस वजह से ज़्यादातर महिलाएं घरेलू हिंसा को जायज मान कर सह लेती हैं. इस लेख की प्रथम दो लेखिकाओं ने इसे अपने अगले शोधपत्र ‘फेमिनिस्ट इकोनॉमिक्स’ में स्पष्ट किया है.

लैंगिक मानकों के मामले में नज़रिया बदलने का शायद सबसे तरीका यह है कि जीवन के शुरू में ही, खासकर किशोरावस्था में इसकी कोशिश की जाए. तभी भारत में युवा महिलाओं अपना जीवन अपनी मर्जी से जीने के विकल्प उपलब्ध होंगे.

(विद्या महांबरे ग्रेट लेक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में इकोनॉमिक्स की प्रोफेसर हैं. सौम्या धनराज मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स की असिस्टेंट प्रोफेसर हैं. संकल्प शर्मा मद्रास स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में डेवलपमेंट डेटा लैब में रिसर्च एसोसिएट हैं. यहां व्यक्त विचार निजी हैं.)

(इस खबर को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)


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